गलवन में चीन से घमासान : मेरठ के मेजर अरुण कुमार ने भी किए थे दुश्मन के दांत खट्टे Meerut News

गलवन की लड़ाई को एक साल का समय पूरा हो चुका है। इस एक साल में मेजर अरुण कुमार को केवल तीन दिन की छुट्टी मिली जिसमें चचेरी बहन की शादी में घर पहुंच सके। पिछले महीने ही चार मई को सगाई और पांच को शादी हुई।

Prem Dutt BhattTue, 15 Jun 2021 03:00 PM (IST)
15 जून 2020 की रात हुई मुठभेड़ में चीनी सैनिकों को चटाई थी धूल।

मेरठ, जेएनएन। लद्दाख के गलवन की वादियां 15 जून 2020 की रात चीनी सैनिकों की हरकतों को मिले भारतीय सेना के करारे जवाब की गवाह हैं। बिना किसी आग्नेयास्त्र के लाठी-डंडों से हुई लड़ाई में भारतीय जांबाजों ने अपने रक्त की चिंता किए बिना दोगुने चीनी सैनिकों को लहूलुहान कर दिया। इस मुठभेड़ में मेरठ के मेजर अरुण कुमार भी शामिल थे। आमने-सामने की लड़ाई में मेजर अरुण कुमार भी वीरता और अदम्य साहस का परिचय देते हुए देश की आन की खातिर चौतरफा चीनी सैनिकों से घिरने के बावजूद लड़ते रहे। स्वयं जमीन पर गिरने से पहले कई सैनिकों को दबोचा। बुरी तरह जख्मी होने के बाद एक महीने अस्पताल में उपचाराधीन रहे और 16 जुलाई 2020 को ही पुन: उसी सीमा पर दुश्मन का सामना करने पहुंच गए थे।

केवल तीन दिन की मिली छ्ट्टी

गलवन की लड़ाई को एक साल का समय पूरा हो चुका है। इस एक साल में मेजर अरुण कुमार को केवल तीन दिन की छुट्टी मिली, जिसमें चचेरी बहन की शादी में घर पहुंच सके। पिछले महीने ही चार मई को सगाई और पांच को शादी हुई। तभी तीन दिन की छुट्टी लेकर पहुंच सके थे। अप्रैल में मेजर अरुण की पोङ्क्षस्टग दिल्ली में हुई। वह वर्तमान में कर्नल रैंक की परीक्षा की तैयारी में जुटे हैं।

शरीर पर कई जगह आई थीं चोटें

गलवन में भारतीय टुकड़ी पर चीनी सैनिकों के हमले की खबर मिलने पर मेजर अरुण दूसरी टुकड़ी के साथ मौके पर पहुंचे थे। रात साढ़े 11 बजे गलवन नदी के किनारे अंधेरे में दोनों ओर से हमले शुरू हुए। कंटीले तारों को डंडों में लपेटकर आए चीनी सैनिकों को पहले हमले में बढ़त जरूर मिली, लेकिन भारतीय जांबाजों के जवाबी हमले में चीनी सैनिक जान बचाकर भागने लगे। इस दौरान मेजर अरुण को दोनों कंधों, पैरों, पसली और आंख में कांटेदार डंडे व पत्थरों से चोटें आई थीं।

तीसरी पीढ़ी कर रही देश सेवा

रोहटा रोड पर नंद विहार निवासी मेजर अरुण कुमार के पिता सूबेदार ओमप्रकाश ने कारगिल के युद्ध में हिस्सा लिया था। वहीं, उनके दादा स्व. सूबेदार शिवचरण वर्ष 1948 से 1974 तक सेना में रहे और 1962, 1965 और 1971 की लड़ाइयों का हिस्सा रहे। सूबेदार ओमप्रकाश कारगिल युद्ध में 55 ब्रिगेड के एम्युनिशन सपोर्ट दल के साथ रहे और बोफोर्स गनों के लिए गोले सप्लाई करते थे।

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