अयोध्या में सोमनाथ और अक्षरधाम से भी ज्‍यादा भव्य मंदिर की चाहत, साझा हो रही मंदिर की परिकल्पना

अयोध्या [रघुवरशरण]। रामनगरी में सबसे बड़े फैसले की खुशी भव्यतम मंदिर की साध के रूप में बयां हो रही है। नगरी के हर नुक्कड़-नाके पर बस एक ही विमर्श छिड़ा है कि रामलला का बनने वाला मंदिर भव्यतम हो। शुक्रवार सुबह के 10 बजे हैैं। रोजमर्रा के काम के लिए निकले लोगों को कार्यस्थल पर पहुंचने की जल्दी है। जल्दबाजी के बावजूद लोग तुलसी स्मारक भवन चौराहा के किनारे भव्य मंदिर की परिकल्पना साझा करने का लोभ नहीं छोड़ पाते। 

साकेत महाविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष निशेंद्र मोहन मिश्र कहते हैं, सदियों के संघर्ष के बाद मंदिर निर्माण का मौका मिला है। इससे चूकना नहीं चाहिए। ऐसा मंदिर बने जैसा दुनिया में दूसरा न हो। मंदिर की दावेदारी पर प्राय: मौन रहने वाले कांग्रेस नेता एवं संस्कृत विद्यालय के शिक्षक श्रीनिवास शास्त्री भी स्वयं को नहीं रोक पाते। कहते हैं, मौका मिला है तो रामलला के मंदिर को भव्यता देने में कोई कसर नहीं छोड़ी जानी चाहिए। बातचीत में सामाजिक कार्यकर्ता मनोज श्रीवास्तव एवं बीमा अभिकर्ता शिवनाथ तिवारी भी शामिल होते हैं। मनोज कहते हैं, रामलला का मंदिर भव्यता के पर्याय सोमनाथ एवं अक्षरधाम मंदिर से भी भव्य होना चाहिए। शिवनाथ यह आकांक्षा फलीभूत होने का विश्वास दिलाते हैं। यह बताते हुए कि मंदिर के लिए धन की कोई कमी नहीं आने पाएगी। यह मंदिर कम से कम 10 हजार करोड़ की लागत से बनना चाहिए। तुलसी स्मारक भवन चौराहा से बमुश्किल पांच सौ मीटर दूर पूरब की ओर जाने पर उस न्यास कार्यशाला से सामना होता है, जहां रामलला के मंदिर के लिए गत 30 वर्षों से शिलाएं गढ़ी जा रही हैं। यहीं मिर्जापुर के गोरख पांडेय से भेंट होती है। वे रामजन्मभूमि न्यास की ओर से प्रस्तावित मंदिर के मॉडल को पूरे गौर से निहार रहे होते हैं, तभी अगले पल उनकी तंद्रा टूटती है। कहते हैं, प्रस्तावित मंदिर का यह मानचित्र भव्य है।

हमें सवा एकड़ में नहीं, पूरे 67.77 एकड़ को केंद्र में रखकर ऐसे मंदिर का निर्माण चाहिए जो दुनिया में भव्यतम हो। मंदिर के लिए तराशी गईं शिलाओं को प्रणाम करती हुईं दिल्ली की रंजना कश्यप से भेंट होती है। उनकी भी मान्यता है कि यह शिलाएं अत्यंत पूज्यनीय हैं। हमें हर आग्रह से ऊपर उठ कर रामलला के भव्यतम मंदिर को प्राथमिकता देनी होगी। मध्याह्न सरयू के संत तुलसीदास घाट पर चहल-पहल कुछ हद तक थम चुकी है। साधु अयोध्यादास अपनी कुटी में कुछ लोगों के साथ मंदिर के विमर्श में तल्लीन हैं। कहते हैं, यदि हम दुनिया का भव्यतम मंदिर नहीं बना सके, तो रामभक्तों की आने वाली पीढ़ी हमें लांछित करेगी।

 

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