समय रहते सरकार को कारगर कदम उठाने होंगे

दुर्गेश तिवारी, मेरठ । अमेरिकी डॉलर के मुकाबले गिर रहे रुपये ने सरकार के माथे पर चिंता की लकीरें ला दी हैं। बैठे-बिठाए विपक्ष को भी सियासी मुद्दा दे दिया है। गिरते रुपये का असर महंगाई के रूप में आम आदमी को भी दिखने लगा है। गिरता रुपया कितना हानिकारक? इसी विषय पर इस सोमवार दैनिक जागरण की अकादमिक संगोष्ठी में भी विमर्श हुआ। वक्ता थे चौ. चरण सिंह विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र विभाग के प्रोफेसर अतवीर सिंह..

अतिथि के विचार

अमेरिकन डॉलर के सापेक्ष भारतीय रुपया ही नहीं तमाम देशों की मुद्राएं कमजोर हो रही हैं। इस गिरावट के पीछे वैश्रि्वक वजहें हैं। अगर आप गिरावट की दर देखेंगे तो रुपया कम ही गिरा है। फिर भी चिंता का विषय तो है ही। आयात होने वाली वस्तुएं महंगी होंगी, पेट्रोल डीजल का दाम बढ़ने से माल भाड़ा भी बढ़ेगा। रुपये के कमजोर होने का तात्कालिक असर महंगाई के रूप में हमारे सामने है। इसके दीर्घकालिक परिणाम भी सामने आएंगे।

अर्थव्यवस्था : देश का चालू खाता घाटा बढ़ेगा। हमारे विदेशी मुद्रा भंडार पर भी असर पड़ेगा। अर्थव्यवस्था में पूंजी प्रवाह के अचानक रुकने या अन्यत्र दिशा बदलने का जोखिम भी उठाना पड़ सकता है। इससे सीधे-तौर पर उद्योग धंधे प्रभावित होंगे। पूंजी प्रवाह के विचलित होने पर बेरोजगारी की समस्या के और भयावह होने के खतरे भी हैं।

तेल बाजार : भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा पेट्रोलियम पदार्थो का आयातक देश है। तेल की जरूरतों को फिलहाल हम करने की स्थिति में नहीं हैं। इसका आयात हमें करना ही पड़ेगा। महंगे तेल की मार देश के आम आदमी से लेकर खास आदमी तक पड़ेगी ही। तेल सीधा असर डालता है, जो सरकार के खिलाफ पब्लिक का गुस्सा बढ़ने का कारक भी बनता है।

विदेशी शिक्षा और पर्यटन : विदेश में रहकर पढ़ाई करने वाले छात्रों, उनकी फीस, यात्रा व्यय, क्रय क्षमता पर गिरते रुपये का नकारात्मक असर होगा। विदेश जाने वाले पर्यटकों को भी ज्यादा कीमत अदा करनी पड़ेगी। उठाने होंगे कारगर कदम

कमजोर होता रुपया शेयर बाजार में विदेशी निवेश को प्रभावित करेगा। अर्थ व्यवस्था की गति बनाए रखनी है तो समय रहते सरकार और रिजर्व बैंक को कारगर कदम उठाने होंगे। नहीं तो संपूर्ण विकास और उसके कारकों जैसे निवेश, निर्यात, उपभोग और सार्वजनिक व्यय पर प्रतिकूल प्रभाव होगा। इनसेट

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क्या होती है विनिमय दर

दो अलग अलग देश की मुद्राओं के सापेक्षिक दर अर्थात एक मुद्रा के सापेक्ष दूसरी मु्रद्रा के मूल्य को विनिमय दर कहते हैं। इसका निर्धारण तीन तरह से होता है।

अस्थाई विनिमय दर : मुद्रा का मूल्य निर्धारण बाजार में उसकी मांग और आपूर्ति के आधार पर तय किया जाता है। वर्तमान में भारतीय मुद्रा पर अस्थायी विनिमय दर ही लागू है।

स्थिर विनिमय दर : मुद्रा का मूल्य निर्धारण सरकार द्वारा तय किया जाता है। जिसमें एक से तीन प्रतिशत तक की उतार-चढ़ाव की अनुमति दी जाती है। तीन बार अवमूल्यन

किसी भी देश को जब अपने प्रतिकूल भुगतान में संतुलन सही करना होता है तो वह मुद्रा का अवमूल्यन करता है। जिसमें आयात महंगे होते हैं और निर्यात सस्ते। अवमूल्यन का मतलब होता है कि घरेलू मुद्रा के बाह्य मूल्य में कमी होना, जबकि आंतरिक मूल्य में स्थिरता होना। 1947 से लेकर अबतक तीन बार रुपये का अवमूल्यन हो चुका है।

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