जवाहर बाग में हर साल उभरती है एक टीस, पति के शहादत स्थल को नमन करतीं शहीद मुकुल द्विवेदी की पत्नी

शहीद मुकुल द्विवेदी की पत्नी हर बरस उस स्थान को नमन करने आती हैं जहां पति की शहादत हुई थी तो जौनपुर निवासी संतोष यादव को याद कर पूर्वी उत्तर प्रदेश में बिरहा गायन होता है। नहीं याद आता है तो इस कांड से निकला सबक।

Sanjay PokhriyalMon, 07 Jun 2021 12:17 PM (IST)
पति के शहादत स्थल को नमन करतीं शहीद मुकुल द्विवेदी की पत्नी। जागरण

लखनऊ, राजू मिश्र। ‘आज दो जून का वह काला दिवस है, जब सपा के भ्रष्ट नेताओं के जवाहर बाग की सरकारी जमीन हड़पने के लालच के कारण अपर पुलिस अधीक्षक मुकुल द्विवेदी व उप निरीक्षक संतोष यादव को मथुरा में शहीद होना पड़ा था। वर्तमान शासन में कतिपय नेताओं द्वारा सीबीआइ को पैरट बनाकर उन सपा नेताओं को बचा लेना और इन शहीदों को न्याय न दिलाना उनके परिवारों के लिए जले पर नमक छिड़कने के समान है।’

उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक महेश चंद्र द्विवेदी की पिछले दिनों फेसबुक पर की गई यह टिप्पणी खासी चर्चा में है। प्रतिक्रियाओं पर गौर करें तो प्रदेश का पुलिस महकमा इसमें अपनी टीस महसूस कर रहा। पूर्व डीजीपी की टिप्पणी जवाहर बाग कांड की बरसी पर एक जज्बाती टिप्पणी ही नहीं, उस अहम बिंदु की ओर भी ले जाती है, जहां कई सबक छिपे हैं जिन पर अमल नहीं हुआ। खास तौर पर जब किसान आंदोलन के नाम पर कुछ सिरफिरे लाल किला तक पहुंचकर तोड़फोड़ करने से भी गुरेज नहीं करते। लोकतंत्र में अलोकतांत्रिक मांगें मनवाने के लिए सड़क घेरकर बैठ जाते हैं। तब मुकुल द्विवेदी और संतोष यादव की शहादत के सबक समझना और भी जरूरी हो जाता है।

सबक समझने के लिए पहले जवाहर बाग कांड की पृष्ठभूमि में जाना होगा। एक स्वयंभू संगठन और उसके स्वयंभू मुखिया रामवृक्ष यादव के नेतृत्व में लोग मध्य प्रदेश के सागर से अपनी मांगें मनवाने के लिए दिल्ली के लिए निकलते हैं और रास्ते में मथुरा के जवाहर बाग में डेरा डाल देते हैं। यह बात वर्ष 2014 के शुरुआत की है। यहां एक बड़ा प्रदर्शन होता है। प्रशासन रामवृक्ष और उसके अनुयायियों को सिर्फ दो दिन यहां रुककर प्रदर्शन करने की अनुमति देता है, लेकिन रामवृक्ष अपने समर्थकों सहित यहां काबिज हो जाता है। धीरे-धीरे वे वहां एक आत्मनिर्भर समाज बना लेते हैं। जवाहर बाग की जमीन करीब 280 एकड़ है। यहां बस्ती बस जाती है और रामवृक्ष अपनी सशस्त्र निजी सेना तैयार कर लेता है। रामवृक्ष ने अपने संगठन का नाम स्वाधीन भारत विधिक सत्याग्रह रखा था। कई आनुषंगिक संगठन भी बना रखे थे।

इस संगठन की गतिविधियां और सोच शुरू से ही संदिग्ध रहीं और कोई भी प्रज्ञावान व्यक्ति समझ सकता था कि संगठन की प्रकट गतिविधियां और छिपा उद्देश्य अलग-अलग हैं। इस संगठन की मांगों पर गौर करें, जिनके लिए यह आंदोलन खड़ा कर रहा था। संगठन का मानना था कि राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री के पद समाप्त कर दिए जाएं। वर्तमान प्रचलित भारतीय मुद्रा के स्थान पर आजाद हिंद बैंक की मुद्रा चलाई जाए। इन मांगों के पीछे संगठन के अपने कुछ तर्क थे, जिन्हें कुतर्क की श्रेणी में ही रखा जा सकता है।

जब जवाहर बाग की सरकारी भूमि पर उन्होंने धीरे-धीरे अपनी समानांतर सत्ता स्थापित कर ली तो मामला कोर्ट पहुंचा। कई बार की फटकार के बाद दो जून, 2016 को तत्कालीन एसपी सिटी मुकुल द्विवेदी और फरह थाने के एसओ संतोष यादव स्थान खाली कराने के लिए इन्हें समझाने पहुंचे। लेकिन, इन लोगों ने सीधे फायरिंग कर एसपी सिटी और एसओ को गोली मार दी। इसके बाद हालांकि जवाबी कार्रवाई में 27 कथित सत्याग्रही भी मारे गए। लेकिन, आज तक यह स्पष्ट नहीं हो सका कि रामवृक्ष भी मारा गया या अभी जिंदा है। न स्थानीय पुलिस और न सीबीआइ जांच ही यह पता कर सकी कि रामवृक्ष का क्या हुआ। हालांकि कुछ लोग जली मिली लाशों में से एक उसकी बताकर उसे मरा हुआ भी मानते हैं, लेकिन जिस शव को रामवृक्ष का बताया गया उसका डीएनए मिलान नहीं हो पाया। जांच और कार्रवाई की शेष प्रक्रिया भी इस तरह से हुई कि कोई निष्कर्ष नहीं निकला। सीबीआइ पर पैरट वाली पूर्व डीजीपी की टिप्पणी इसी सूरते हाल पर है।

सपा नेताओं को कठघरे में खड़ा करने के पीछे भी पुख्ता आधार हैं। महज प्रदर्शन करने आए सत्याग्रही दो साल तक डटे रहे। स्थायी निर्माण व रसद जमा कर ली और स्थानीय पुलिस-प्रशासन सोता रहा। क्यों? रामवृक्ष को किसका संरक्षण प्राप्त था? उस समय सपा की सरकार थी तो वह भी कटघरे में खड़ी होती है। यह भी खूब प्रचलित हुआ कि जय गुरुदेव के निधन के बाद जमीन पर कब्जे की जंग शुरू हुई जिसमें सपा के दो नेता अलग-अलग गुटों को संरक्षण देते थे। एक नेता का संरक्षण रामवृक्ष को भी प्राप्त था। लेकिन, यह सब अभी आरोप ही हैं। इसलिए भी कि सही तरह से जांच नहीं हुई। अब तक किसी निष्कर्ष पर पहुंचा नहीं जा सका।

यूं जवाहर बाग अब 15.35 करोड़ रुपये की लागत से बना पिकनिक स्पाट है। आकर्षक प्रवेश द्वार, नक्षत्र वाटिका, नवग्रह वाटिका और पंचवटी है जिसमें कई प्रजातियों के पौधे लगे हैं। बच्चे झूला झूलते हैं। युवा जिम में सेहत बनाते हैं। सात किमी लंबे पाथवे पर लोग टहलते हैं। रंग-बिरंगे फूल महक रहे हैं, लेकिन इस महक में टीस घुली है। शहीद मुकुल द्विवेदी की पत्नी हर बरस उस स्थान को नमन करने आती हैं जहां पति की शहादत हुई थी, तो जौनपुर निवासी संतोष यादव को याद कर पूर्वी उत्तर प्रदेश में बिरहा गायन होता है। नहीं याद आता है तो इस कांड से निकला सबक।

[वरिष्ठ समाचार संपादक, उत्तर प्रदेश]

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