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शंखध्वनि निकालने से मनुष्य की प्राणवायु होती है शुद्ध, सांसों का प्रवाह भी बना रहता है निरंतर

शंखनाद कर कोरोना वायरस को हराने वाले प्रयागराज निवासी राघवेंद्र मिश्र और उनका परिवार। फोटो साभार : स्वय

प्रयागराज में मलाकराज निवासी राघवेंद्र प्रसाद मिश्र की तबीयत 11 अप्रैल को बिगड़ने लगी थी। संयुक्त परिवार होने के कारण सबकी जांच कराई गई और 26 लोग कोरोना पाजिटिव पाए गए। लेकिन आत्मविश्वासी परिवार विचलित नहीं हुआ। पूरे परिवार ने इस आपदा से लड़ने का फैसला किया।

Sanjay PokhriyalMon, 17 May 2021 11:46 AM (IST)

लखनऊ, राजू मिश्र। ऐसे मित्र या परिचित आपके इर्द-गिर्द भी होंगे जो अक्सर खुद से होड़ लेती जिंदगी में सुस्ताने के उपक्रम में यह कहते होंगे, ‘भई, रिटायरमेंट के बाद तो गांव में सुकून की जिंदगी जिएंगे।’ उत्तर प्रदेश में कोविड की दूसरी लहर के तांडव के बाद यह इच्छा रखने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है। लेकिन, सच्ची बात यह है कि न शहर में जी लगता है और न गांव अब गांव जैसे बचे हैं। यह एक करवट बदलती सोच का नमूना है, जो विकास की अनियोजित, अनियमित, अनियंत्रित और अंधी दौड़ में अचानक ठिठक जाने से पुख्ता आधार लेती नजर आ रही है।

उत्तर प्रदेश की धरती स्वयं में सनातन संस्कृति समेटे हुए है। इस संस्कृति की विशिष्टता यह है कि इसमें जिस तरह की जीवन शैली की कल्पना या उपदेश किया गया है, वह कोरोना काल में लोगों को पुरानी स्मृतियां उभरने जैसी प्रतीत हो रही हैं। रोजमर्रा के रहन-सहन से लेकर, पेड़-पौधों या पर्यावरण से संबंध के साथ हमारी पूजा और आराधना पद्धतियों में जो कर्मकांडी तत्व माने जाते रहे हैं, अब उनके पीछे की सोच भी प्रकट हो रही। प्रयागराज में एक संयुक्त परिवार के अधिकतर सदस्यों के कोरोना संक्रमित होने और होम आइसोलेशन में चिकित्सा के दौरान परिवार को जो अनुभूतियां हुईं, वह उदाहरण मात्र है। 32 कमरों के मकान में रहने वाले इस परिवार के 26 सदस्य संक्रमित हुए थे। परिवार का दावा है कि उसने रोजाना शंखध्वनि बजाई और फेफड़ों को मजबूती दी। पूरा परिवार स्वस्थ है। उन्होंने उपचार भी लिया, लेकिन अस्पताल जाने की नौबत किसी की नहीं आई।

शंखध्वनि निकालने से मनुष्य की प्राणवायु शुद्ध होती है। सांस का प्रवाह भी निरंतर बना रहता है। हमारी पूजा पद्धति में शंखध्वनि अभिन्न हिस्सा रही है। इससे वातावरण में ऊर्जा का संचार होता है। फेफड़ों की कसरत होती है। अब तो वास्तुशास्त्री भी मानने लगे हैं कि शंखध्वनि प्रकट करने से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। पर्याप्त विज्ञान शोध के अभाव में कुछ लोग इसे पोंगापंथी भी करार देंगे, लेकिन आपदकाल में प्रत्यक्ष को प्रमाण नहीं पर विश्वास रखने वाले इस प्रयोग को अपना रहे हैं।

दरअसल, प्रयागराज में मलाकराज निवासी राघवेंद्र प्रसाद मिश्र की तबीयत 11 अप्रैल को बिगड़ने लगी थी। संयुक्त परिवार होने के कारण सबकी जांच कराई गई और 26 लोग कोरोना पाजिटिव पाए गए। लेकिन, आत्मविश्वासी परिवार विचलित नहीं हुआ। पूरे परिवार ने इस आपदा से लड़ने का फैसला किया। सभी अलग-अलग कमरों में आइसोलेट रहे। डाक्टरों के परामर्श पर दवाएं तो लीं ही लेकिन सबसे ज्यादा दिनचर्या पर फोकस किया। कोरोना काल में लोग योग, अनुलोम, विलोम, भ्रामरी का इस्तेमाल तो कर ही रहे हैं। कई कोविड अस्पताल भी इन्हें अपने ट्रीटमेंट का हिस्सा बना चुके हैं। जो सबसे अलग काम किया इस परिवार ने, वह था शंखध्वनि को कोरोना से जूझने का हथियार बनाना। यह प्रयास रंग लाया और जल्दी स्वस्थ होने का कारण बना। घर में अब भी लोगों ने शंख बजाना व योग के अभ्यास जारी रखे हैं। शंख और शंखध्वनि की महिमा शोध में तो नहीं, लेकिन शास्त्रों में खूब बखानी गई है। लेकिन, यह कोरोना काल में अमोघ अस्त्र का काम करेगा, इसे इस परिवार ने साबित किया है। काश कि हमने अपनी आराधना पद्धतियों की कीमत समझी होती, उसमें निहित संदेशों को समझा होता तो इम्युनिटी का संकट ही न खड़ा होता।

खुल रहीं विपदा की परतें : उत्तर प्रदेश के अस्पतालों में अब पहले जैसे हालात नहीं हैं। संक्रमित मरीजों की संख्या घट रही है और ठीक होने वाले मरीजों की संख्या बढ़ रही है। ऐसे में स्वत: बेड की किल्लत भी खत्म हो गई है। आक्सीजन की आपूर्ति का काम पटरी पर आ चुका है, लेकिन पिछले दिनों जो स्थितियां बनीं और जनता को भारी विपत्ति का सामना करना पड़ा, अब उनके कारण तलाशे जा रहे हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ स्वयं प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में जाकर स्थिति का जायजा ले रहे हैं। उनके फ्रंटफुट पर आने से शासन-प्रशासन भी सक्रिय हुआ है। कालाबाजारियों को खोजकर उनके खिलाफ मुकदमा लिखा जा रहा है। अधिक फीस वसूली करने वाले अस्पतालों पर नकेल कसते हुए उन्हें उपचार के शुल्क निर्धारित कर अस्पतालों के बाहर लिखवाया जा रहा है। नियमों की अवहेलना करने वाले अस्पतालों के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है।

[वरिष्ठ समाचार संपादक, उत्तर प्रदेश]

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