ठा. बांकेबिहारी के प्राकट्य पर आज भक्ति के रंग में डूबेगा वृंदावन

संवाद सहयोगी वृंदावन ठा. बांके बिहारी आज 516 साल के हो जाएंगे। बांके बिहारी की प्राकट्

JagranWed, 08 Dec 2021 03:43 AM (IST)
ठा. बांकेबिहारी के प्राकट्य पर आज भक्ति के रंग में डूबेगा वृंदावन

संवाद सहयोगी, वृंदावन: ठा. बांके बिहारी आज 516 साल के हो जाएंगे। बांके बिहारी की प्राकट्य स्थली निधिवन राज में प्राकट्य उत्सव की तैयारियों को अंतिम रूप दिया जा रहा है। बुधवार की भोर में बांकेबिहारी के प्राकट्य उत्सव पर धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन होंगे। सुबह प्राकट्यस्थली का महाभिषेक और आरती होगी, तो बधाई गायन के बाद शोभायात्रा निकलेगी। इसमें स्वामी हरिदास ठाकुरजी को बधाई देने के लिए बांकेबिहारी मंदिर के लिए चांदी के रथ में सवार होकर निकलेंगे।

ठा. बांकेबिहारी के प्राकट्य स्थल निधिवन राज मंदिर में प्राकट्य उत्सव पर सुबह 5 बजे प्राकट्यस्थली का पंचामृत से अभिषेक होगा। उसके बाद बधाई गायन होगा और निधिवन से बांके बिहारी मंदिर तक भव्य शोभायात्रा निकाली जाएगी। शोभायात्रा निधिवन राज मंदिर से शुरू होकर नगर भ्रमण करते हुए दोपहर को राजभोग के समय मंदिर पहुंचेगी। यहां स्वामी हरिदास अपने लड़ैते ठा. बांकेबिहारी को बधाई अर्पित करेंगे। बाक्स -संगीत साधना से प्रकट हुए थे बांकेबिहारी

संगीत शिरोमणि स्वामी हरिदास ने अपनी संगीत साधना से ठा. बांके बिहारी महाराज का प्राकट्य किया। तभी से इस दिन को बिहार पंचमी के रूप में मनाया जाता है। निधिवन राज मंदिर और ठा. बांकेबिहारी मंदिर के सेवायत भीकचंद्र गोस्वामी ने बताया ठाकुरजी के प्राकट्य उत्सव पर 8 दिसंबर को मंदिर परिसर को रंग-बिरंगे फूलों और रोशनी से सजाया जाएगा। सुबह 5 बजे वेद मंत्रोच्चारण, केलिमाल के पदों के गायन के बीच ठा. बांकेबिहारी की प्राकट्य स्थली का दूध, दही, मेवा, घी, बूरा, शहद, गंगाजल, यमुना जल, केसर के इत्र और जड़ी बूटियों से महाभिषेक किया जाएगा। इसके बाद ठाकुरजी की विशेष आरती की जाएगी।

बाक्स -सम्राट अकबर भी हुए थे स्वामी हरिदास के कायल

स्वामी हरिदास का जन्म संवत 1535 में ब्राह्मण परिवार में हुआ था। बाद में वह वृंदावन में आकर बस गए थे। उन्होंने यमुना के किनारे घनी वृक्षावलियों के बीच अपनी साधना स्थली बनाया था। स्वामी हरिदास जी संगीत के जानकार थे। सम्राट अकबर के नवरत्नों में शुमार संगीतज्ञ तानसेन और बैजू बावरा स्वामीजी की संगीत कला से गुर सीखते थे। ऐसा कहा जाता है स्वामीजी की संगीत साधना के बारे में सुनकर खुद सम्राट अकबर उनके दर्शन के लिए उनकी निधिवन राज स्थित कुटिया तक पहुंचा था। -1864 में मंदिर में स्थापित हुए भगवान बांके बिहारी

विक्रम संवत 1562 को शुक्ल पक्ष की पंचमी के दिन बांकेबिहारी लाल निधिवन राज की लता पताकाओं के बीच प्रकट हुए थे। 1864 में नव मंदिर का निर्माण करवा कर प्रतिमा को स्थापित किया गया। वर्तमान में स्वामीजी की वंश परंपरा के गोस्वामी परिवारों द्वारा मंदिर में ठाकुर जी की रोज सेवा की जा रही है।

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