नेहरू चाहते थे सिविल सर्विस का खात्मा, पटेल ने दिया था संरक्षण; जान‍िए पूर्व मुख्य सचिव की किताब की खास बातें

उप्र के पूर्व मुख्य सचिव आलोक रंजन ने अपनी नई पुस्तक मेकिंग अ डिफरेंस-द आइएएस ऐज अ करियर में यह उल्लेख किया है। उन्होंने कहा है कि यदि आइसीएस का अस्तित्व समाप्त हो जाता तो उसके उत्तराधिकारी के तौर पर भारतीय प्रशासनिक सेवा (आइएएस) का जन्म नहीं होता।

Anurag GuptaMon, 22 Nov 2021 08:00 AM (IST)
उप्र के पूर्व मुख्य सचिव आलोक रंजन ने अपनी नई पुस्तक 'मेकिंग अ डिफरेंस-द आइएएस ऐज अ करियर' ।

राज्य ब्यूरो, लखनऊ : देश की आजादी के समय इंडियन सिविल सर्विस (आइसीएस) को अपने असिस्त्व के संकट से जूझना पड़ा था। प्रचालित धारणा यह थी कि अंग्रेजों के प्रतिनिधि होने के कारण भारतीयों के प्रति आइसीएस अफसरों का रवैया उत्पीडऩात्मक और दमनकारी रहा है। लिहाजा आइसीएस को खत्म करने के लिए हो-हल्ला मचा। यहां तक कि देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू भी आइसीएस को खत्म करने के पक्षधर थे, लेकिन ब्रिटिश शासनकाल में देश का स्टील फ्रेम कही जाने वाली इस सेवा को भारत के तत्कालीन गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल के रूप में रक्षक और संरक्षक मिला। सरकार पटेल का स्पष्ट मानना था कि भारत को सिविल सर्विस की जरूरत है।

उप्र के पूर्व मुख्य सचिव आलोक रंजन ने अपनी नई पुस्तक 'मेकिंग अ डिफरेंस-द आइएएस ऐज अ करियर' में यह उल्लेख किया है। उन्होंने कहा है कि यदि आइसीएस का अस्तित्व समाप्त हो जाता तो उसके उत्तराधिकारी के तौर पर भारतीय प्रशासनिक सेवा (आइएएस) का जन्म नहीं होता। इस किताब का विमोचन रविवार को जयपुरिया इंस्टीट्यूट आफ मैनेजमेंट (जेआइएम) में पूर्व मुख्य सचिव नवीन चंद्र बाजपेयी व अतुल कुमार गुप्ता, लखनऊ विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्रो.अरविंद मोहन, क्लैट पासिबल की सह-संस्थापक व प्रबंध निदेशक सुरभि मोदी सहाय, राष्ट्रीय कौशल विकास मिशन के पूर्व प्रबंध निदेशक जयंत कृष्ण ने किया। अंग्रेजी में लिखी गई अपनी इस तीसरी किताब में रंजन ने आइएएस की अपनी 38 वर्षों की सेवा के कई प्रशासनिक अनुभवों का निचोड़ पेश करते हुए यह बताने की कोशिश की है कि तमाम गिरावटों के बावजूद असंख्य देशवासियों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने का सबसे बड़ा अवसर आइएएस का करियर मुहैया कराता है। हालांकि आइएएस में चुने जाने का ख्वाब देने वालों को उनकी नसीहत है कि यदि खुद को शासक समझ कर इस सेवा में आना चाहते हैं तो यह गलतफहमी होगी।

प्रमोटी अफसरों को ज्यादा पसंद करते हैं नेता : बकौल रंजन, सियासतदां और आइएएस अफसर एक-दूसरे के प्रति संदेह का भाव रखते हैं। उप्र में तो ज्यादातर नेता जिलाधिकारी के रूप में आइएएस अधिकारी की बजाय प्रमोटी अफसर को प्राथमिकता देते हैं और वे विभागीय अधिकारियों के साथ ज्यादा सहज महसूस करते हैं। नेताओं का मानना है कि आइएएस अफसर घमंडी, जिद्दी और काम में रोड़े अटकाने वाले होते हैं। यह तब है जब कई आइएएस अफसर मनचाही पोस्टिंग पाने के लिए नेताओं की जी-हुजूरी भी करते हैं। अपने प्रशासनिक कार्यकाल मेंं उन्होंने यह भी महसूस किया है कि सचिवालय के अधिकारी जिलों से संदर्भित किये गए मामलों में प्राय: अनावश्यक अड़ंगेबाजी करते हैं।

आइएएस में आई गिरावट, नहीं आकर्षित हो रहीं प्रतिभाएं : रंजन का यह भी मानना है कि उपयोगी सेवाएं देने के बावजूद समय के साथ भारतीय प्रशासनिक सेवा की गुणवत्ता में गिरावट आई है। ईमानदारी और निष्पक्षता के मूल्यों का ह्रïास इसकी मुख्य वजहें हैं। उनका यह भी मानना है कि आइएएस का कम वेतन भी प्रतिभाशाली युवाओं को इस सेवा से दूर कर रहा है। उन्होंने आधुनिक सिंगापुर के निर्माता और वहां के पूर्व प्रधानमंत्री ली कुआन यू का तर्क देते हुए कहा है कि आइएएस की ओर प्रतिभाओं को आकर्षित करने के लिए वेतन भी आकर्षक होना चाहिए।

जांच के डर से निर्णय लेने से बचते अधिकारी : उप्र का मुख्य सचिव रहते हुए आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे, डायल-100, लखनऊ मेट्रो रेल जैसी महत्वाकांक्षी परियोजनाओं को समयबद्ध ढंग से पूरा करने का श्रेय वह अपनी और पूरी टीम की त्वरित निर्णय लेने की क्षमता और नियमित मानिटरिेंग को देते हैं। हालांकि यह भी कहते हैं कि आजकल सीबीआइ, नियंत्रक-महालेखापरीक्षक, केंद्रीय सतर्कता आयोग और अदालतों की जांच के डर से अधिकारी किसी मसले पर निर्णय लेने की बजाय टालमटोल करते हैं।

बोर्ड साहब के दौरों पर चुटकी : किताब में अध्यक्ष राजस्व परिषद के जिलों के दौरों पर भी चुटकी ली गई है। यह कहते हुए कि ऐसे दौरों में मेजबान जिलाधिकारी की सफलता इस बात पर निर्भर करती थी कि वह 'बोर्ड साहब' को कैसे खुश रखे। उन्होंने एक जिलाधिकारी का उल्लेख किया है जिन्होंने टेनिस के शौकीन रहे राजस्व परिषद अध्यक्ष के जिले के दौरान एक बढिय़ा टेनिस खिलाड़ी का इंतजाम किया लेकिन यह भी सुनिश्चित किया कि वह मैच में उनसे हार जाए। 

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