भरपूर बिजली चाहिये तो मथुरा और सैफई में जाकर रहिये, बाकी तो श्रीकांत भरोसे....

लखनऊ (जेएनएन)। उत्तर प्रदेश में विद्युत वितरण व्यवस्था का हाल-बेहाल है। यह स्थिति तब है जब राज्य में जरूरत से कहीं ज्यादा बिजली उपलब्ध है लेकिन, उसे उपभोक्ताओं तक पहुंचाने में सिस्टम नाकाम है। ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा का जिला होने के नाते मथुरा में बिजली की गंगा बह रही है। पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के गांव सैफई को अबाध आपूर्ति देने में भाजपा सरकार भी कृपालु है। यह तब है जब विधानसभा तक में भाजपा नेता अनेक बार कह चुके हैं कि उनके लिए पूरा प्रदेश एक समान है। उधर बिजली के जर्जर तार, ओवरलोडेड ट्रांसफार्मर हर जिले की बीमारी हैैं। लोकल फॉल्ट की असल वजह भी यही है। विभागीय मिलीभगत से चोरी और लाइन हानि पर अंकुश न हो पाना कोढ़ में खाज है। सरकार का रटारटाया दावा है कि नगरों को 24 घंटे बिजली दी जा रही है। क्या वास्तव में ऐसा है? इस सवाल का जवाब तलाशने केलिए प्रदेश में बिजली की आपूर्ति का हाल-अहवाल-

विरोधाभास की एक बानगी

गाजियाबाद को 1300 मेगावाट बिजली की जरूरत है। इतनी आपूर्ति इस महानगर को लगातार दी भी जा रही है फिर भी कई क्षेत्रों में बिजली कटौती होती है। कारण है वितरण की समस्या। तार जर्जर हैैं और ट्रांसफार्मर ओवरलोडेड। इससे आये दिन लोकल फॉल्ट से जूझना पड़ता है। फिर भी गाजियाबाद को नो ट्रिपिंग जोन बनाने की कसरत चल रही है। मुख्य अभियंता आर के राणा स्वीकारते हैैं कि लोकल फॉल्ट से कुछ क्षेत्रों में समस्या है। यह स्थिति अकेले गाजियाबाद की ही नहीं है। नोएडा और ग्रेटर नोएडा की भी यही स्थिति है। ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण के तय क्षेत्र में आपूर्ति कर रही नोएडा पावर कंपनी गांवों को बिजली कटौती से मुक्त करने में पूरी तरह विफल है। सेक्टरों की अपेक्षा गांवों में बड़े पैमाने पर कटौती हो रही है। यहां बिजली की मांग इस साल अधिकतम 370 मेगावॉट के स्तर को छू चुकी है।

बिजली की उपलब्धता औसतन साढ़े तीन सौ मेगावॉट के आस-पास रहती है। मांग व आपूर्ति में कई बार अंतर बढ़ते ही गांवों में बिजली गुल हो जाती है। एनपीसीएल के पास बिजली उत्पादन की कोई व्यवस्था नहीं है। बिजली ट्रेडिंग कंपनियों व राज्यों के जरिये ग्रेटर नोएडा की मांग को पूरा किया जा रहा है। नोएडा के गांवों व सेक्टरों में आधे घंटे से दो घंटे तक कटौती आये दिन हो रही है। औद्योगिक समेत आवासीय सेक्टरों में ट्रिपिंग व लो वोल्टेज की समस्या से लोगों को राहत नहीं मिल पा रही है। हापुड़ में किसी गांव में फाल्ट हो जाए तो उसे दुरुस्त करने में कम से कम चौबीस घंटे विभाग लगा देता है। जिला मुख्यालय को 24 घंटे आदेश के बाद भी 20 से 21 घंटे ही बिजली मिल रही है। हैंडलूूम नगरी पिलखुवा को भी 20 के बजाए मात्र 17 से 18 घंटे आपूर्ति है।

इन्फ्रास्ट्रक्चर जस का तस

बिजली की उपलब्धता तो बढ़ी है लेकिन, सालों पुराना इन्फ्रास्ट्रक्चर दगा दे रहा हैै। जो सुधार किए भी गए तो वे पूरी तरह नहीं हो सके। कानपुर में दो सालों में जर्जर इन्फ्रास्ट्रक्चर सुधारने को आइपीडीएस योजना के तहत 250 करोड़ रुपये खर्च किए गए लेकिन, धरातल पर कोई असर नहीं दिखता। रोजाना 10 से 15 सब स्टेशनों में ब्रेकडाउन होता है। इन्हीं वजहों से औरैया, इटावा और फर्रुखाबाद में शट डाउन लेने व ट्रिपिंग की नौबत आती है। इटावा में अखिलेश यादव का गांव सैफई अब भी अपवाद है जहां 24 घंटे आपूर्ति की जा रही है।

मगर पूर्वांचल उपेक्षित

पूर्वांचल गर्व कर सकता है कि प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री उसके अंचल से हैैं लेकिन, बिजली आपूर्ति के मामले में उसे इससे कोई लाभ मिला हो, ऐसा नजर नहीं आता। वाराणसी में भी 24 घंटे बिजली देने का वादा हवा-हवाई है। कभी बारिश तो कभी लोकल फाल्ट के नाम पर उपभोक्ताओं को सुबह-शाम कटौती झेलनी पड़ रही है।

पांडेयपुर की कुसुम श्रीवास्तव के अनुसार रोजाना कुल मिलाकर दो से तीन घंटे बिजली गुल रहती है।

लंका के रियासत अली कहते हैं कि, अभी हाल ही में शहर को नो ट्रिपिंग जोन घोषित किया गया था।

बावजूद इसके गाहे-बगाहे बिजली कटौती बदस्तूर जारी है। उधर अधिकारियों का तर्क है कि अनियोजित खोदाई के कारण शहर में कई स्थानों पर केबिल डैमेज हो रहे हैं, जिससे आपूर्ति प्रभावित हो रही है। चंदौली के ग्रामीण क्षेत्रों में 18 घंटे बिजली का रोस्टर है लेकिन 12 घंटे भी मिलना बड़ी बात है। मीरजापुर, आजमगढ़, जौनपुर, सोनभद्र, मऊ, बलिया, भदोही के शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में भी दावों के अनुरूप आपूर्ति नहीं हो रही है। गोरखपुर में भी कटौती हो रही है। देवरिया, कुशीनगर और महराजगंज को भी 24 के बजाय 20 घंटे ही बिजली मिल पा रही है।

लखनऊ में जनता दुखी

बिजली कटौती से मुक्त होने के बावजूद लखनऊ के शहरी क्षेत्र के कई डिवीजन ऐसे हैं, जहां बिजली 20 घंटे ही मिल रही है। ग्रामीण क्षेत्रों की स्थिति तो और भी ज्यादा खराब है जहां अनेक दावों के बाद भी 12 से 15 घंटे ही बिजली पहुंच रही है। सेस प्रथम से पोषित उतरटिया में दो माह से बिजली संकट है। 400 किलोवाट एम्पियर के सहारे चार हजार आबादी को बिजली दी जा रही है। ऐसे में बढ़ते लोड के कारण दो सप्ताह में तीन बार वह जल चुका है। स्थानीय निवासी दीपक कुमार कहते हैं कि अवर अभियंता से लेकर मुख्य अभियंता तक शिकायत की जा चुकी है।

इसके बाद भी अधिक क्षमता का ट्रांसफार्मर नहीं लग रहा। यही हाल न्यू डिफेन्स, निलमथा व तेलीबाग का है। चौक निवासी अनवर कहते हैं, दशकों पुरानी जर्जर लाइन के सहारे बिजली दी जा रही। ऐसे में तार, ट्रांसफार्मर, फ्यूज तो फुकेंगे ही और फिर इससे बिजली भी गुल रहेगी। सिर्फ जुलाई व अगस्त में 600 से अधिक छोटे बड़े ट्रांसफार्मर खराब हुए। छह नए विद्युत उपकेंद्रों के लिए जहां बिजली महकमें को मुफ्त में जमीन नहीं मिल पा रही हैै वहीं नई ट्रांसमिशन लाइनों का काम भी धीमा चल रहा है जिससे राजधानी को बिजली की आवाजाही से मुक्ति मिलती नहीं दिख रही है।

आगरा-मथुरा की बल्ले बल्ले

ब्रजमंडल में आगरा और मथुरा में विद्युत आपूर्ति में सुधार दर्ज हुआ है। आगरा में प्राइवेट कंपनी टोरंट पावर के हाथ कमान आने से और मथुरा ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा का जिला होने से वहां निर्बाध विद्युत आपूर्ति हो रही है। फीरोजाबाद बड़ा औद्योगिक उत्पादन क्षेत्र होने के बावजूद कटौती का शिकार है। मैनपुरी, एटा और कासगंज के शहरी और ग्रामीण इलाकों में छह से 10 घंटे तक की कटौती जारी है। अलीगढ़, हाथरस, मुरादाबाद, मेरठ, बागपत, बुलंदशहर, बिजनौर, मुजफ्फरनगर जिलों में भी बिजली की यही कहानी है। शामली और सहारनपुर में स्थिति बेहतर है। मध्यांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड में शामिल बरेली मंडल में करीब एक हजार एमवीए विद्युत आपूर्ति होती है। इसमें जुलाई में करीब तीस फीसद कम यानि करीब 770 एमवीए बिजली की अधिकतम खपत हुई थी। इस महीने खपत चालीस फीसद कम हो गई है। बावजूद इसके शहर में बिजली की निर्बाध आपूर्ति नहीं हो पा रही है।

बढ़ता लोड, फुंकते ट्रांसफारमर

यह पूरे प्रदेश की समस्या है। बिजली की उपलब्धता बढ़ी है तो ट्रांसफार्मरों पर लोड भी बढ़ा है। ट्रांसफार्मर दगने का एक बड़ा कारण यह भी है। राजधानी लखनऊ में 18500 ट्रांसफार्मर हैैं। इनमें औसतन प्रतिदिन 18 ट्रांसफार्मर फुंक जाते हैैं। सबसे अधिक 25 केवीए और फिर 63 केवीए के ट्रांसफार्मर खराब हो रहे हैं, बरसात में इनकी संख्या और भी बढ़ जा रही है। अभियंता भी मानते हैैं कि कमजोर इन्फास्ट्रक्चर व उपभोक्ताओं की संख्या का सही आकलन न होने से फीडर ट्रिप हो रहे हैं। अभियंताओं के मुताबिक अमूमन ट्रांसफार्मर की कुल क्षमता का 80 से 85 फीसद ही इस्तेमाल करना चाहिए लेकिन, उससे कहीं अधिक लोड उन पर है। इलाहाबाद में भी मांग के मुताबिक बिजली होने के बावजूद तार टूटने, फ्यूज उडऩे, ट्रांसफॉर्मर फुंकने के कारण बिजली आपूर्ति प्रभावित रहती है। 24 घंटे के बजाय ट्रांसफॉर्मर हफ्तेभर में बदल पाते हैं। बहुत तेजी दिखाई गई तो 30 से 35 घंटे लग जाते हैं। प्रतापगढ़ में बारिश से रोज पांच से दस जले ट्रांसफार्मर चिलबिला वर्कशाप में पहुंच रहे हैं। बरेली मंडल में औसतन हर रोज 50 ट्रांसफार्मर फुंक रहे हैैं जिससे कहीं न कहीं बिजली की आपूर्ति प्रभावित हो रही है।

कागजों में भरपूर बिजली

(तय शेड्यूल व औसत आपूर्ति के घंटे) ग्रामीण (18) - 18.44 घंटे तहसील स्तर (20.30) - 20.45 घंटे जनपद स्तर (24) - 23.57 घंटे मंडल स्तर (24) - 24 घंटे

बुंदेलखंड (20.30) - 20.44 घंटे

महानगर (24) - 24 घंटे

औद्योगिक (24) - 24 घंटे

(पावर कारपोरेशन के अनुसार वित्तीय वर्ष 2018-19 में अगस्त तक औसत बिजली आपूर्ति के घंटे)

हमने सुधार किया श्रीकांत शर्मा - ऊर्जा मंत्री  

पिछली सरकार के मुकाबले भाजपा सरकार में 10 फीसद विद्युत आपूर्ति बढ़ी है। हमने 47 लाख बिजली कनेक्शन बांटे हैं। बिजली चोरी पर अंकुश लगाने और पारदर्शी नीति होने से बिजली खरीद की औसत दर कम हुई है जिससे 7,433 करोड़ रुपये का अतिरिक्त राजस्व मिला। इसमें 3400 करोड़ रुपये का लाभ तो केवल लाइन लॉस कम करने से हुआ। 2020 तक बिजली कंपनियों का घाटा भी खत्म कर देंगे। व्यवस्था सुधारने के लिए मैं खुद प्रति सप्ताह बिजली आपूर्ति की समीक्षा करता हूं। बारिश में कई बार आपूर्ति रोकी जा रही है लेकिन, बरसात बाद कोई कठिनाई नहीं रहेगी। बारिश थमते ही युद्ध स्तर पर काम होगा जिससे आपूर्ति में और सुधार दिखाई देगा।

 

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