मेरठ के तीर्थस्‍थल: भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत से एक दिन पहले स्वतंत्रता सेनानियों को किया था गिरफ्तार

मोदीपुरम के डोरली स्थित दयानंद महाविद्यालय गुरुकुल इंटर कालेज को किसी पहचान की जरूरत नहीं है। प्रथम स्वाधीनता संग्राम के दिनों में यह स्वतंत्रता सेनानियों की पनाहगाह रही थी। भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत से एक दिन पहले यहां से स्वतंत्रता सेनानियों को गिरफ्तार भी किया गया था।

Fri, 06 Aug 2021 05:15 AM (IST)
भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत से एक दिन पहले स्वतंत्रता सेनानियों को किया था गिरफ्तार

मेरठ,जेएनएन। मोदीपुरम के डोरली स्थित दयानंद महाविद्यालय गुरुकुल इंटर कालेज को किसी पहचान की जरूरत नहीं है। प्रथम स्वाधीनता संग्राम के दिनों में यह स्वतंत्रता सेनानियों की पनाहगाह रही थी। भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत से एक दिन पहले यहां से स्वतंत्रता सेनानियों को गिरफ्तार भी किया गया था। यहां करीब दो सौ वर्ष पुराने वट वृक्ष और पीपल वृक्ष की शाखाएं स्वतंत्रता संग्राम के दिनों की कहानी बयां करती हैं।

दयानंद महाविद्यालय गुरुकुल इंटर कालेज के प्रधानाचार्य डा. आरके सिंह बताते हैं वर्ष 1924 को गुरुकुल की स्थापना हुई थी। पं. अलगूराय शास्त्री ने एक झोपड़ी में आठ बच्चों से गुरुकुल की शुरुआत की थी। पल्हैड़ा गांव निवासी जमींदार पं. शिवदयालू और डोरली के एक अन्य जमींदार ने अपनी 108 बीघा जमीन गुरुकुल और खेती के लिए दी थी। इसके अलावा 25 बीघा जमीन पर खेल का मैदान बनाया गया था। महर्षि दयानंद सरस्वती अपने जीवनकाल में सात बार मेरठ आए और सातों बार वह गुरुकुल में पहुंचकर यहां प्राचीन वट वृक्ष व पीपल वृक्ष के नीचे बैठकर ध्यान लगाते थे। नवंबर 1929 में पत्नी कस्तूरबा गांधी के साथ महात्मा गांधी भी गुरुकुल में आए थे। उनके बाद दो दिन के लिए लालबहादुर शास्त्री भी यहां ठहरे थे।

आठ अगस्त 1942 को भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत होनी थी। इससे एक दिन पहले ही अंग्रेजी हुकूमत ने गुरुकुल से पं. शिवदयालू और आचार्य लेखराम शास्त्री को गिरफ्तार कर जेल में बंद कर दिया था। पूर्व प्रधानमंत्री भी रह चुके हैं गुरुकुल प्रबंध समिति के अध्यक्ष वर्तमान में दयानंद महाविद्यालय गुरुकुल इंटर कालेज जब वर्ष 1924 से 1954 के बीच गुरुकुल विद्यालय होता था, तब पूर्व प्रधानमंत्री स्व: चौ. चरण ¨सह भी प्रबंध समिति के अध्यक्ष रहे थे। उन्होंने अपने कार्यकाल में एक ट्यूबवेल गुरुकुल परिसर और दूसरा ट्यूबवेल गुरुकुल की कृषि भूमि पर लगवाया था, जो आज भी हैं।

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