Kartik Purnima: मेरठ के मखदूमपुर घाट पर तंबुओं की नगरी, यहां होता है आस्था, भक्ति और मुक्ति का समागम

Kartik Purnima यहां होता है आस्‍था का संगम। मवाना तहसील के मखदूमपुर घाट स्थित गंगा की सफेद रेती पर कार्तिक पूर्णिमा पर मेला लगाया जाता है। पांच दिवसीय मेले में लोग आसपास व दूर दराज से बैल भैंसा-बुग्गी व ट्रैक्टर-ट्राली से सवार होकर पहुंचते हैं।

Prem Dutt BhattSat, 23 Oct 2021 01:48 PM (IST)
मवाना के मखदूमपुर घाट पर बसी तंबुओं की नगरी का अलग ही नजारा होता है।

मेरठ, जागरण संवाददाता। Kartik Purnima वेस्ट यूपी के गंगा-जमुना के दोआब में मखदूमपुर घाट पर कार्तिक पूर्णिमा पर हर वर्ष लगने वाले मेले में तंबुओं की नगरी बसती है। पूरे साल वीरान रहने वाली गंगा की रेती एक बार फिर आबाद होती है और चारों ओर यहां आस्था व भक्ति और मुक्ति का समागम दिखाई देता है। यहां, दूरदराज से आए लाखों श्रद्धालु पतित पावनी गंगा में पर्व की डुबकी लगाकर पुण्य अॢजत कर अन्य रस्में निभाने के साथ पूर्वजों की मुक्ति के लिए दीपदान व जलार्पण भी करते हैं।

मेले में आते आसपास के लोग

जिला मुख्यालय से 30 किलोमीटर दूर मवाना तहसील के मखदूमपुर घाट स्थित गंगा की सफेद रेती पर कार्तिक पूर्णिमा पर मेला लगाया जाता है। पांच दिवसीय मेले में लोग आसपास व दूर दराज से बैल, भैंसा-बुग्गी व ट्रैक्टर-ट्राली से सवार होकर यहां पहुंचते हैं और गंगा की रेती में तंबुओं लगाकर रहते हैं। जैसे-जैसे श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ती है वैसे-वैसे तंबुओं की नगरी बड़ा आकार में मिनी नगर का स्वरूप ले लेती है।

जिम्मेदारी जिला पंचायत की

यहां आस्था, भक्ति और मुक्ति का एक साथ समागम दिखाई देता है। अर्थ के रूप में हजारों लोगों को रोजगार भी मुहैया देता है। हालांकि मेला आयोजन की जिम्मेदारी जिला पंचायत की है जो रास्ते का निर्माण, बैरिकेडिंग, पथप्रकाश आदि की व्यवस्थाएं करता है, लेकिन मेला शुरू होने से समाप्ति तक कानून व्यवस्थाएं श्रद्धालु खुद संभालते हैं। पुलिस-प्रशासनिक अधिकारी और पुलिस फोर्स रहती है, लेकिन व्यवस्थाएं दूर रहकर ही संभालते हैं।

गंगा की धारा तय करती है मेला स्थान

गंगा घाट को स्थायी करने की मांग वर्षों पुरानी हैं, लेकिन अभी तक उपेक्षा ही हाथ लगी है। पक्के घाट नहीं बनने से मेले का स्थान गंगा की धारा पर निर्भर करता है। कभी आबादी से सात से दस किमी दूर हो जाता तो कभी दूरी कम भी हो जाती है।

भजन-संध्या से गूंजते हैं घाट

मखदूमपुर घाट पर सुबह शाम आरती होती है तो पूरे दिन भजन-संध्या के साथ लोकगीत की गूंज सुनाई देती है। महिलाएं लोक गीत गाकर बच्चों के मुंडन संस्कार कराते हैं तो नवविवाहित जोड़े गंगा पूजाकर सुख समृद्धि की कामन करते हैं। वहीं, मनौतियां मांगकर फिर आने का भी वादा करते हैं, जबकि गंगा मैया का उद्घोष व जयकारे रात दिन गूंजते हैं।

पूर्वजों को दीपदान भी करते

कार्तिक पूर्णिमा पर लोग अपने पूर्वजों की मुक्ति के लिए दीपदान और पिंडदान भी करते हैं। दूरदराज से लोग यहां पहुंचते हैं और पहले गंगा में डुबकी लगाकर स्नान व पूजा भी करते हैं। मान्यता है पूर्वजों की मुक्ति का मार्ग खुलता है।

- पिकनिक स्पाट से कम नहीं गंगा घाट

मखदूमपुर घाट पर बच्चे व बड़े मस्ती में रहते हैं। जगह-जगह कबड्डी, कुश्ती के साथ अन्य संसाधनों से मनोरंजन करते हैं। वहीं, भैंसा दौड़ भी विशेष है। इसके लिए लोग काफी समय से तैयारी शुरू कर देते हैं।

वर्ष-1929 में मेला लगना हुआ शुरू

वर्ष-1929 में इस घाट पर गंगा मेला लगना शुरू हुआ। इससे पूर्व तहसील क्षेत्र परीक्षितगढ़ ब्लाक स्थित खरकाली घाट पर लगता था। प्रथम पत्रकार रहे स्व. रामजीदास हितैषी स्वतंत्रता सेनानी एवं तत्कालीन सेवानिवृत्त डीएसपी स्व. ठाकुर रुमाल के प्रयासों से 1929 में इस मेले को खरकाली से मखदूमपुर घाट पर लेकर आए थे। दीपावली से 15 दिन बाद मेला लगता है। वर्षों से यह क्रमवार लगा आ रहा है।

गंगा मेला लगाने को प्रशासन जल्द ले निर्णय

मवाना : मखदूमपुर गंगा घाट पर कार्तिक पूर्णिमा पर लगने वाला मेला दो वर्ष से कोरोना महामारी की भेंट चढ़ गया। वर्ष -2018 में मेले का आयोजन हुआ जबकि वर्ष 2019-20 में जिला प्रशासन ने अनुमति नहीं दी थी। अब सभी बंदिशे खत्म हो गयी तो मेला आयोजन का दबाव बढ़ गया। जबकि जलभराव के बावजूद भी श्रद्धालु मेला आयोजन की अनुमति चाहते हैं।

क्या कहते है गणमान्य

- मखदूम प्रधान भारत सिंह का कहना है मेला आस्था व अर्थव्यवस्था से जुड़ा है। स्थानीय लोग मेले के माध्यम से जीविका चलाते हैं। गढ़मुक्तेश्वर की भांति यहां भी मेला आयोजन की अनुमति दें।

- पूर्व प्रधान राजकुमार का कहना है यह आस्था व संस्कृति से का प्रतीक है। यह आगे भी चलती रहे मेले की अनुमति दी जानी चाहिए।

- दूधली खाद के प्रधान बालेश्वर प्रसाद ने कहा कि मखदूमपुर मेला आस्था, श्रद्धा और अर्थ का मेला है। गरीबों लोगों की जीविका चलती है। अनुमति मिलनी चाहिए।

- दूधली के पूर्व प्रधान लीलू का कहना है कि दूर दराज के लोग भी गंगा में पुण्य के लिए आते हैं। स्थानीय लोग तो यहां जुड़े ही हैं। मेला आयोजन को व्यवस्था करने अनुमति देनी चाहिए।

यह बोले अफसर

गंगा का जल स्तर कम हुआ है लेकिन खादर क्षेत्र में जलभराव बना हुआ है। मेला स्थल पर भी कई फिट पानी है। एक दो दिन में यथा स्थिति की रिपोर्ट आलाधिकारियों को सौंप देंगे।

- कमलेश गोयल, एसडीएम, मवाना।

डाउनलोड करें हमारी नई एप और पायें अपने शहर से जुड़ी हर जरुरी खबर!

रोमांचक गेम्स खेलें और जीतें
एक लाख रुपए तक कैश अभी खेलें

This website uses cookie or similar technologies, to enhance your browsing experience and provide personalised recommendations. By continuing to use our website, you agree to our Privacy Policy and Cookie Policy.
You have used all of your free pageviews.
Please subscribe to access more content.
Dismiss
Please register to access this content.
To continue viewing the content you love, please sign in or create a new account
Dismiss
You must subscribe to access this content.
To continue viewing the content you love, please choose one of our subscriptions today.