कालेज की यादों में खो गई पुरातन छात्राएं

कालेज की यादों में खो गई पुरातन छात्राएं

सालों पहले कालेज के जिस गेट के अंदर आते ही सहेलियों के साथ कहकहे शुरू हो जाते थे आज उसी कालेज में प्रवेश करते ही आंखें खुशी से भीग गई।

JagranMon, 01 Mar 2021 05:00 AM (IST)

मेरठ, जेएनएन। सालों पहले कालेज के जिस गेट के अंदर आते ही सहेलियों के साथ कहकहे शुरू हो जाते थे, आज उसी कालेज में प्रवेश करते ही आंखें खुशी से भीग गई। जिंदगी की दौड़ में बिछुड़ी सहेलियां पुरानी यादों में देर तक खोई रहीं। बातों में से बात निकली और सांझ हो गई। कुछ ऐसा ही नजारा था रविवार दोपहर आरजी पीजी कालेज परिसर का। यहां पुरातन छात्र समिति की ओर से वार्षिक रंगारंग कार्यक्रम आयोजित किया गया। इसमें वर्ष 1966 में पासआउट होने वाली छात्राओं ने भाग लेकर कालेज के दिनों की यादें ताजा की। सभी पुरातन छात्राओं का स्वागत पुष्पवर्षा व तिलक लगाकर किया गया।

कार्यक्रम की शुरुआत प्राचार्य डा. दीपशिखा शर्मा, मुख्य अतिथि दौलत राम कालेज दिल्ली विवि संगीत विभाग की एसोसिएट प्रो. दीप्ति बंसल (85 बैच), कृष्णा गौड़ (64 बैच), मनरेगा लोकपाल मेरठ मंडल अंजू त्यागी और पूर्व प्राचार्य मधु मित्तल ने दीप जलाकर की। सभी पूर्व छात्राओं ने विद्यालय गीत गाया। चौधरी चरण सिंह विवि की प्रतिकुलपति प्रो. वाई विमला ने आनलाइन अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई। पुरातन समिति की ओर से पांच पुरातन छात्राओं को सम्मानित किया गया। समिति की उपाध्यक्ष डा. संगीता कुमार ने माता प्रमिला मित्तल के नाम पर दस छात्राओं को छात्रवृत्ति प्रदान की। सुमन झुनझुनवाला ने सर्वाधिक अंक प्राप्त करने वाली दस छात्राओं को छात्रवृत्ति दी। कार्यक्रम में छात्राओं ने नृत्य और नाटिका प्रस्तुत की। संजीवनी संस्था की सदस्यों ने भी कृष्ण लीला प्रस्तुत कर सभी का मन मोह लिया। कार्यक्रम में डा. अमिता शर्मा, डा. अंजुला राजवंशी, डा. मंजरी पाल, अमृत अग्रवाल, शैल अग्रवाल और रेखा जैन भी उपस्थित रही।

इन पुरातन छात्राओं का हुआ सम्मान

1966 बैच शैली अग्रवाल

1969 बैच आशा शुक्ला

1970 बैच शारदा शर्मा

1971 बैच उषा बंसल

1971 बैच अमृत अग्रवाल इनका कहना है..

तब लड़कियों को इतनी आजादी नहीं थी

वर्ष 1969 में बीएससी करने वाली आशा शुक्ला ने बताया कि तब माहौल अलग था। लड़कियों को आज की तरह आजादी नहीं थी। हालांकि, कालेज में पढ़ाई का वातावरण तब भी उच्च कोटि का था। तब लड़कियों को बाहर पढ़ने और नौकरी की अनुमति कम ही परिवारों में दी जाती थी। गुरुजनों के प्रति श्रद्धा का भाव था

वर्ष 1970 में समाजशास्त्र से पीजी करने वाली शारदा शर्मा ने बताया कि आज उस समय का मंजर आंखों में तैर रहा है। छात्राओं और शिक्षिकाओं के बीच सम्मान और अपनापन था। उस समय गुरुजनों के प्रति श्रद्धा थी। जो आजकल के बच्चों में कम होती जा रही है।

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