भातखंडे संगीत संस्थान के मेधावियों के संघर्ष से सफलता तक का सफर: कोई अपना तो कोई मां का सपना कर रहा पूरा

विश्वविद्यालय में प्रथम एमपीए (गायन) के उसमीत सिंह को राय उमानाथ बली समेत सर्वाधिक स्वर्ण पदक।

Bhatkhande Music Institute Abhimat University Convocation Ceremony भातखंडे संगीत संस्थान अभिमत विश्वविद्यालय का दसवां दीक्षा समारोह विश्वविद्यालय में प्रथम एमपीए (गायन) के उसमीत सिंह को राय उमानाथ बली समेत सर्वाधिक स्वर्ण पदक। बोले गुरुद्वारे में रागों पर आधारित कीर्तन से विशेष लगाव।

Divyansh RastogiMon, 01 Mar 2021 07:17 AM (IST)

लखनऊ [दुर्गा शर्मा]। Bhatkhande Music Institute Abhimat University Convocation Ceremony: गुरुद्वारे में शबद कीर्तन ने संगीत से सफलता का मार्ग प्रशस्त किया। बचपन में कानों में पड़ी गुरुवाणी ने ऐसे सुर घोले कि उसमीत सिंह को संगीत में ही अपना भविष्य नजर आने लगा। बचपन में ही गुरुद्वारे से संगीत की तालीम शुरू हो गई। वह कहते भी हैं, मुझे गुरुद्वारे में रागों पर आधारित कीर्तन से विशेष लगाव है। श्री गुरु ग्रंथ साहिब की संपूर्ण वाणी राग पर ही आधारित है, जिसका मैं अध्ययन कर रहा हूं। शास्त्रीय संगीत आत्मरंजन का संगीत है। आगे और तालीम लेकर सुरों की साधना करना चाहता हूं।

अयोध्या के मूल निवासी उसमीत सिंह की संगीत की शुरुआती तालीम भी वहीं हुई। उसके बाद विभिन्न प्रतियोगिताओं में बेहतर प्रदर्शन के साथ आत्मविश्वास बढ़ता गया। उप्र संगीत नाटक अकादमी की क्षेत्रीय प्रतियोगिताओं में कई वर्षों तक प्रथम स्थान प्राप्त किया।

बीकॉम की पढ़ाई दिल्ली विश्वविद्यालय से हुई। उसमीत बताते हैं, वहां शास्त्रीय संगीत की प्रतियोगिता के आधार पर दाखिला हुआ था। संगीत गायन की विभिन्न प्रतियोगिताओं में दिल्ली विश्वविद्यालय का प्रतिनिधित्व भी किया। विश्वविद्यालय की ओर से ही संगीत शिक्षा की व्यवस्था की जाती थी। आगे की शिक्षा के लिए भातखंडे संगीत संस्थान अभिमत विश्वविद्यालय में दाखिला लिया। गुरु सृष्टि माथुर एवं अन्य गुरुजन के आशीर्वाद से संगीत शिक्षा की राह आसान हुई। शास्त्रीय गायिका गान सरस्वती किशोरी आमोंनकर मेरी आदर्श हैं।

 

अचार के डिब्बे जोड़कर शुरू किया था रियाज: तालवाद्य विभाग में प्रथम रमनदीप सिंह का भी संगीत से शुरुआती जुड़ाव गुरुद्वारे से ही हुआ। वह बताते हैं, गुरुद्वारे में गूंजे शबद कीर्तन ने संगीत सीखने की ललक पैदा की। इसी ललक से नियमित तौर पर गुरुद्वारा जाना भी शुरू किया। घर पर तबला नहीं था, अचार के डिब्बे जोड़कर रियाज शुरू किया। पिता त्रिलोचन सिंह और मां अमरजीत सिंह ने मेरी रुचि को भांप लिया और हमेशा मेरी हौसलाअफजाई की। 11 साल की उम्र में गुरु अरुण भट्ट से तबले की विधिवत तालीम लेनी शुरू की। इंटर तक पढ़ाई की, फिर भातखंडे संगीत संस्थान अभिमत विश्वविद्यालय में बीपीए में प्रवेश ले लिया। 2020 में भातखंडे संगीत प्रतियोगिता में प्रथम स्थान भी हासिल किया।

 

मेरी नृत्य साधना मां के नाम: हरिद्वार के पास रायवाला गांव की मूल निवासी प्रिया सैनी तीन साल की थीं तभी से नृत्य से प्रेम हो गया। नृत्य से पहला परिचय मां ने कराया। नानी का लोक नृत्य में प्रति विशेष लगाव होने के बाद भी, वह उसे अपना नहीं सकीं। प्रिया बताती हैं, नानी ने मां और मौसी को लोक नृत्य सीखने के लिए प्रेरित किया, लेकिन वह भी अपने इस शौक को पूरा नहीं कर सकीं, पर मां ने मुझे नृत्य के लिए हमेशा प्रेरित किया। मेरी नृत्य साधना मां के नाम है। प्रिया कहती हैं, 2012 में पिता का साथ छूटने पर भी मां ने मेरे नृत्य प्रेम को खंडित नहीं होने दिया। 2014 में कथक की विधिवत शिक्षा के लिए भातखण्डे संगीत संस्थान अभिमत विश्वविद्यालय में दाखिला लिया। गुरु डा बीना सिंह के सानिध्य में मैं कथक की बारीकियों को बेहतर तरीके से समझ रही।

 

कथक के लिए प्रतापगढ़ से आईं लखनऊ: कथक की दुनिया में अपनी पहचान बनाने के लिए अनुपम सिंह ने प्रतापगढ़ से लखनऊ तक का सफर तय किया। पिछले सात वर्षों से भातखंडे में अध्ययनरत अनुपम कहती हैं, पिता जगदीश कुमार सिंह और मां आरती सिंह ने हमेशा प्रोत्साहित किया। गुरु डा बीना सिंह और डा रुचि खरे के मार्गदर्शन में बीपीए की शिक्षा हासिल की। अपनी नृत्य साधना से लखनऊ कथक घराने को समृद्ध करना चाहती हैं।

 

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