Defeated Corona In Meerut: वेंटिलेटर पर कोरोना को हराकर 130 दिन बाद सकुशल निकले विश्वास, डाक्‍टर भी हैरान

Defeated Corona In Meerut अंतत मेरठ के विश्‍वास ने कोरोना को हराने में सफलता हासिल की। उनका आक्सीजन लेवल 16 तक पहुंच गया था। छाती में संक्रमण इतना कि सीटी स्कोर 25 में 25 मिलालेकिन उन्‍होंने मौत को मात दे दी है।

Prem Dutt BhattTue, 14 Sep 2021 03:00 PM (IST)
मेरठ में विश्‍वास 28 अप्रैल को पाजिटिव मिले थे, अब उन्‍होंने कोरोना को मात दे दी है।

मेरठ, जागरण संवाददाता। Defeated Corona In Meerut मेरठ में बीमारी कितनी भी भयंकर क्यों न हो... जीत नियति की होती है। कोरोना संक्रमण से 130 दिनों तक जूझने के बाद विश्वास सैनी डिस्चार्ज हुए, जिन्हें देखकर डाक्टर भी हैरान हैं। विश्वास का आक्सीजन लेवल 16 तक पहुंच गया था। छाती में संक्रमण इतना कि सीटी स्कोर 25 में 25 मिला, लेकिन जिंदगी ने मौत को शिकस्त दे दी। अब लंग्स के टिश्यू भी ठीक हो रहे हैं।

छह बार सीटी जांच करानी पड़ी

ईश्वरपुरी निवासी 39 साल के विश्वास सैनी आर्थोपेडिक सर्जन डा. एमसी सैनी एवं डा. ऋषभ सैनी के भाई हैं। डा. ऋषभ ने बताया कि विश्वास 28 अप्रैल को संक्रमित हुए, लेकिन दो मई को तबीयत बिगडऩे पर न्यूटिमा अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। तबीयत बिगड़ती चली गई। छाती की सीटी जांच कराई तो दोनों फेफड़े पूरी तरह सफेद मिले। सीटी स्कोर 25 देखकर डाक्टरों के होश उड़ गए। डा. सैनी ने बताया कि सीटी स्कोर 22 वाले मरीजों की भी जिंदगी बचानी बेहद मुश्किल होती है। विश्वास का इलाज न्यूटिमा में छाती रोग विशेषज्ञ डा. आयुष जैन एवं क्रिटिकल केयर विशेषज्ञ डा. अवनीत राणा की अगुआई में चला। जहां थोड़ी राहत मिलने के बाद उन्हें सैनी आर्थोपेडिक सेंटर में भी भर्ती किया गया।

ब्लैक फंगस से बचाने की दवा एडवांस में दी

डा. एमसी सैनी का कहना है कि भर्ती होने के 15 दिन में रिपोर्ट निगेटिव आ गई थी, लेकिन कोरोना संक्रमण गहरा था। इंफ्लामेट्री मार्कर काफी बढ़े हुए थे। सीआरपी-सी रिएक्टिव प्रोटीन छह से कम होना चाहिए, जो 82 था। डी-डाइमर 500 से कम होना चाहिए, जिसकी मात्रा 6000 तक मिली। वहीं, इंटरल्यूकिन-6 की मात्रा एक से कम होनी चाहिए, जो 12 तक पहुंच गई थी। डेढ़ माह तक वेंटिलेटर पर रहने की वजह से जिंदगी की कोई उम्मीद नहीं बची थी, लेकिन मरीज को चमत्कारिक तरीके से नई जिंदगी मिल गई।

इनका कहना है...

मरीज बेहद गंभीर था। उनके मुंह पर मास्क लगाकर वेंटिलेटर लगाया गया, जिसे नान इनवैसिव कहा जाता है। इससे निमोनिया से बचाने का प्रयास किया गया। इम्युनोग्लोबलिंस भी दिया गया। चमत्कारिक तरीके से मरीज की बचाने में सब कामयाब रहे।

- डा. अवनीत राणा, क्रिटिकल केयर विशेषज्ञ

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