World Diabetes Day: एक तिहाई लोगों को नहीं होती डायबिटिक होने की खबर, हर तीसरे व्यक्ति को है इसका खतरा

लखनऊ [कुमार संजय]। राजधानी के हर तीसरे बुजुर्ग को डायबिटीज अपनी चपेट में ले रही है। वहीं, 20 से 70 वर्ष की कुल आबादी को मिला लें तो इस रोग से नौ प्रतिशत लोग जूझ रहे हैं। इनमें से एक तिहाई ऐसे लोग होते हैं, जिन्हें खुद पता ही नहीं होता कि वे कब डायबिटिक हो गए। मर्ज को और गंभीर बनाने का यह सबसे बड़ा और खतरनाक कारण है।

संजय गांधी पीजीआइ के इंडोक्राइनोलॉजिस्ट प्रो. सुशील गुप्ता और प्रो. सुभाष यादव ने इस मुद्दे पर तमाम शोध किए हैं। उनके नतीजे में यह तथ्य सामने आए है। प्रो. सुभाष कहते हैं कि शोध में पाया कि 16 प्रतिशत नागरिकों का शुगर लेवल उन्हें डायबिटिक बताने के लिए काफी था। 

दिल और किडनी की बीमारी का गहरा रिश्ता

संजय गांधी पीजीआइ के हृदय रोग विशेषज्ञ प्रो. सुदीप कुमार के मुताबिक, डायबटीज नियंत्रित न होने पर दिल और किडनी की बीमारी की आशंका बढ़ जाती है। देखा गया है कि डायबिटीज के साथ 10 से 12 साल जिंदगी गुजारने वाले 15 से 20 फीसद लोग अनियंत्रित शुगर के कारण दिल और किडनी की बीमारी की चपेट में आ जाते हैं।

क्या है डायबिटीज

प्रो. सुभाष यादव के मुताबिक, जो भोजन लेते हैं उसे हमारी पाचन ग्रंथियां पचा कर ऊर्जा और हमारी वृद्धि के लिए उपयोग करती हैं। इस प्रक्रिया में भोजन का अधिकतर हिस्सा टूटकर ग्लूकोज बनता है। ग्लूकोज एक किस्म की शुगर है और यह हमारे शरीर के लिए ऊर्जा का प्रमुख स्रोत है। यह ग्लूकोज हमारे रक्त में घुलकर कोशिकाओं तक पहुंचता है, जिसका उपयोग कोशिकाएं करती हैं। ग्लूकोज को कोशिकाओं में पहुंचाने के लिए इंसुलिन हार्मोन की जरूरत होती है, जो पैंक्रियाज की बीटा सेल्स पैदा करती हैं। जब भी हम कुछ खाते हैं तो पैंक्रियाज यह इंसुलिन अपने आप जरूरी मात्रा में छोड़ती है। यही इंसुलिन शुगर कंट्रोलर की भूमिका अदा करती है। इंसुलिन को लेकर आई समस्या ही डायबिटीज का कारण होती है।

डायबिटीज के प्रकार 

टाइप 1 : इसमें पैंक्रियाज इंसुलिन बनाना पूरी तरह से बंद कर देता है। करीब 10 प्रतिशत मरीजों में इस प्रकार की डायबिटीज होती है।

टाइप 2 :यहां इंसुलिन तो बनता है, लेकिन काफी कम। यह ग्लूकोज को कोशिकाओं में पहुंचाने के लिए काफी नहीं होता। 90 फीसद डायबिटीज के मामले टाइप 2 के मिल रहे हैं।

इंसुलिन को बोझ न मानें

इंसुलिन लेने को मरीज बोझ मानने लगते हैं। ऐसा करना खतरे को बढ़ाता है। इसे जीवन भर के लिए अपनाना है, इसलिए इसे गंभीरता से अपनाएं। जब शुगर का स्तर गोली से कंट्रोल नहीं होता है, तब इंसुलिन दी जाती है। देखा गया है कि तमाम लोग बाद में फिर गोली पर आ जाते है।

बच्चों में बढ़ता मोटापा बढ़ा रहा रिस्क

प्रो. सुभाष यादव कहते हैं कि बच्चों में अब तक केवल डायबिटीज टाइप 1 ही मिलता रहा है, क्योंकि इसकी प्रमुख वजह आनुवांशिक होती है। लखनऊ में हर 10 हजार बच्चों में से एक में टाइप 1 डायबिटीज पाया जा रहा है। जैसे-जैसे बच्चों के खाने-पीने की आदतों में बदलाव आते जा रहे हैं, उनमें मोटापा बढ़ रहा है। यही उन्हें डायबिटीज के रिस्क फैक्टर की ओर धकेल रहा है। 12 से 14 वर्ष की उम्र में बढऩा शुरू हुआ मोटापा 20-22 की उम्र तक डायबिटीज में बदल रहा है।

आंकड़े बता रहे भयावह हालात

50 लाख लोग हर वर्ष दुनिया भर में डायबिटीज से मर रहे हैं। 40 करोड़ लोग डायबिटीज के साथ जी रहे हैं दुनिया में, इनमें सात करोड़ भारत में, 1.10 करोड़ उप्र में और 2.70 लाख लखनऊ में रह रहे हैं। 225 खरब रुपये इसके इलाज पर दुनिया भर में लोगों को हर साल खर्च करने पड़ रहे हैं। 10 हजार में से एक बच्चा डायबिटीज टाइप 1 का पेशेंट। 12 से 14 वर्ष की उम्र में बढ़ते वजन की वजह से भी डायबिटीज टाइप 1 का रिस्क।

लक्षण

बार-बार पेशाब जाने की जरूरत महसूस होती है। अचानक वजन तेजी से घटने लगा है शरीर में एनर्जी की कमी महसूस हो रही है। प्यास और भूख बहुत लगने लगी है। नाश्ते में पौष्टिकता का रखें ध्यान पीजीआइ की पोषण विशेषज्ञ अर्चना सिन्हा और निरूपमा सिंह के मुताबिक, 70 प्रतिशत टाइप-2 डायबिटीज के रोगी इसकी चपेट में आने से बच सकते थे यदि सही खान-पान और नियमित व्यायाम की आदतें विकसित की होतीं। नाश्ते में फल, हरी सब्जियां, साबुत अनाज, मेवे, मछली, अंडे का उपयोग बढ़ाएं। साथ ही भोजन में स्वाद के बजाय पौष्टिकता को महत्व दें। क्या न खाएं  स्वादिष्ट लगने वाली पेस्ट्री, नाश्ते में परोसे जाने वाले अधिकतर सिरील्स, फ्राइड फूड, कोल्ड ड्रिंक्स, मीठा दही आदि।

 

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