यहां हल्दी और मट्ठा मिलकर तैयार की जाती है अखाड़े की मिट्टी

लखनऊ, मोहम्मद हैदर। संसाधनों के अभाव के बावजूद आज भी शहर में दंगल की पुरानी परंपरा कायम है। यहां के अखाड़ों में आज भी गद्दे की बजाय मिट्टी में ही कुश्ती लड़ी जाती है। हालांकि, बदलते समय के साथ शहर के अखाड़े अपना मूल स्वरूप खोते जा रहे हैं। वर्ष 1980 के बाद मिट्टी की जगह गद्दे पर कुश्ती होने से शहर के अधिकांश अखाड़े बंद हो चुके हैं या बंदी की कगार पर पहुंच चुके हैं, लेकिन इसके बावजूद चौक का गोमती अखाड़ा, गणोशगंज अखाड़ा व सदर में गुरुजी के अखाड़े के पहलवान अब भी कुश्ती की परंपरा को आगे बढ़ रहे हैं। यह अखाड़े न केवल अपनी वर्षो पुरानी परंपरा को बरकरार रखे हुए हैं, बल्कि नए-नए पहलवान भी तैयार कर रहे हैं। चौक का गोमती अखाड़े में अली और बजरंगबली दोनों का नाम लेकर धर्म व जाति से ऊपर उठकर पहलवान गंगा-जमुनी तहजीब को आगे बढ़ाकर अनोखी मिसाल पेश कर रहे हैं। हंिदूू-मुस्लिम दोनों ही समुदाय के पहलवान मिलकर अखाड़े में एक साथ दांव-पेच आजमाते हैं। नाग पंचमी और रक्षा बंधन में इन अखाड़ों में बुजुर्ग उस्तादों से लेकर छोटे-छोटे बच्चे अपना दमखम दिखाते हैं। खास बात यह है कि किसी जमाने में पहलवानी करने वाले लोग वर्षो बीत जाने के बाद भी अखाड़ों से जुड़े हैं और अपनी पुरानी परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का काम कर रहे हैं।

फिल्मों में बढ़ी लोकप्रियता

कुश्ती को लेकर कई बॉलीवुड फिल्में बन चुकी हैं। इससे कुश्ती की लोकप्रियता बढ़ी। सुल्तान में पहलवान बने अभिनेता सलमान खान ने अपना दमखम दिखाया तो वहीं अभिनेता आमिर खान की दंगल का भी क्रेज दर्शकों के सिर चढ़कर बोला था। दर्शकों ने दोनों ही फिल्मों को खूब पसंद किया था।

सरसों के तेल संग मिट्टी में मिलाते हैं हल्दी व मट्ठा

अखाड़ों की मिट्टी का ठंडा होना बेहद जरूरी है। इसके लिए हर चार महीने में एक बार मिट्टी में 50 लीटर सरसों का तेल, दस किलो हल्दी और 30 लीटर मट्ठा मिलाया जाता है। इससे कुश्ती लड़ते समय पहलवान को पसीना आने के बाद भी फिसलन नहीं होती। साथ ही हल्दी से शरीर में चोट का असर कम होता है।

कुश्ती का इतिहास

कुश्ती का इतिहास बहुत पुराने है। रामायण और महाभारत में भी कुश्ती का उल्लेख मिलता है। रामायण में जहां बाली-सुग्रीव के बीच मल्ल युद्ध यानी कुश्ती हुई थी, तो वहीं महाभारत में भी भीम-दुयरेधन में हुआ युद्ध इसका उदाहरण है। इस युद्ध में एक नैतिक भावना रहती थी। पुराने समय में जब इंसान ने अस्त्र-शस्त्र चलाने का हुनर नहीं सीखा था, तो उनके बीच मल्ल युद्ध होता है। कुश्ती को मल्लयुद्ध इसलिए कहा जाता है कि दोनों पहलवान युद्ध करने से पहले बाजुओं पर मिट्टी रगड़ते हैं।

जूडो में काम आए कुश्ती के दांव

शहर के पहलवान धर्मेद्र जैन वर्ष 1995 में जूडो फेडरेशन ऑफ इंडिया की ओर से दिल्ली में आयोजित मुकाबले में उपविजेता रहे थे। धर्मेद्र ने फाइनल में पंजाब के पहलवान को हराकर सिल्वर पदक हासिल किया था। दो वर्ष बाद उनको कुशल खिलाड़ी में चुना गया और वह उप्र पुलिस में सब इंस्पेक्टर बने। वह बताते हैं कि कई साल कुश्ती लड़ने के बाद उन्होंने वर्ष 1993 में जूडो की ट्रेनिंग शुरू की थी। जूडो और कुश्ती में बहुत कुछ सामान्य है। जब जूडो में ट्रेनिंग शुरू की तो कुश्ती में जो कुछ सीखा था वह बहुत काम आया और उसी का नतीजा था कि उन्हें कुशल खिलाड़ी में चुना गया।

एकता के प्रतीक

एडवोकेट पंडित कमल शंकर अवस्थी बताते हैं कि नवाबों के समय में गंगा-जमुनी तहजीब को बढ़ाने के लिए अखाड़े खोले गए थे। यह अखाड़े किसी एक धर्म-जाति के नहीं होते थे। यही वजह थी कि शहर में सादिक पहलवान, अकरम पहलवान, मोहित पांडेय, महावीर पहलवान व शंकर सिंह सहित कई बेहतरीन पहलवान हुए।प्रबंधक गोमती अखाड़ा चौक अनुराग मिश्र ‘अन्नू’ के मुताबिक, सरकार की अनदेखी से अखाड़े समय के साथ बेहतर होने की जगह पिछड़ते चले गए। मिट्टी से गद्दों में कुश्ती होने से अखाड़े में कुश्ती सीख रहे पहलवानों को आगे के अवसर कम मिल रहे हैं। शहर में कुश्ती की पुरानी परंपरा को बरकरार रखने के लिए सरकार को इन अखाड़ों के उत्थान के लिए पहल करनी होगी।

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