पद्मश्री शरीफ चचा की राह पर रामनगरी के रितेश, अयोध्‍या में कर रहे लावारिस शवों का अंत‍िम संस्‍कार

शरीफ चचा के नाम से अयोध्यावासियों में ख्यात मु. शरीफ की तरहरितेश दास भी रामनगरी के ऐसे रत्न हैं जिन पर अयोध्यावासियों को गर्व है। संवेदनाओं से भरे रितेशदास भी पद्मश्री शरीफ चचा की राह पर चल रहे हैं।

Anurag GuptaTue, 30 Nov 2021 07:12 PM (IST)
कोरोना काल में 216 लोगों का किया अंतिम संस्कार, पिंडदान व तेरहवीं संस्कार भी किया।

अयोध्‍या, [नवनीत श्रीवास्तव]। लावारिस शवों का सम्मानजनक ढंग से अंतिम संस्कार करने की मुहिम चला रहे पद्मश्री मुहम्मद शरीफ की विरासत को संभालने के लिए रामनगरी अयोध्या का ही एक युवक आगे आया है। शरीफ चचा के नाम से अयोध्यावासियों में ख्यात मु. शरीफ की तरहरितेश दास भी रामनगरी के ऐसे रत्न हैं, जिन पर अयोध्यावासियों को गर्व है। संवेदनाओं से भरे रितेशदास भी पद्मश्री शरीफ चचा की राह पर चल रहे हैं। कोरोना की दूसरी लहर में जब अपने भी साथ छोड़ रहे थे, तो रितेश दास सामने आए, जिन्होंने न सिर्फ कोरोना का शिकार हुए लोगों का अंतिम संस्कार किया, बल्कि दो माह श्मशान घाट पर ही बिताए और घर भी नहीं गए।

सभी मृतकों का नाम, पता भी सुरक्षित : इस साल फरवरी से जून माह तक उन्होंने 216 लोगों का अंतिम संस्कार किया और सभी का नाम, पता भी उन्होंने सुरक्षित रखा है। खास बात यह है कि गत 18 जून को नागेश्वरनाथ पर उन्होंने सांसद लल्लू सिंह के सहयोग से इन सभी कोरोना मृतकों का तेरहवीं संस्कार किया और रामकी पैड़ी पर पिंडदान भी।

मां से मिली सेवा की सीख : रितेश को निस्वार्थ सेवा की सीख मां मंजू देवी से मिली। पिता राजेश मिश्र का निधन रितेश के बचपन में ही हो गया था। ऐसे में मां मंजू देवी ने रितेश को सेवा-सत्कार का संस्कार दिया। इसी की देन है कि रितेश न सिर्फ मनुष्य बल्कि, पशुओं की सेवा में भी लीन हैं। करीब डेढ़ साल पूर्व उन्होंने लावारिस शवों का अंतिम संस्कार करने का संकल्प लिया। यह संकल्प कोरोना काल में और मजबूत होकर सामने आया। कोरोना की दूसरी लहर में कुछ शव ऐसे भी होते थे, जिनके साथ संक्रमण के भय से नाम मात्र के स्वजन ही होते थे और कुछ लावारिस की तरह अंतिम संस्कार के लिए श्मशानघाट पर पहुंचा दिए जाते थे। रितेश ने ऐसे शवों का नि:संकोच अंतिम संस्कार किया। उन्होंने करीब दो सौ लावारिस शवों का भी अंतिम संस्कार किया है।

लकड़ी बैंक की स्थापना : कोरोना की दूसरी लहर में शवों के बढ़ते दबाव के बीच चिता के लिए लकड़ी का संकट भी शुरू हुआ था। ऐसे में रितेशदास ने रामवल्लभाकुंज के अधिकारी राजकुमार दास व महापौर रिषिकेश उपाध्याय के सहयोग से लकड़ी बैंक की स्थापना कराई। महापौर ने लकड़ी बैंक का प्रभारी भी रितेश दास को ही बना दिया। इस बैंक से लावारिस व आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों को निश्शुल्क लकड़ी उपलब्ध कराई गई। यह लकड़ी बैंक आज भी श्मशान घाट पर संचालित है।

पशुओं की करते हैं चिंता : रितेश सिर्फ मनुष्य ही नहीं, बल्कि पशु-पक्षियों के प्रति भी संवेदनाओं से भरे हैं। अब तक उन्होंने हजारों गायों व अन्य पशुओं को श्मशान घाट में दफनाया है। गोसेवा के साथ ही वह बंदरों की भी सेवा-सहायता करते हैं। घायल गायों व बंदरों को इलाज मुहैया कराते हैं।

सरयू की स्वच्छता के प्रति समर्पित : रितेश दास सरयू मां की स्वच्छता के प्रति भी समर्पित रहते हैं। बचपन से ही सुबह के समय सरयू में स्नान करते हैं। बचपन में वह सरयू स्नान से पूर्व घाट पर घूम कर कूड़ा एकत्र करते थे और एक स्थान पर रख देते थे, जिससे पालिका कर्मियों को कूड़ा एकत्र करते में आसानी हो। वह सरयू से पशुओं के शवों को भी बाहर निकाल कर उन्हें श्मशान घाट पर दफनाते हैं।

शरीफ चचा को इसी माह मिला है पद्मश्री : लावारिस शवों का अंतिम संस्कार करने के लिए प्रसिद्ध मु. शरीफ को बीती आठ नवंबर को दिल्ली में पद्मश्री से सम्मानित किया गया। सुलतानपुर जिले में जवान बेटे की मौत और फिर उसके शव का लावारिस की तरह अंतिम संस्कार होना शरीफ चचा की संवेदनाओं को अंदर तक झकझोर गया। अपने इस दुख के साथ वह मानवता की सेवा के पथ पर चल पड़े। करीब 27 वर्ष से शरीफ चचा संकल्प के पथ पर चल रहे हैं। हालांकि, अब वह कृशकाय हो चुके हैं। शरीफ चचा के संकल्प को रितेश आदर्श मानते हैं।

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