सावन में बरसती हर बूंद के साथ सज रही प्रकृति का सिंगार देख मन बरबस ही गा उठता है

लोक ने सावन के हर क्षण के आनंद को गीतों में पिरोकर प्रेम और आनंद के इस भाव को स्थायी बना दिया है। मायके जाने की बाट जोहती विवाहिता बेटी से लेकर प्यार मनुहार और सौभाग्य के गीत तथा कजरी इसी माह में गूंजते हैं...

Sanjay PokhriyalMon, 02 Aug 2021 01:45 PM (IST)
वर्षा ऋतु को गीतों की ऋतु कहा जाता है।

मालिनी अवस्थी। यह सावन का महीना है। सावन शब्द सुनते ही मन में एक अलबेली उमंग का भाव जग जाता है, उत्सवधर्मिता जाग उठती है। सावन प्रकृति का श्रंगार है, प्रेम का भाव है, तीज-त्योहार का चाव है। सावन में लालित्य है, हरीतिमा का निखार और प्रेम का विस्तार है। सावन आते ही हम सबके भीतर उमंग, उत्साह, उल्लास और संगीत मुखर हो जाता है। चहुंओर हरियाली, बागों में पड़े झूले, आकाश पर छाए काले-काले मेघ और लहलहाते धान के खेत ऐसे लगते हैं मानो धरती ने धानी चुनरिया ओढ़ ली हो। रिमझिम बारिश में मिट्टी की सोंधी खुशबू में लिपटी गीली हवा में पपीहा की टेर, झींगुर की आवाज और गिरती बूंदें वातावरण में एक अलग ध्वनि और ब्रह्मनाद उत्पन्न करती हैं।

प्रकृति के आंगन का यह मनभावन दृश्य देख मन बरबस ही मधुर गान गा उठता है। इसीलिए वर्षा ऋतु गीतों की ऋतु कही जाती है। यूं तो पावस के गीत चार महीने तक गाए जाते हैं किंतु इनमें सावन का महीना विशेष है। क्योंकि सावन प्रेम का मनभावन महीना है और गीत-संगीत प्रेम की सबसे सशक्त अभिव्यक्ति है। इनमें भी लोकगीत हमारी आत्मा के स्वर हैं, जो हर श्रोता के मन को रस से सराबोर कर देते हैं। इसीलिए लोक ने सावन के हर क्षण के आनंद को गीतों में पिरोकर प्रेम और आनंद के इस भाव को स्थायी बना दिया है।

नहीं छूटता वह लगाव: सालभर बेटियां सावन की प्रतीक्षा करती हैं। मायके जाने की राह देखती हैं। सावन में भाई को राखी बांधने का चाव रखती हैं, मायके में कुछ दिन अम्मा की गोद में बिताने की साध रखती हैं। मैं कितनी ही सहेलियों को जानती हूं जो सालभर सावन आने की प्रतीक्षा करती हैं, मायके से बुलावे की बाट जोहती हैं। आप कहेंगे कि आज के समय में यह बातें कौन मानता है। यह भी कह सकते हैं कि अब कहां ब्याही बेटियां सावन में मायके से आमंत्रण का इंतजार करती हैं, लेकिन ऐसा नही है। भारत के गांवों में आकर देखिए, जिन्होंने अभी भी बेटियों के लिए सावन बचाकर रखा है। यह सच है कि वक्त बदला है, और अब पहले की तरह संबंधों की औपचारिक गांठे ढीली हुई हैं। बेटियां कभी भी आ-जा सकती हैं, तो फिर क्या कारण है कि सावन के इस गीत को सुन आंखों के कोर से आंसू बह निकलते हैं-

‘अम्मा मेरे बाबा को भेजो री,

कि सावन आया।

बेटी तेरा बाबा तो बूढ़ा री,

कि सावन आया।

अम्मा मेरे भइया को भेजो री,

कि सावन आया।

बेटी तेरा भइया तो बाला री,

कि सावन आया।’

समय कितना भी बदल जाए, देश-काल-परिस्थिति कुछ भी हो, बेटी का मायके के प्रति लगाव कभी नहीं बदलता।

खिल उठता सौभाग्य का रंग

मायके का अपनापन, स्वतंत्रता, माता-पिता, भाई-बहन, सहेलियों का सान्निध्य प्रति वर्ष सावन में अपनी बेटियों को सींचता रहता है। ...और जिस प्रकार धरती इसी महीने जल संचय कर वर्षभर की तरलता प्राप्त करती है, उसी प्रकार बेटियां साल भर की संघर्षपूर्ण दिनचर्या से जूझने के लिए प्रेम और शक्ति की खुराक लेने सावन में मायके आती हैं। तृप्ति का यही ईंधन उन्हेंं अगले बरस तक ऊर्जावान रखता है। अवध में गाया जाने वाला यह सावन गीत आज भी जैसे मायके में झूला झुला जाता है-

‘नन्ही नन्ही बुंदिया रे सावन का मेरा झूलना,

एक झूला डाला मैंने अम्मा जी के बाग में अरे बाबा जी के राज में,

हरी हरी मेंहदी रे सावन का मेरा झूलना!’

सावन प्रेमियों का प्रिय महीना है। स्त्रियों का सारा श्रंगार-सौभाग्य-मनुहार अपने प्रिय के लिए इसी माह में निखरता है। हरा रंग सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। पुरखिनें आज भी घर की बहू-बेटियों को हरी-भरी होने का आशीर्वाद देती हैं। इसमें सावन का चिर सौभाग्य भी शामिल होता है।

कहावतों में इशारे नियमों के

वर्षा की बूंदों की निरंतरता के प्रतिवर्ष इंतजार का नाम सावन है। हमारे पूर्वजों ने वर्षा की निरंतरता पर शोध किया, ज्ञानवर्धक कहावतें व नीतियां रचीं। जैसे-

‘करिया बादर जीउ डरवावै।

भूरा बादर नाचत मयूर पानी लावै।।’

अर्थात आसमान में यदि घनघोर काले बादल छाए हैं तो तेज वर्षा का भय होगा, लेकिन पानी बरसने के आसार नहीं होंगे। यदि बादल भूरे हैं व मोर थिरक उठे तो समझो पानी निश्चित रूप से बरसेगा। इन कहावतों को देख अपने पूर्वजों की सटीक अवलोकन क्षमता पर ताज्जुब होता है। इसी तरह बरसात में मनुष्य का खान-पान भी अलग हो जाता है। रिमझिम सावन में चाय भी अलग स्वाद देती है। इस मौसम में अरबी के चिकने पत्तों से पात्रा या पतौड़े, दूधिया भुट्टे, बरसाती अमरूद, जामुन सब दिव्य आनंद देते हैं, लेकिन सावन के महीने में ऋषि-मुनियों ने खान-पान में बहुत से संयम बरतने की नसीहत भी दी है। घाघ भड्डरी की भी खान-पान संबंधी कई कहावतें मिलती हैं। एक उदाहरण देखिए-

‘सावन प्यालू जब तक कीजै,

भादो में फिर नाम न लीजै।’

यानी कि सावन में दिन में एक बार भोजन करना चाहिए और भादप्रद में शाम को कभी भोजन नहीं करना चाहिए। घर के बड़े-बुजुर्ग भी सावन में दूध और साग के सेवन के लिए मना करते हैं। बरसात में विषैले कीड़ों के कारण संभवत: हरी शाक-सब्जियों के सेवन से परहेज करने का कहा जाता है।

कजरी और आल्हा का दंगल

सालभर में यह एक महीना किसानों के लिए आनंद विश्राम और उत्सव का महीना है। इस समय खेतों में धान लग चुका होता है और किसान अपेक्षाकृत फुरसत में होते हैं। सावन की अमराई में टपकती बूंदों में भीगते हुए, ओसारे में बैठे किसान बंधुओं में इन दिनों कजरी आल्हा सुनने की रीति रही है। यही वजह है कि कई क्षेत्रों में सावनपर्यंत कजरी और आल्हा का दंगल होता है। कजरी ने अवध, भोजपुर और बुंदेलखंड को सर्वाधिक समृद्ध किया है। बनारस, मिर्जापुर, चंदौली, राबट्र्सगंज में कजरी के कई अखाड़े और सिद्ध गायक हैं। इनमें जहांगीर का अखाड़ा, बेचन का अखाड़ा, दरगाही परंपरा, संत कल्लू शाह का अखाड़ा, बफ्फत अखाड़ा, अहरौरा अखाड़ा और बैरागी अखाड़ा प्रमुख हैं। यहां प्रेम, श्रंगार, दर्शन, विचार, निर्गुण, राम, कृष्ण, महाभारत, भर्तृहरि चरित्र, राष्ट्रीय ऐतिहासिक कथाएं और आशिकाना कजरी गाने की परंपरा है। यहां बाकायदा कजरी गाने, रचने, कंठस्थ करने और त्वरित जवाब देने की शिक्षा भी दी जाती है। एक समय था, जब रतजगा के समय होने वाले कजरी के दंगलों को देखने दूर-दूर से हजारों लोग आते थे। इनमें सवाल -जवाब होते थे। एक गौनिहारिन ने सवाल किया-

‘बहे पुरवइया सावनवा का लहरा

मोरे बारे बालमवा।’

तो मशहूर कजरी गायक श्यामलाल ने तुरंत उत्तर दिया-

‘तोहरे दुवरिया मैं कैसे आऊं,

सिपहिया का पहरा रे बालमवा।’

ऐसी कई रोचक कजरियां और उनसे जुड़े किस्से-कहानियां हैं। एक और उदाहरण देखें-

‘कइसे खेलन जइबू सावन मा कजरिया बदरिया घेरि आई ननदी,

हम ता खेलैं जइबे सावन मा कजरिया बदरिया चाहे बरसे भउजी।’

यह प्रसिद्ध कजरी भी सवाल-जवाब की दंगली कजरी है। बहुत बदलावों के बावजूद अखाड़े आज भी सक्रिय हैं और कजरी गायकों को तैयार कर रहे हैं। शब्द चित्रण की दृष्टि से कजरी गीतों में वर्षा का जैसा सजीव वर्णन मिलता है, वैसा वर्णन श्रेष्ठ काव्य में भी मिलना कठिन है। कजरी का साहित्यिक पक्ष अत्यंत समृद्ध है। भारतेंदु, प्रेमधन, अंबिकादत्त व्यास की कजरी अत्यंत सुंदर हैं। सावन में कजरी, झूला, हिंडोला, सावनी, चौमासा-बारहमासा गाने की भी परंपरा है। एक उदाहरण देखिए-

‘करू कौन जतन अरी ए री सखी

मोरे नैनों से बरसे बदरिया।

उठी काली घटा बादल गरजे

चली ठंडी पवन मोरा जिया लरजे।

सब सखियां हिंडोलवा झूल रहीं

खड़ी भीजू पिया तोरे अंगनवा।

अरे रामा उठी घटा घनघोर

बदरिया कारी रे हरी।

कौन दिशा से घन घहराने कहां बरस गए मेह

अगम दिसा से घन घहराने पच्छिम बरस गए मेह।

मोरी धानी चुनरिया इतर गमके,

सोने की थरिया मा ज्योना परोसा,

जेवन वाला बिदेस तरसे,

मोरी धानी चुनरिया इतर गमके।’

ऐसा ही है मनभावन सावन और ऐसे होते हैं उसके पावस गीत और कजरी। इनको जो जिए केवल वही इनका आनंद जाने। बरखा रानी जब झूम के बरस रही हों और कहीं कोई कजरी गाता हो तो सुनने वाला आगे बढ़ ही नहीं सकता!

(लेखिका प्रख्यात लोकगायिका हैं)

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