UP Cabinet Decision: छंटनीशुदा श्रमिकों के कौशल विकास को बनेगी निधि, श्रम न्यायालयों की व्यवस्था होगी खत्म

नियमावली में छंटनीशुदा कर्मचारियों के लिए उप्र कर्मकार पुनर्कौशल निधि के गठन का प्रविधान है। नियोक्ता को छंटनी किये गए कामगार की 15 दिन की मजदूरी इस निधि में देनी होगी। निधि के लिए राज्य व केंद्र सरकारें भी धनराशि देंगी।

Anurag GuptaThu, 16 Sep 2021 07:03 AM (IST)
कारखाना स्तर पर ही निपटाये जा सकेंगे औद्योगिक विवाद। सदस्यों के बीच बंटेगी ट्रेड यूनियन निधि।

लखनऊ, राज्य ब्यूरो। प्रदेश की औद्योगिक इकाइयों में श्रमिकों और नियोक्ता के बीच होने वाले विवाद अब बातचीत और समन्वय के जरिये अब यथासंभव कारखाना स्तर पर ही निपटाए जा सकेंगे। वहीं, छंटनीशुदा कामगारों के कौशल विकास के लिए प्रदेश में पहली बार निधि गठित करने की व्यवस्था की गई है। इसे उप्र कर्मकार पुनर्कौशल निधि कहा जाएगा। केंद्र सरकार की ओर से गजट में प्रकाशित की गई औद्योगिक संबंध संहिता 2020 के क्रम में राज्य सरकार ने उप्र औद्योगिक संबंध नियमावली, 2021 तैयार की है जिस पर बुधवार को कैबिनेट ने मुहर लगाई।

उप्र कर्मकार पुनर्कौशल निधि बनेगी : नियमावली में छंटनीशुदा कर्मचारियों के लिए उप्र कर्मकार पुनर्कौशल निधि के गठन का प्रविधान है। नियोक्ता को छंटनी किये गए कामगार की 15 दिन की मजदूरी इस निधि में देनी होगी। निधि के लिए राज्य व केंद्र सरकारें भी धनराशि देंगी। इस निधि की धनराशि का उपयोग छंटनी किए गए कामगारों के कौशल विकास के लिए किया जाएगा। यदि इकाई को एक साल के अंदर फिर से कामगारों की जरूरत पड़ी तो उन्हें छंटनी किए गए श्रमिकों को भर्ती में प्राथमिकता देनी होगी।

समन्वय से निपटेंगे विवाद : यदि किसी इकाई में 100 या इससे ज्यादा श्रमिक हैं तो वहां 20 सदस्यों की एक वक्र्स कमेटी बनायी जाएगी, जिसमें कामगार और प्रबंधन, दोनों पक्षों के लोग होंगे। कमेटी का अध्यक्ष प्रबंधन और उपाध्यक्ष मजदूर पक्ष का होगा। यह कमेटी समय-समय पर बैठकें कर विवादों का निपटारा करेगी। जिन इकाइयों में 20 या इससे ज्यादा श्रमिक हों, उनमें शिकायत निवारण समिति गठित की जाएगी जिसमें मजदूर और प्रबंधन दोनों पक्षों के प्रतिनिधि होंगे। मजदूर समिति के समक्ष शिकायत रखेंगे। यदि समिति ने शिकायत का निवारण 30 दिन में नहीं किया तो श्रमिक उसे श्रम विभाग में दर्ज कराने के लिए स्वतंत्र होगा।

ट्रेड यूनियन से ऐसे होगी वार्ता : ऐसी इकाइयां जहां सिर्फ एक पंजीकृत ट्रेड यूनियन है और उसके कुल कर्मचारियों में से न्यूनतम 30 फीसद इस यूनियन के सदस्य हों तो ऐसी यूनियन को एकमात्र वार्ताकारी संघ के रूप में मान्यता दी जाएगी। यदि किसी इकाई में एक से ज्यादा ट्रेड यूनियन हैं तो जिस यूनियन के पास 50 फीसद से ज्यादा कामगारों की सदस्यता होगी, उसे यह मान्यता दी जाएगी। यदि किसी इकाई में जहां एक से ज्यादा ट्रेड यूनियन हों और इनमें से किसी के पास 50 फीसद सदस्यता नहीं है तो ऐसी स्थिति में कामगारों के बीच गुप्त मतदान के जरिये एक वार्ताकारी परिषद बनायी जाएगी जो प्रबंधन से बातचीत करेगी। किसी पंजीकृत ट्रेड यूनियन का विघटन होने पर उसके सदस्यों के बीच यूनियन के निधि के बंटवारे की प्रक्रिया भी तय की गई है।

श्रम न्यायालयों की व्यवस्था खत्म : नियमावली में औद्योगिक विवादों के निपटारे के लिए श्रम न्यायालयों की बजाय अब सिर्फ औद्योगिक न्यायाधिकरण होंगे, जिनमें डबल बेंच होगी। बेंच का एक सदस्य रिटायर्ड/ सेवारत जज होगा और दूसरा भारतीय प्रशासनिक सेवा का रिटायर्ड/सेवारत अफसर होगा या फिर सहायक श्रमायुक्त/उप श्रमायुक्त होगा जो तीन साल इस पद पर रहा हो।

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