World Refugee Day: लखनऊ में रहते हैं पाकिस्तान से आए 2.80 लाख शरणार्थी, इनके दिल में बसता है भारत

1947 से लेकर 1950 तक देश में पाकिस्तान से प्रताड़ित होकर सिंधी पंजाबी और सिख समाज के लोग लखनऊ आए तो उनको बसाने का प्रयास किया गया। चारबाग के गुरुनानक मार्केट जो पहले रिफ्यूजी बाजार के नाम से जानी जाती थी बसाई गई थी।

Mahendra PandeySun, 20 Jun 2021 06:06 AM (IST)
लखनऊ में रहते हैं सिंधी, पंजाबी और सिख समाज के शरणार्थी।

लखनऊ [ जितेंद्र उपाध्‍याय ]। शहर-ए-लखनऊ का हर रंग हर किसी को अपने रंग में रंग लेता है। शहर ने भारत-पाकिस्तान बंटवारे के बीच लखनऊ आए सिंधी, पंजाबी और सिख समुदाय को न केवल पनाह दी, बल्कि उन्हें अपना बनाकर अपनी संस्‍कृति में शामिल कर लिया। 20 जून को विश्व शरणार्थी दिवस है। इस अवसर पर शहर के विकास और समृद्धि में शरणार्थियों ने अपनी भूमिका की चर्चा की तो कुछ दर्द भी बयां किए।

1947 से लेकर 1950 तक देश में पाकिस्तान से प्रताड़ित होकर सिंधी, पंजाबी और सिख समाज के लोग आए तो उनको बसाने का प्रयास किया गया। चारबाग के गुरुनानक मार्केट जो पहले रिफ्यूजी बाजार के नाम से जानी जाती थी बसाई गई थी। अमीनाबाद का गड़बड़ झाला, मोहन मार्केट, रिवर बैंक कॉलाेनी, भोपाल हाउस, न्यू तुलसी दास मार्ग, वालाकदर रोड, चंदरनगर व कृष्णानगर के सिंधु नगर के साथ ही समर विहार सहित कई हिस्सों में उन्हें जगह देकर समाज में याेगदान कर रोजी रोटी की शुरुआत करने के लिए कहा गया। अपना सबकुछ छोड़कर यहां आए शरणार्थियों ने समाज को समृद्ध बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी हर समाज के शरणार्थियों ने अपने-अपने तरीके से राजधानी को समृद्ध करने का प्रयास किया।

होटल से लेकर कपड़े की दुकान तक

शरणार्थियों ने होटल से लेकर किराना, कपड़े की दुकान, फैक्ट्री, रेस्टोरेंट, शॉपिंग मॉल बनाकर जहां अपने साथ हर धर्म, जाति के लोगों को रोजगार से जोड़ा तो न्यू लखनऊ के बसाने में अपनी भूमिका भी निभाई। राजधानी में एक लाख सिंधी, एक लाख सिख और करीब 80 हजार पंजाबी समुदाय के शरणार्थी अपने पूर्वजों के दर्द को भूलकर शहर में अपनी संख्या से दूने अन्य समाज के लोगोें को रोजगार दे रहे हैं।

सिंधी काउंसिल ऑफ इंडिया के महासचिव मुरलीधर आहूजा ने बताया कि सिंधी होने से पहले मैं राजधानी का एक नागरिक हूं। शरणार्थी की मोहर भले ही लगी है, लेकिन दिल से हिंदुस्तानी हूं। हमारा छोटा सा योगदान यदि देश की समृद्धि और शहर को आगे ले जाने का काम करता है तो मैं अपने आपको भाग्यशाली समझता हूं। लखनऊ गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के अध्यक्ष राजेंद्र सिंह बग्गा ने बताया कि समाजिक समरसता के साथ समृद्धि का पाठ मेरे पिता ने पढ़ाया था। शरणार्थी के रूप में मैं यहां आया, लेकिन शहर ने अपना बना लिया। हमारे सिख भाइयों ने भी बिजनेस से जुड़कर हर धर्म समुदाय को किसी के आगे भीख न मांगने का संदेश दिया। नौकरी के बजाय बिजनेस को तरजीह देकर कई परिवार को रोजी राेटी देने का काम कर रहे हैं। उप्र सिंधी अकादमी के उपाध्यक्ष नानक चंद लखमानी ने बताया कि राजनीतिक भागीदारी की बात हो या फिर बिजनेस की बात हो। शरणार्थियों को सरकार की ओर से हर समय मदद की गई है। हमारे समाज के एक लाख लाेगों में 98 फीसद बिजनेस करके समाज काे सशक्त बना रहे हैं।

इनका दर्द भी कुछ कम नहीं

सात दशक से अधिक समय होने के बावजूद भारतीय होने का प्रमाण पत्र सिंधी समाज के कई लोगों को नहीं मिला है। समाज के दर्शन सिंह ने बताया कि सरकार की मंशा के सापेक्ष अधिकारियों का प्रयास जारी है। अपर जिलाधकारी आरपी सिंह की ओर से सार्थक प्रयास किया जा रहा है। कृष्णानगर की संगीता को नागरिकता का इंतजार है तो कानपुर रोड के भजन लाल भी अभी पत्नी और भाई के भारतीय होने का इंतजार कर रहे हैं। ऐेसे 380 लोगों में 2018 से अब तक करीब 120 लोगों को नागरिकता का प्रमाण पत्र मिला, अभी कई लोगों के कागजात पूरे नहीं हो सके हैं। वहीं सिख समाज रिफ्यूजी मार्केट के मालिकाना हक का इंतजार कर रहा है। करीब 600 से अधिक सिख समाज के लोग सरकार की ओर टकटकी लगाए बैठे हैं।

शरणार्थी दिवस

वर्ष 2000 में संयुक्त राष्ट्र ने अफ्रीका शरणार्थी दिवस पर हर साल 20 जून को विश्व शरणार्थी दिवस मनाने का निर्णय लिया था। वर्ष 2001 से प्रति वर्ष संयुक्त राष्ट्र के द्वारा 20 जून को पूरे विश्व में शरणार्थी दिवस मनाया जाता है। इस दिन को मनाने का मुख्य कारण लोगों में जागरूकता फैलानी है कि कोई भी इंसान अमान्य नहीं होता फिर चाहे वह किसी भी देश का हो। एकता और समन्‍वय की भावना रखते हुए हमें सभी को मान्यता देनी चाहिए।

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