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भूमि पूजन से सौहार्द्र का ‘इकबाल’ भी होगा बुलंद, इनकी दोस्ती की आज भी दी जाती है दाद

भूमि पूजन से सौहार्द्र का ‘इकबाल’ भी होगा बुलंद, इनकी दोस्ती की आज भी दी जाती है दाद
Publish Date:Wed, 05 Aug 2020 11:24 AM (IST) Author: Anurag Gupta

अयोध्या, (रघुवरशरण)। हम इश्क के बंदे हैं मजहब से नहीं वाकिफ/ गर काबा हुआ तो क्या बुतखाना हुआ तो क्या...नवाब आसिफुद्दौला ने इन लाइनों में जिस सौहार्द्र को गढ़ा था, उसका इकबाल आज भी बुलंद है। जो लोग रामजन्मभूमि पर मंदिर निर्माण के अभियान को सांप्रदायिकता के चश्मे से देखते हैं, उन्हेंं इस अभियान की विरासत को देखना चाहिए। यह विरासत बुधवार को भी रोशन होगी, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राम मंदिर की आधारशिला रख रहे होंगे। इस मौके पर वे मो.इकबाल मौजूद होंगे, जो पीढ़ियों से मस्जिद की पैरोकारी करते रहे। इकबाल के पिता हाशिम अंसारी रहे हों, या वे खुद। बाप-बेटे ने कभी रामलला के प्रति ऐसी कोई टिप्पणी नहीं की जो रामभक्तों को चुभने वाली हो।

2010 में हाईकोर्ट का निर्णय आने के पूर्व मंदिर-मस्जिद की रार चरम पर थी, तब भी हाशिम ने खुलकर कहा कि वे कोर्ट का हर निर्णय मानेंगे। इसके बाद जब मामला सुप्रीमकोर्ट पहुंचा, तो हाशिम विवाद से ऊबने लगे। उन्हेंं लगा कि रामलला से जुड़ी भक्तों की भावना का आदर किया जाना चाहिए और यह मसला आपसी सहमति से हल किया जाना चाहिए। इस दिशा में हनुमानगढ़ी से जुड़े शीर्ष महंत ज्ञानदास के साथ उन्होंने गंभीर प्रयास भी किया और कहा कि जहां रामलला विराजमान हैं, वहां रामलला की गरिमा के हिसाब से मंदिर बनना चाहिए। 20 जुलाई 2016 को उनका निधन हुआ, तो इसके बाद मो.इकबाल ने वालिद की परंपरा पूरी तत्परता से आगे बढ़ाई और आपसी सहमति के पर्याय की पहचान बनाई। गत वर्ष रामलला के हक में आए फैसले का स्वागत करते हुए इकबाल ने कहा, विवाद भूलकर अब 130 करोड़ भारतीयों को संवाद-सृजन में लगना चाहिए। मंदिर निर्माण शुरू होने के अवसर का भी वे स्वागत कर रहे हैं और भूमि पूजन समारोह का आमंत्रण पाकर उत्साहित हैं। बिना भेदभाव के लावारिस शवों का अंतिम संस्कार करने वाले मो.शरीफ भी समारोह की शोभा बढ़ायेंगे। मो.शरीफ इसी वर्ष पद्मश्री सम्मान से भी नवाजे जा चुके हैं।

नया नहीं सौहार्द्र का रंग

राम मंदिर निर्माण के अभियान में सौहार्द्र का रंग कोई नया नहीं है। इसकी शुरुआत 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की समय हुई, जब हिंदू-मुस्लिम एकता सुनिश्चित करने के लिए मुस्लिमों ने रामजन्मभूमि पर से बाबरी मस्जिद का दावा छोड़ने की तैयारी की थी। यह पहल तत्कालीन ब्रिटिश हुक्मरानों को बहुत अखरी। उन्होंने इस मुहिम की अगुआई कर रहे अमीर अली और रामशरणदास को विवादित स्थल के कुछ ही फासले पर स्थित इमली के पेड़ से लटका दिया। करीब सवा सौ वर्ष बाद यदि राममंदिर का आग्रह जनांदोलन की शक्ल में पेश हुआ, तो सुलह-समझौते के प्रयास भी नए सिरे से परवान चढ़े। कांची के तत्कालीन शंकराचार्य स्वामी जयेंद्र सरस्वती करीब दो दशक पूर्व निर्णायक किरदार के तौर पर सामने आए। उन्होंने हिंदुओं और मुस्लिमों को देश की दो आंखें बताकर सुखद माहौल बनाया। इसके बाद अयोध्या जामा मस्जिद ट्रस्ट के अध्यक्ष सैय्यद असगर अब्बास रिजवी ने सुलह की मुहिम को आगे बढ़ाया और यह स्पष्ट किया कि मुस्लिम बाबरी मस्जिद के दुराग्रही नहीं हैं। बबलू खान और आजम खान जैसे किरदार हाल के कुछ वर्षों में मंदिर के समर्थन में खड़े होने वाले प्रमुख मुस्लिम चेहरों के रूप में सामने आए हैं।

विवाद की बुनियाद पर गूंजती रही संवाद की धुन

सौहार्द्र फिर संवाद की शक्ल में 19वीं शताब्दी के मध्य में परिभाषित हुआ। जब अवध के आखिरी नवाब वाजिद अली शाह ने अयोध्या में हनुमानगढ़ी पर हुए एक सांप्रदायिक विवाद के मामले में हिंदुओं के पक्ष में निर्णय किया। हकीकत तो यह है कि 1528 में रामजन्मभूमि पर बने मंदिर को तोड़े जाने की कथित घटना के बाद से यदि विवाद का सिलसिला चल पड़ा तो संवाद की धुन भी गूंजने लगी। उस युग के अयोध्या के प्रतिनिधि इतिहासकार लाला सीताराम की कृति 'अयोध्या का इतिहास' के अनुसार बाबर के पौत्र अकबर ने 1580 में अपने साम्राज्य को 12 सूबों में विभक्त किया। इनमें से एक अवध सूबा भी बना और उसकी राजधानी अयोध्या बनाई गई। अकबर के ही समय विवादित स्थल से लगी भूमि पर हिंदुओं को पूजा के लिए राम चबूतरा का स्थान दिया गया। 1731 में तत्कालीन मुगल शासक मुहम्मद शाह ने अपने शिया दीवान सआदत अली खां को अवध सूबे का वजीर बनाया। सआदत अली के उत्तराधिकारी मंसूर अली खां अयोध्या की मिट्टी में कहीं अधिक रच-बस गए थे। मंसूर अली ने ही अपने दीवान नवल राय के सुझाव पर बजरंगबली की प्रधानतम पीठ हनुमानगढ़ी का निर्माण भी कराया।

इस दोस्ती की दी जाती है दाद

राम मंदिर की दावेदारी के पर्याय रहे महंत रामचंद्रदास परमहंस एवं हाशिम अंसारी की दोस्ती की दाद आज भी दी जाती है। यह दोनों किरदार अदालत में भले आमने-सामने होते थे, पर अदालत के बाहर वे आत्मीय मित्र थे। हाशिम परमहंस से मिलने उनके आश्रम दिगंबर अखाड़ा भी जाया करते थे और उनके बीच हास्य-हुलास अभी भी लोगों के जेहन में जिंदा है।

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