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Coronavirus Meerut News: विचार करिए, क्यों औंधे मुंह पड़ा है कोरोनारोधी आपदा प्रबंधन

कोरोना के भयावह संक्रमण के बीच कई घिनौने कृत सामने आए।

कोरोना के भयावह संक्रमण से मचे हाहाकार के बीच हाथ से छूटती व्यवस्थागत चीजों ने हालात को खौफनाक बना दिया है। पढ़ि‍ए आक्‍सीजन की किल्‍लत से लेकर रेमडेसिविर की कालाबाजारी व कफन चोरी के घिनौने कृत पर चोट करती हुई यह लेख।

Himanshu DwivediMon, 10 May 2021 11:24 AM (IST)

[जय प्रकाश पांडेय] मेरठ। कोरोना के भयावह संक्रमण से मचे हाहाकार के बीच हाथ से छूटती व्यवस्थागत चीजों ने हालात को खौफनाक बना दिया है। आक्सीजन के लिए मची आपाधापी के बीच यह समझना मुश्किल नहीं है कि बिल्कुल अचानक ही यह प्राणरक्षक गैस कालाबाजारी का शिकार क्यों हो गई। पैसे के लालच में आपदा के असुर जब कफन तक की चोरी करने लगें तो दो पल ठिठककर हमें सोचना जरूर चाहिए कि हमारे सामाजिक ढांचे के नट-बोल्ट ढीले कैसे हो गए। यह बेशर्मी की हद तक गिर जाने वाला अपराध आखिर कोई कर कैसे सकता है कि जिंदगी के लिए जूझ रहे किसी इंसान को दिए जाने वाले जरूरी रेमडेसिविर की जगह उसे नकली इंजेक्शन थमा दिया जाए, हम सभी साक्षी हैं कि यह जघन्य कृत्य भी हुआ है और हो रहा है।

नकली प्लाज्मा बेचने के मामले सामने आ रहे हैं। जरूरी दवाएं बाजार से गायब हैं अथवा जमाखोरों की करतूतों से उनकी कीमतें आसमान पर हैं। पचीस-पचास रुपये में बिकने वाले मास्क अब तीन सौ रुपये में भी नहीं मिल रहे। आक्सीजन सिलेंडर के नाब-नाजिल कई गुना ज्यादा कीमत पर भी नहीं मिल रहे, सैनिटाइजर भी नकली थमा दिए जा रहे, पैरासीटामाल जैसी आम दवा भी गायब होने को है। क्या यह सब केवल किल्लत है अथवा आपदा प्रबंधन के नकारापन का परिणाम है, सोचना होगा हमें।

सिलेंडरों में आक्सीजन भरवाने के लिए प्लांटों के बाहर धूप में घंटों कतार में खड़े बेबस आम आदमी के लिए हमारा प्रशाशकीय सिस्टम, हमारा राजनीतिक सिस्टम और हमारा सामाजिक सिस्टम यदि छांव के लिए एक अदद तिरपाल, पीने के लिए पानी, खाने के लिए बिस्किट, और सांत्वना के दो मीठे बोल नहीं बोल सकता, तो भी हमें सोचना चाहिए कि गड़बड़ी कहां है। अफसर कह रहे हैं कि यदि कोई अस्पताल आपसे आक्सीजन भरे सिलेंडर की मांग करे तो तत्काल कंट्रोल रूम को सूचित करें। ऐसे में सवाल है कि प्लांटों के बाहर खड़े ये हजारों लोग कौन हैं जो एक अदद सिलेंडर भरवाने के लिए अपना सब कुछ देने को तैयार हैं। उससे भी बड़ा सवाल यह कि कौन हैं वो लोग, जो इन्हें भेज रहे हैं आक्सीजन प्लांटों की ओर। होम आइसोलेशन में चल रहे कोरोना संक्रमितों के लिए आक्सीजन लेने वालों की जरूरत तो समझ में आती है, लेकिन इस भीड़ में ऐसे तमाम लोग भी कतारबद्ध मिलते हैं जिन्हें किसी न किसी अस्पताल ने इस निर्देश के साथ यहां भेजा होता है कि आक्सीजन नहीं देंगे आप तो आपका मरीज अस्पताल में नहीं रह पाएगा। ऐसे कितने अस्पतालों पर हमने लगाम कसी!! प्रबंधन की बात करें तो हम मांग के सापेक्ष आक्सीजन और दवाओं की आपूíत ही नहीं कर पा रहे हैं। हमारे स्थानीय प्रशासन ने नगर में तीन जगहों पर ऐसे केंद्र खोल दिए हैं जहां आप आक्सीजन के लिए बुकिंग करा सकते हैं, गैस आपको चौबीस घंटे बाद मिलेगी। सोच कर देखिए, मरीज को आक्सीजन तुरंत चाहिए, हम उसे देंगे कल। जरा 30 सेकेंड सांस रोककर देखिए, पता चल जाएगा कि सांस होती क्या चीज है। जिस मरीज के लिए एक-एक सांस भारी पड़ रही है, उसके स्वजन को हमारा सिस्टम समझा रहा है कि आक्सीजन कल ले जाना।

आज आम आदमी पूछ रहा है कि क्या तमाशा है भाई, क्यों नहीं सुधर रही व्यवस्था!! ..और यह भी कि कहां हैं हमारे जनप्रतिनिधि!! वक्त कितना ही खराब क्यों न हो, उसकी एक अच्छी बात यह भी है कि वो भी गुजर जाता है। अब ये हमारे जनप्रतिनिधियों और कोरोनारोधी प्रबंधन में लगे जिम्मेदारों के ऊपर है कि वो इस खराब वक्त में कितनी देर आम आदमी के साथ खड़े रहते हैं। मत भूलिए, आम आदमी की याददाश्त होती बहुत अच्छी है। 

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