माता-पिता को खो चुके चार बच्चों के रिश्तेदार बने सहारा

जिले में मुख्यमंत्री बाल सेवा योजना के तहत अब तक करीब 70 आवेदन विभाग में आए थे। इसमें 31 का सत्यापन पूरा होने के बाद लाभांवित किया गया। इसके अलावा 16 बच्चे और पात्र पाए गए हैं शेष आवेदन पत्रों का सत्यापन प्रक्रिया है।

JagranSat, 24 Jul 2021 01:29 AM (IST)
माता-पिता को खो चुके चार बच्चों के रिश्तेदार बने सहारा

महराजगंज: कोरोना ने लोगों को काफी जख्म दिया है। जिले में चार बच्चे ऐसे हैं, जिन्होंने अपने माता-पिता दोनों को खो दिया है। फरेंदा निवासी नाबालिग बेटियां अपने माता-पिता को लगातार ढूंढ रही है। एक साल पहले इनकी माता की मृत्यु हो गई थी लेकिन कोरोना काल में 21 अप्रैल को पिता की भी मौत हो गई। इन दोनों बेटियों का लालन पालन उसकी दादी कर रहीं। उन्होंने बताया कि मुख्यमंत्री बाल योजना के तहत बच्चे के भविष्य को लेकर उम्मीद जगी है। सिसवा की बालिका के माता-पिता के न रहने से अब इसके ऊपर तीन छोटे भाइयों की जिम्मेदारी आ गई है। इन्हें माता-पिता की याद सता रही है। जबकि 27 बच्चे के एकल अभिभावक है। मतलब किसी के पिता हैं, तो किसी की माता।

जिले में मुख्यमंत्री बाल सेवा योजना के तहत अब तक करीब 70 आवेदन विभाग में आए थे। इसमें 31 का सत्यापन पूरा होने के बाद लाभांवित किया गया। इसके अलावा 16 बच्चे और पात्र पाए गए हैं, शेष आवेदन पत्रों का सत्यापन प्रक्रिया है। जिला प्रोबेशन अधिकारी डीसी त्रिपाठी ने बताया कि 31 बच्चों के अभिभावकों को स्वीकृति पत्र दिया जा चुका है। अन्य की प्रक्रिया चल रही है। जिले में नहीं है बाल व किशोर गृह

महराजगंज: अपने माता-पिता को खो चुके बच्चों को बाल गृह व किशोर गृह में सहारा दिया जाता है। ताकि उनका भरण-पोषण और देख-रेख हो सके। लेकिन जनपद में इसकी कोई व्यवस्था नहीं है। ऐसे में इन बच्चों को दूसरे जनपद में शरण लेना पड़ता है।

दो अक्टूबर 1989 को महराजगंज को जिला बनने के बाद भी यहां बाल व किशोर गृह निर्माण की मंजूरी नहीं मिल सकी है। इस कारण अनाथ बच्चों देवरिया व गोरखपुर बाल गृह भेजे जाते हैं। बाल संरक्षण अधिकारी जकी अहमद ने बताया कि महराजगंज के दो बच्चे बालगृह देवरिया तथा दो बच्चे शिशु एशियन सहयोग संस्था गोरखपुर में है। उन्होंने बताया कि जनपद में बाल गृह व किशोर गृह के लिए प्रशासन द्वारा शासन को प्रस्ताव भेजा गया है। लेकिन अभी इसकी स्वीकृति नहीं मिल सकी है। जनपद में इसकी व्यवस्था होने से विभागीय कार्य में थोड़ी सहूलियत होती।

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