चंद सांसें बची हैं, इलाज नहीं मिल रहा तो घर ले चलो

कोई देखने नहीं आ रहा। कोई दवा भी नहीं मिली। दर्द बढ़ता ही जा रहा है।

JagranFri, 23 Apr 2021 03:15 AM (IST)
चंद सांसें बची हैं, इलाज नहीं मिल रहा तो घर ले चलो

मेरठ,जेएनएन। कोई देखने नहीं आ रहा। कोई दवा भी नहीं मिली। दर्द बढ़ता ही जा रहा है। अब हिम्मत टूट रही है। लगता है कुछ ही सांसें बची हैं। इलाज करा दो या घर ले चलो। ये शब्द मेडिकल अस्पताल के कोविड वार्ड में भर्ती 21 वर्षीय गुड्डी के हैं जो किडनी में दिक्कत का इलाज कराने आई थी। हर मिनट फोन पर उसके मुंह से यह बातें सुनकर बाहर बैठी उसकी मां व अन्य स्वजन की आंखें छलक पड़ती।

टीबी से क्षतिग्रस्त हुई किडनी के इलाज को हापुड़ से मेरठ तक अस्पतालों में भटक रही गुड्डी जब मेडिकल तक पहुंची तो उसकी कोविड रिपोर्ट भी पाजिटिव आ गई। स्वजन ने सीएमओ से लेकर प्रमुख सचिव तक के नंबर मिला लिए लेकिन कोविड के अलावा कोई इलाज नहीं मिला। 12 घंटे से अधिक समय तक बिना इलाज तड़पने के बाद भी कोई सुनवाई न हुई तो अभिभावक गुड्डी को लेकर घर चले गए।

बिना स्वजन अस्पताल से कर दिया डिस्चार्ज

हापुड़ में रामगढ़ी निवासी गुड्डी की मां राजकली अपने दामाद वीरेंद्र त्रिपाठी और रिश्तेदार मोनू के साथ मेडिकल कालेज पहुंची थी। वीरेंद्र के अनुसार गुड्डी को किडनी के इलाज के लिए हापुड़ के देवनंदिनी अस्पताल ले गए। वहां से जेएस अस्पताल रेफर कर दिया गया। जेएस अस्पताल में बुधवार रात स्वजन की गैरमौजूदगी में गुड्डी को डिस्चार्ज कर एंबुलेंस से सरस्वती अस्पताल भेज दिया। सरस्वती अस्पताल ने भर्ती करने से मना कर दिया। तब रात को ही मेडिकल कालेज लेकर पहुंचे। देवनंदिनी में जांच के बाद कोविड की रिपोर्ट पाजिटिव आई थी तो गुड्डी को कोविड वार्ड में ही रखा गया लेकिन किडनी की कोई दवा नहीं दी गई।

गुहार लगाई पर सुनवाई न हुई

वार्ड के भीतर दर्द से तड़प रही गुड्डी के बार-बार फोन करने पर वीरेंद्र ने दर्द का इलाज करने की गुहार लगाई लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। उन्होंने सीएमओ के नंबर पर शिकायत भी की। इसके बाद प्रमुख सचिव के पीएस से बात कर जानकारी दी। वहां से फोन आने के बाद भी कोविड मरीज को कोई और उपचार नहीं दिया जा सका। दोपहर साढ़े तीन बजे के बाद भी कोई सुनवाई न होने पर अभिभावक गुड्डी को मेडिकल कालेज से निकालकर घर ले गए। वीरेंद्र ने बताया कि कोविड रिपोर्ट में कोई अस्पताल तो भर्ती नहीं करेगा, घर में कम से कम हम दर्द की दवा तो दे सकेंगे।

अस्पतालों की दौड़ भी न दिला सकी इलाज : बीमारी में अटकी सांसों को प्राण वायु देने के लिए लोग अस्पतालों की ओर ही दौड़ लगाते हैं। लेकिन वहां भी संसाधन की कमी जब जीवन की डोर थामने के रास्ते में रुकावट बन जाए तो लोग कहां जाएं। बुलंदशहर के टीपी सिंह को गुरुवार को जीवन की कमजोर डोर थामे इसी तरह अस्पतालों के चक्कर काटने पड़े लेकिन कोई मदद न मिल सकी। बुलंदशहर, गाजियाबाद, हापुड़ होते हुए एंबुलेंस में टीपी सिंह को आक्सीजन सपोर्ट के साथ उनके बेटे ने 16 अस्पतालों में भर्ती करने की गुहार लगाई, लेकिन हर जगह आक्सीजन का बेड खाली न होने की बात कह कर उन्हें लौटा दिया गया। मेरठ में आनंद, न्यूटिमा, संतोष, लोकप्रिय आदि अस्पतालों में न सुनने के बाद जब दोपहर करीब पौने एक बजे मेडिकल कालेज पहुंचे तो भी निराशा ही हाथ लगी।

मेडिकल कालेज में टीपी सिंह को भर्ती कराने के लिए करीब डेढ़ घंटे चक्कर काटने के बाद भी कोई सहारा नहीं मिला। यहां भी आक्सीजनयुक्त बेड न होने का हवाला देकर मना कर दिया गया। न कोई जांच हुई और न ही किसी ने हालत देखने की जहमत ही उठाई। मेरठ में भी कोई मदद न मिलने पर टीपी सिंह के स्वजन उन्हें वापस बुलंदशहर के खुर्जा में भर्ती कराने के लिए लेकर चले गए। दर-दर भटकने से परेशान टीपी सिंह के बेटे से पूछने पर उन्होंने अपनी परेशानियों का हवाला देते हुए कोई और बात करने से इन्कार कर दिया और मायूस होकर मेडिकल कालेज से निकल गए।

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