केदारनाथ त्रासदी में अपनों के अंतिम दर्शन भी नहीं कर सके थे स्वजन

आठ साल पहले 16 जून 2013 को उत्तराखंड के केदारनाथ धाम में आसमान से आफत बनकर

JagranWed, 16 Jun 2021 10:15 AM (IST)
केदारनाथ त्रासदी में अपनों के अंतिम दर्शन भी नहीं कर सके थे स्वजन

मेरठ,जेएनएन। आठ साल पहले 16 जून 2013 को उत्तराखंड के केदारनाथ धाम में आसमान से आफत बनकर बरसी बारिश ने ऐसी तबाही मचाई थी कि उसके जख्म ताउम्र नहीं भर सकेंगे। इस आपदा में छह हजार से ज्यादा लोग लापता हो गए थे। मारे जाने वालों का आधिकारिक आंकड़ा अब तक साफ नहीं हुआ है। इन लापता लोगों में मेरठ के भी बहुत सारे लोग थे। उनके स्वजन उस भयावह मंजर को याद कर सिहर उठते हैं। अपनों को खोने का गम उनकी आंखों से छलक आता है। बस, यही कहते हैं कि काश, अपनों के अंतिम दर्शन तो नसीब हो जाते।

माता-पिता को खोया था, जीवनभर नहीं भरेंगे ये जख्म

गढ़ रोड स्थित पंचशील कालोनी निवासी दानिश शर्मा ने केदारनाथ त्रासदी को याद करते हुए बताया कि उनके पिता गिरीश कुमार शर्मा और माता प्रोमिला शर्मा केदारनाथ यात्रा पर गए थे। 15 जून को वह पहुंच गए थे। 16 जून को चढ़ाई शुरू की थी। उसी दिन तबाही आ गई। जिसमें माता-पिता लापता हो गए। आखिरी बार उनसे जब बात हुई थी तब गौरीकुंड में थे। इसके बाद उनसे फिर संपर्क नहीं हुआ। दानिश ने बताया कि माता-पिता के शव भी नहीं मिले। माता-पिता के साथ चालक गया था, जो उन्हें गौरीकुंड छोड़कर वापस आ गया था। इसलिए वह बच गया। दानिश कहते हैं कि हर साल इस दिन अपने भाई-बहन के साथ उन्हें श्रद्धांजलि देकर याद करते हैं। बस, उनकी यादों के सहारे जीवन चल रहा है। गिरीश कुमार शर्मा कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सतीश शर्मा के बड़े भाई थे।

18 लोगों का समूह गया था, लौटे थे सिर्फ दो

डालमपाड़ा निवासी आकाश मांगलिक ने भी इस आपदा के जख्म सहे हैं। वह बताते हैं कि उनके पिता भुवनेश चंद मांगलिक और माता स्नेह मांगलिक केदारनाथ धाम गए थे। उनके साथ कुल 18 लोगों का समूह गया था। माता-पिता को छोड़कर सभी उनके मित्र थे। आपदा से बचकर केवल दो लोग ही लौटे थे। माता-पिता समेत समूह के 16 लोग नहीं बच सके। आकाश बताते हैं कि माता-पिता से आपदा आने के दो दिन पहले फोन पर बात हुई थी। वह रामबाड़ा पहुंच चुके थे। इसके बाद से उनसे संपर्क नहीं हुआ। 16 जून को आपदा के बाद परिवार टूट गया था। हर कोई उनके लौटने की घड़ियां गिन रहा था। लेकिन कुदरत की तबाही के आगे सब बेबस थे। उन्हें इस बात का दर्द है कि वे अपने माता-पिता का अंतिम संस्कार तक नहीं कर पाए।

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