आक्सीजन पाइप लाइन से भी संक्रमित हो रहा ब्लैक फंगस

ब्लैक फंगस महज स्टेरायड की ओवरडोज और अनियंत्रित शुगर से ही नहीं हो रहा।

JagranSun, 16 May 2021 09:15 AM (IST)
आक्सीजन पाइप लाइन से भी संक्रमित हो रहा ब्लैक फंगस

मेरठ,जेएनएन। ब्लैक फंगस महज स्टेरायड की ओवरडोज और अनियंत्रित शुगर से ही नहीं हो रहा, बल्कि इसके पीछे आक्सीजन पाइपलाइन की गंदगी भी जिम्मेदार है। ब्लैक फंगस ज्यादातर उन्हीं मरीजों में मिल रहा है जो आक्सीजन सपोर्ट पर रहे। मरीज को नम आक्सीजन देने के लिए प्रयोग किए जाने वाले ह्यूमिडीफायर में फंगस बन सकता है। एंटी सेप्टिक विलयन से इसकी नियमित सफाई करनी चाहिए लेकिन आइसीयू बेडों पर मरीजों की भीड़ और होम आइसोलेशन में आक्सीजन सपोर्ट देने से भी ब्लैक फंगस का प्रकोप बढ़ा है।

नमी पाते ही बढ़ता है फंगस

मेडिकल कालेज के नेत्र रोग विशेषज्ञ डा. लोकेश बताते हैं कि इम्युनोसप्रेशन की दवा लेने, स्टेरायड खाने वाले, आइसीयू में भर्ती रहने एवं अनियंत्रित शुगर के मरीजों में यह ज्यादा देखा गया है। लेकिन मरीजों को आक्सीजन सप्लाई वाली पाइपलाइन को साफ न करने से भी फंगस तेजी से पनपता है। न्यूटिमा अस्पताल के क्रिटिकल केयर विशेषज्ञ डा. अवनीत राणा बताते हैं कि फंगल संक्रमण से बचने के लिए आक्सीजन के लिए कापर वाली पाइपलाइन का प्रयोग करते हैं फिर भी इसकी नियमित सफाई जरूरी है। इसके लिए एक रजिस्टर बनाया गया है जिसमें रोजाना सफाई का समय मेंटेन होता है। नमी होने पर एल्गी व फंगस होता है। पानी वाले कंटेनर से नम होकर आक्सीजन मरीज तक पहुंचती है, जहा फंगस बनने का खतरा सर्वाधिक है। किडनी ट्रासप्लाट, कैंसर, टीबी व अन्य गंभीर मरीजों में फंगल संक्रमण का खतरा ज्यादा देखा गया है।

इनका कहना है..

फंगस कई प्रकार के हैं लेकिन म्यूकर माइकोसिस ज्यादा खतरनाक है। बेहतर अस्पतालों में कापर पाइपलाइन के जरिए आक्सीजन देते हैं जिसमें संक्रमण की आशका कम होती है। मरीजों को ड्राई आक्सीजन देना खतरनाक है, इसीलिए नम आक्सीजन देने के लिए पानी का कंटेनर प्रयोग होता है। इसे रोज साफ करना जरूरी है।

- डा. अवनीत राणा, क्रिटिकल केयर विशेषज्ञ, न्यूटिमा फंगस नाक, बलगम, गमला, मिट्टी एवं वातावरण में रहता है लेकिन बेहद कमजोर प्रतिरोधक क्षमता वाले मरीजों को जल्दी पकड़ता है। ब्लैक फंगस के कई मरीज ऐसे मिले जिन्हें घर पर आक्सीजन सपोर्ट दिया गया। यहा पर पानी का कंटेनर लोगों ने कई दिनों तक साफ नहीं किया, और फंगस कमजोर प्रतिरोधक क्षमता वाले मरीज की नाक तक जा पहुंचा।

- डा. अभिषेक सिंह, ईएनटी विशेषज्ञ ब्लैक फंगस की दवाएं महंगी, बाजार से गायब : कोरोना महामारी अपने साथ ब्लैक फंगस का खतरनाक साइड इफेक्ट भी ले आई। मेडिकल कालेज समेत कई अस्पतालों में इसके दर्जनों मरीज मिल चुके हैं, लेकिन इनको दवाएं उपलब्ध नहीं हो पा रही हैं। वैकल्पिक दवाओं से इलाज करना पड़ रहा है, वहीं कई मरीजों का आपरेशन कर प्रभावित अंगों को निकालना भी पड़ा है।

मेडिकल कालेज के प्राचार्य डा. ज्ञानेंद्र सिंह बताते हैं कि ब्लैक फंगस के पाच मरीज मिल चुके हैं, जिनमें दो को रेफर किया गया। उनके इलाज के लिए अम्फोटेरिसिन-बी इंजेक्शन की भारी कमी है। इन मरीजों को 14 दिनों तक इलाज देना पड़ता है। निजी अस्पतालों ने दिल्ली से दवाएं मंगवाई हैं। खैरनगर बाजार में ब्लैक फंगस ही नहीं, कोरोना में प्रयोग होने वाली कई साधारण दवाएं भी गायब हैं। मेडिकल कालेज के नेत्र रोग विशेषज्ञ डा. लोकेश ने बताया कि अम्फोटेरिसिन-बी इंजेक्शन सामान्य रूप से दो हजार रुपये में मिलता है, लेकिन बाजार में इस समय इसकी कीमत सात हजार रुपये तक पहुंचने की सूचना मिल रही है। दवा व्यवसायी रजनीश कौशल ने बताया कि ब्लैक फंगस के इलाज में आइसोकोनाजोल टेबलेट का भी प्रयोग होता है, जिसकी कमी पड़ गई है। पोसोकोनाजोल सीरप की कीमत 19 हजार तक बताई जा रही है। 100 मिलीग्राम की दस गोली की कीमत चार हजार रुपये है। प्रशासन ने दवाओं की उपलब्धता का प्रयास तेज कर दिया है लेकिन इलाज के अभाव में कई मरीजों की आख निकालनी पड़ गई है।

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