वाराणसी में काशी विश्वनाथ के परिक्षेत्र में स्थित ज्ञानवापी मस्जिद में खोजे जाएंगे सर्वव्यापी के साक्ष्य

वाराणसी में काशी विश्वनाथ परिक्षेत्र स्थित ज्ञानवापी मस्जिद। जागरण

जिस प्रकार अयोध्या पर पहले हाईकोर्ट और बाद में सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में पुरातात्विक साक्ष्यों को अहम माना उससे उम्मीद जगती है कि अयोध्या के बाद अब काशी और मथुरा भी गुलामी के बंधन से मुक्त हो सकेंगे।

Sanjay PokhriyalMon, 12 Apr 2021 12:01 PM (IST)

लखनऊ, राजू मिश्र। औरंगजेब की धार्मिक असहिष्णुता और हिंदू अस्मिता के प्रतीक अयोध्या, काशी और मथुरा में इतिहास के एक नए अध्याय की पटकथा लिखना आरंभ हो चुका है। अयोध्या में भव्य राम मंदिर का मार्ग प्रशस्त होने के बाद हिंदू आस्था से जुड़े लोगों की आशा को वाराणसी से ज्ञानवापी को लेकर आए कोर्ट के आदेश ने नई ऊष्मा दे दी है। स्थानीय कोर्ट ने भगवान विश्वेश्वर के वादमित्र व अन्य की दलील पर ज्ञानवापी परिसर के पुरातात्विक सर्वेक्षण के लिए आदेश दिया है। इस सर्वेक्षण के आधार पर यह पता लगाया जाना है कि जहां ज्ञानवापी मस्जिद खड़ी है, क्या उसके नीचे किसी मंदिर के अवशेष मौजूद हैं। कोर्ट के आदेश के अनुसार पुरातात्विक सर्वेक्षण के लिए पांच विख्यात पुराविदों को शामिल कर एक कमेटी बनाई जाए। इसमें दो सदस्य अल्पसंख्यक समुदाय से हों। कमेटी सर्वे स्थल की विस्तृत रिपोर्ट तैयार करेगी। इसका सारा खर्च राज्य सरकार वहन करेगी।

यह आदेश उस वाद के क्रम में है, जिसमें प्राचीन मूर्ति स्वयंभू ज्योतिर्लिंग भगवान विश्वेश्वरनाथ की ओर से वादमित्र विजय शंकर रस्तोगी ने 10 दिसंबर 2019 को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग से ज्ञानवापी परिसर का पुरातात्विक सर्वेक्षण कराने का प्रार्थना पत्र कोर्ट में दिया था। इसमें विभाग से रडार तकनीक से सर्वेक्षण कराने की मांग की गई थी। कोर्ट ने आदेश में सर्वे का मुख्य उद्देश्य स्पष्ट किया है। कमेटी यह पता लगाएगी कि उक्त स्थल पर मौजूद धार्मिक ढांचा किसी अन्य धार्मिक ढांचे पर अवलंबित तो नहीं है। पुरावशेषों में क्या परिवर्तन या संवर्धन किया गया? ऐसा है तो उसकी निश्चित अवधि, आकार, वास्तु और बनावट विवादित स्थल पर वर्तमान में किस रूप में है? कमेटी रिपोर्ट में बताएगी कि विवादित स्थल पर क्या कभी हिंदू समुदाय का कोई मंदिर रहा, जिस पर मस्जिद बनाई या अध्यारोपित की गई। यदि ऐसा है तो उसकी निश्चित अवधि, आकार, वास्तु किस हिंदू देवता अथवा देवतागण को समíपत था।

पुरातात्विक सर्वेक्षण का यह आदेश इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है कि यदि सर्वे में साक्ष्य मिले तो अयोध्या की तर्ज पर काशी में भी विदेशी मुगल आक्रांताओं के समय लगे दाग धोए जा सकेंगे। अयोध्या मसले पर आए कोर्ट के फैसले में पुरातात्विक साक्ष्यों को अहम कड़ी माना गया था। यही अंत में मंदिर के पक्ष में फैसले का आधार बना। हालांकि ज्ञानवापी के सर्वेक्षण को लेकर सुन्नी वक्फ बोर्ड कोर्ट के इस फैसले से सहमत नहीं है और वह हाईकोर्ट जाने की बात कर रहा है। यह उसका अधिकार अवश्य है, लेकिन विज्ञान संबंधी साक्ष्यों से धुंधलका हटता है तो इसमें किसी को क्या परहेज हो सकता है। यह एक अच्छा मौका है, जब बिना कोई खटास लाए अतीत की त्रुटियों को सुधारा जा सकता है।

हिंदू आस्था को किसी प्रमाण की जरूरत नहीं है। प्रमाणित धर्मग्रंथों और श्रुतियों में कभी संशय रहा ही नहीं कि जिस मस्जिद को ज्ञानवापी कहकर पुकारा जाता है, वह ज्ञानवापी शब्द ही भगवान शिव का दिया है। कोर्ट में इस बात के विस्तृत संदर्भ दिए गए हैं। पौराणिक साक्ष्य बताते हैं कि काशी विश्वनाथ मंदिर के उत्तर तरफ ज्ञानवापी कूप स्थित है और विश्वनाथ मंदिर ज्ञानकूप के दक्षिण तरफ स्थित है। यह पूरा क्षेत्र प्राचीन मंदिर का हो सकता है। इस मंदिर को सन 1194 से 1669 के बीच कई बार तोड़ा गया।

ज्ञानवापी का जिक्र स्कंद पुराण के काशी खंड में भी आता है। कोर्ट में इस ग्रंथ के 16 पेज बतौर साक्ष्य दिए गए थे। काशी खंड में एक कथा है। आनंद कानन में विचरण करते माता पार्वती की नजर महालिंग पर गई। उत्सुकता जताने पर सर्वव्यापी शिव ने इसे स्वयं की ही महिमा से प्रस्फुटित बताया। माता ने जब अभिषेक की इच्छा जताई तो जल प्रबंध की दृष्टि से भगवान शिव ने अपना त्रिशूल फेंका और जलधार फूट पड़ी। एक परम प्रचंड कुंड तैयार हो गया। अपने भाष्य में बाबा ने कहा कि इस दिव्य क्षेत्र में जो कुआं है, उसके जल में मैं सदैव ज्ञान रूप में वास करूंगा। इसे ही ज्ञानकूप और परिसर को ज्ञानवापी कहा गया। इसी प्रकार के अनेक साक्ष्य पुस्तकों, यात्र विवरणों और शास्त्रों में मौजूद हैं। दुर्भाग्य से इन्हें विज्ञान सम्मत या ऐतिहासिक नहीं माना जाता रहा। किंतु जिस प्रकार अयोध्या पर पहले हाईकोर्ट और बाद में सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में पुरातात्विक साक्ष्यों को अहम माना, उससे उम्मीद जगती है कि अयोध्या के बाद अब काशी और मथुरा भी गुलामी के बंधन से मुक्त हो सकेंगे।

[वरिष्ठ समाचार संपादक, उत्तर प्रदेश]

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