Yogesh Praveen Birth Anniversary: लखनऊवासियों ने कहा-अब वो आंखें नहीं, जिनमें मिलता था हर गली का पता

लखनऊ को इतिहासकार योगेश प्रवीन ने जैसे देखा और शब्दों में उकेरा वैसा किसी ने नहीं किया। सिर्फ इतिहास नहीं साहित्य की लगभग हर विधा को डा योगेश प्रवीन की लेखनी ने लालित्य से सजाया। लोग उन्हें प्यार और सम्मान से दाऊ कहते।

Rafiya NazThu, 28 Oct 2021 08:33 AM (IST)
डा योगेश प्रवीन (28 अक्टूबर 1938-12 अप्रैल 2021) की जयंती पर लखनऊवासियों ने उन्‍हें याद किया।

लखनऊ, [दुर्गा शर्मा]। लखनऊ को योगेश प्रवीन ने जैसे देखा और शब्दों में उकेरा, वैसा किसी ने नहीं किया। सिर्फ इतिहास नहीं, साहित्य की लगभग हर विधा को डा योगेश प्रवीन की लेखनी ने लालित्य से सजाया। लोग उन्हें प्यार और सम्मान से दाऊ कहते। यह उनके व्यक्तित्व का बड़प्पन ही था कि वह सबके दाऊ यानी बड़ा भाई बन गए। वह हमारे बीच नहीं, पर उनकी किताबें वह जरिया हैं, जिससे आने वाली पीढ़ियां लखनऊ और अवध के इतिहास को जान सकेंगी। कोरोना ने हमसे योगेश प्रवीन के रूप में शहर का ज्ञानकोश छीन लिया।

उनके जैसा ज्ञाता अब कहां मिलेगा: वरिष्ठ नृत्यांगना कुमकुम धर ने कहा कि जब से मैंने नृत्य भी करना शुरू नहीं किया था और अन्य विधाओं पर काम कर रही थी, तब से योगेश भाई से जुड़ी थी। उन्होंने मेरे लिए गंगा अवतरण और नारायणी नमो नम: समेत कई नृत्य नाटिकाएं भी लिखीं। चाहे गजल हो, नज्म हो या सारांश, उन्होंने मेरे लिए सब कुछ लिखा। वह जो लिखते थे, उसमें उनका अनुभव और अध्ययन साफ नजर आता। उनके उत्कृष्ट लेखन के पीछे उनका शास्त्रों, इतिहास और भाषा का ज्ञान था। मैंने लखनऊ महोत्सव में एक बार कथक की पूरी कथा प्रस्तुत की थी, उसका सारांश योगेश भाई ने बनाकर दिया था। जब भी मैं उनसे कुछ लिखने के लिए आग्रह करती, वह बड़े भाई जैसे स्नेह के साथ कहते- तुम चिंता न करो, मैं लिखकर भिजवा दूंगा। उनके जाने के बाद कई सारे अवसर आए जब मुझे उनकी बहुत जरूरत महसूस हुई, उन्हें दिल से याद किया। इतनी सारी विधाओं का ज्ञाता अब कहां मिलेगा।

उनके काम को संरक्षित किया जाए: शायर मनीष शुक्ल ने बताया कि दाऊ के लेख अखबारों में पढ़ता था, तब से उनका मुरीद था। साहित्यिक रुचि के कारण उनसे प्रगाढ़ता बढ़ती गई। दाऊ के इल्म से हम सब परिचित थे। उनके व्यक्तित्व में मातृत्व और पितृत्व दोनों का भाव रहता। उनको उप्र प्रशासन एवं प्रबंधन अकादमी में उत्तर प्रदेश की संस्कृति और साहित्य के परिचय पर व्याख्यान देने के लिए निरंतर बुलाया जाता रहता था। दाऊ आइएएस-पीसीएस के बैच को उत्तर प्रदेश की संस्कृति, साहित्य और कला पर व्याख्यान देते। उनके व्याख्यान के लिए हमेशा मांग रहती। प्रशासनिक अकादमी में पोस्टिंग के दौरान दाऊ के लेक्चर के बाद का दृश्य मुझे हमेशा याद आता है। वह भीड़ के बीच घिरे रहते और उनसे बात करना तक मुश्किल होता। मैं उनसे हमेशा कहता था कि ज्ञान की इस अविरल धारा को कलमबद्ध कीजिए, पर यह काम भी अधूरा रह गया। हमने ज्ञान का प्रकाश स्तंभ खो दिया और दु:ख यह कि हम उन्हें अंतिम विदाई भी ठीक से नहीं दे पाए। अपेक्षा यही है कि उनकी स्मृतियां विस्मृत न हों, उनके काम को संरक्षित किया जाए।

उनकी विद्वता और सादगी याद आती है: दूरदर्शन के कार्यक्रम प्रमुख आत्म प्रकाश मिश्र ने बताया कि आकाशवाणी और दूरदर्शन उन्हें प्रिय थे। इसके पीछे वह यह कारण भी बताते थे कि उनका और आकाशवाणी लखनऊ का जन्म वर्ष एक था। वह मुझसे कहते थे कि अगर मैं लखनऊ की कलम हूं तो तुम लखनऊ की आवाज हो। 2017 में मैंने दूरदर्शन के लिए ट्रैवल शो यूपी दर्शन बनाया। हमारे निवेदन पर दाऊ ने छह कड़ियों में उसका आलेख लिखा। उनकी विद्वता, सरलता, सादगी और वाकपटुता हमेशा याद आती है। सर्वसुलभ रहने वाले दाऊ आज हमारे बीच नहीं हैं, पर उनके लेखन ने आज भी उन्हें जीवंत रखा है। उनके लेखन कार्य काे सहेजना ही उनके लिए सबसे बड़ी श्रद्धांजलि होगी।

इंसाइक्लोपीडिया बनना आसान नहीं: उप्र संगीत नाटक अकादमी के सचिव तरुण राज ने बताया कि अवध की तहजीब और परंपराओं का चलता-फिरता इंसाइक्लोपीडिया बनना आसान नहीं। इसके पीछे उनका अध्ययन तो था ही, साथ ही वह अथाह प्रेम भी था जो वह लखनऊ और लखनऊवालों से करते थे। सरल, सौम्य और विनम्र व्यक्तित्व, अवध के इतिहास, रंगमंच और साहित्य का अद्वितीय चितेरा और इन सबसे ऊपर एक अद्भुत इंसान...। उनका सानिध्य किसी को भी लखनऊ से प्रेम करने को मजबूर कर दे। मैंने उन्हें विभिन्न विधाओं के लेखक के साथ ही एक उम्दा उद्घोषक के रूप में भी देखा। उनकी यह विविधता और बुद्धिमत्ता हमेशा याद आती है।

अवध को अपनी मां की तरह देखते: इतिहासविद् रवि भट्ट ने बताया कि वह कहीं नहीं गए, अवध की सामाजिक सोच में उनकी उपस्थिति हमें बराबर अनुभव होती है। इतिहासकार बहुत सारे हुए हैं, आगे भी होंगे, पर उनकी विशिष्टता यह रही है कि वह अवध की लोक संस्कृति के प्रतीक होते थे। वह अवध को, यहां की संस्कृति और इतिहास को अपनी मां की तरह देखते थे। वह अवध के बारे में ऐसे बोलते थे, जैसे एक बेटा अपनी मां के लिए बोल रहा, इसलिए भी उनके लेखन में कहीं नकारात्मकता नहीं दिखती। उन्होंने हिंदी वालों को उर्दू से और उर्दू वालों को हिंदी से जोड़ने का काम किया। वह अवध के अतीत की वैभवशाली संस्कृति के एंबेस्डर थे।

उनका हर अंदाज याद आता है: एसपी-विजिलेंस अरविंद चतुर्वेदी ने बताया कि उनकी खनकती आवाज, बेमिसाल अंदाज, बेपनाह लखनवी मोहब्बत का जज्बा, लखनऊ के जर्रे-जर्रे की खुसूसी जानकारी देने का माद्दा बहुत याद आता है। उनको अवधी लोक-गीत से बेहद लगाव था। जब वो देखो भाभी कौन खड़ा दरवज्जे मारे सीटियां... गाते थे तो मध्यम वर्गीय परिवार का चित्र उभर जाता था। वहीं दूसरी ओर लखनऊ की संस्कृति पर गंभीर चिंतन उनके लेखों में मिलता है। आज जब कभी लखनऊ को किसी नए नजरिए से देखने की जरूरत पड़ती है तो उनकी बेहद कमी खलती है। वे लखनऊ की सांस्कृतिक विरासत के चलते फिरते इनसाइक्लोपीडिया थे।

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