आपकी ख्वाहिश कहीं आपके जिगर टुकड़े को बीमार तो नहीं बना रही

लखनऊ, (आशीष त्रिवेदी)।  अगर आप भी अपने अधूरे सपने अपने बच्चों की आंखों से देखना चाहते हैं और उस पर रुचि के विपरीत कॅरियर बनाने का दबाव डालते हैं तो सचेत हो जाएं। आपकी ख्वाहिश कहीं आपके जिगर टुकड़े को बीमार न बना दे। आपको जानकर हैरानी होगी कि केजीएमयू में हर महीने ऐसे 300 बच्चे व किशोर इलाज करवाने पहुंच रहे हैं जो मानसिक तनाव के कारण बेहोश हो जाते हैं। मानसिक बीमारी को हिस्टीरिया कहते हैं। यह समस्या ज्यादा बढऩे पर बच्चे की आवाज जा सकती है, हिचकियांं आने लगती हैं या फिर वह किसी को पहचान नहीं पाता।

केजीएमयू के मानसिक रोग विभाग के प्रोफेसर डॉ. विवेक अग्रवाल कहते हैं कि यह स्थिति बेहद चिंताजनक है। क्योंकि इससे बच्चे व किशोर में चैलेंज लेने की क्षमता खत्म हो जाती है। वह किसी भी समस्या को देखकर घबरा कर बेहोश हो जाता है। डॉ. विवेक अग्रवाल कहते हैं कि आमतौर पर बच्चे व किशोर अपनी समस्या माता-पिता से नहीं बता पाते। अगर वह गणित में पढऩे में कमजोर है तब भी उसे जबरन वह इंजीनियर ही बनाने की तैयारी में लगे रहते हैं। बच्चा समस्या बताता है तो समय पर ट्यूशन नहीं लगाते या फिर कोई दूसरा मनपसंद विषय दिलाकर मदद नहीं करते। करियर बेहतर बनाने के जबरदस्त दबाव का नतीजा है कि मानसिक रोग विभाग की ओपीडी में दस प्रतिशत मरीज हिस्टीरिया के आ रहे हैं।

इंग्लिश न आना और बीच में पढ़ाई छूटने से बढ़ रही समस्या

डॉ. विवेक अग्रवाल कहते हैं कि ग्रामीण क्षेत्र व कस्बे से बेहोशी की शिकायत लेकर आने वाले बच्चे व किशोर बताते हैं कि उन्हें इंग्लिश अच्छी नहीं आती। यहां शहर में आने पर इंग्लिश में ज्यादा पढ़ाया जाता है। माता-पिता का दबाव रहता है कि इंजीनियर व डॉक्टर ही बनो मगर वह अच्छा ट्यूशन इसके लिए नहीं लगाते। वहीं तमाम बच्चे ऐसे भी हैं जिनके गांव में कक्षा आठ या हाईस्कूल के बाद स्कूल नहीं होता। बीच में पढ़ाई छूट जाती है फिर खेती-किसानी करते हैं। छोटे भाई-बहनों को स्कूल जाता देख तनाव में आ जाते हैं।

माता-पिता का झगड़ा व सोशल मीडिया भी बढ़ा कारण

कई घरों में पति-पत्नी में मतभेद होने के कारण झगड़े होते हैं। कई बार पिता शराब पीकर आते हैं। घर में धन की कमी भी होती है। इन सभी कारणों से बच्चा तनाव में रहता है। सोशल मीडिया भी तनाव बढ़ा रहा है।

मनोवैज्ञानिक ढंग से काउंसिलिंग कर होता है इलाज

डॉ. विवेक अग्रवाल कहते हैं कि मनोवैज्ञानिक ढंग से काउंसिलिंग कर ऐसे बच्चों का इलाज किया जाता है। उन्हें और माता-पिता को साथ बैठाकर समझाया जाता है कि एक-दूसरे की बात सुनें। इस इलाज में दवाओं का प्रयोग बहुत कम होता है।

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