top menutop menutop menu

Dainik Jagran Samvadi 2019 Lucknow : संघ में कुछ भी कॉम्प्लिकेटेड नहीं है- ABVP के पूर्व संगठन मंत्री सुनील आंबेकर

Dainik Jagran Samvadi 2019 Lucknow : संघ में कुछ भी कॉम्प्लिकेटेड नहीं है- ABVP के पूर्व संगठन मंत्री सुनील आंबेकर
Publish Date:Sat, 14 Dec 2019 03:31 PM (IST) Author: Divyansh Rastogi

लखनऊ, जेएनएन। Dainik Jagran Samvadi 2019 Lucknow : संवादी... यानि साहित्य, रंगमंच, लोककला, नृत्य, गायन और वादन के दिग्गजों से साहित्य, राजनीति, संगीत, खान-पान, सिनेमा, धर्म और देशभक्ति समेत कई मुद्दों पर खुलकर एक मंच पर चर्चा। तीन दिन, बीस सत्र और संवाद की अथाह संभावनाओं के साथ संवादी आपके साथ है। भारतेंदु नाट्य अकादमी के मंच पर शुक्रवार को जब छठे संस्करण का पर्दा उठा, तो मंच से दर्शकदीर्घा तक सिर्फ एक ही गूंज थी अभिव्यक्ति की। शनिवार को दूसरे दिन सात सत्रों में वक्‍ताओं के साथ साहित्‍य, धर्म जैसे कई विषयों पर चर्चा जारी है। हर बार की तरह यह संस्करण भी इस वादे के साथ पेश है कि साहित्यिक क्षुधापूर्ति के साथ इसकी यादें आपके जेहन में अमिट रहेंगी। आइए... 

पहला सत्र : 'दलित साहित्य का भविष्य' 

वक्‍ता - श्योराज सिंह बेचैन, विवेक कुमार, पंकज सुबीर 

 

इस विषय पर विवेक कुमार ने कहा कि दलितों में मुर्दया का बहुत महत्‍व है। रविंद्र नाथ टैगोर पढ़या जाता है, लेकिन आंबेडकर के बारे मे खोजना पड़ता है। वहीं, श्योराज सिंह ने कहा कि दलित साहित्य में  काफी विविधता है। दलित व्‍यवस्‍थाओं का शिकार होते हैं, बहुजन समाज का हमने बहिष्कार कर रखा है। जब भारत आजाद हुआ तो, बटवारे के बाद जिन्ना का बयान आया कि इनके क्या काम हैं, आधे पाकिस्तान चले जायेगे, आधे हिंदुस्तान में रहेंगे। जिस पर बाबा साहब ने कहा कि आप ऐसा कह सकते हैं, कि वो हमेशा गुलाम रहेंगे। कई दलित लेखक आ चुके हैं, इलेक्‍शन में दलित आते हैं, तो दलित का साहित्य क्‍यों नहीं स्वीकार करते हैं। साहित्य का सृजन भाई चारे और मानवीय गणों का समावेश है, हम भी साझेदारी कर सकते हैं।

विवेक कुमार कहते हैं कि चाल्‍स राइट मिल्‍स ने कहा है कि अगर हम किसी का इतिहास जानते हैं तो समाज को जानते हैं। एक हमें पैदा होते ही मिलती है, दूसरी हमें पैसे से मिलती है, तीसरी आप किस संस्थान से हैं। शिक्षा भी संस्कृति को बनाता है। कुछ लोग इस संसकृति से वंचित है, जो हमारे नायक नायिकाओं के बारे मे पढ़ाने के बाद ही जान पाएंगे। शोषितों को अपना सहित्य लिखना पड़ता है। दलित साहित्य का प्रभाव है कि जो लोग बोल नहीं पाते थे, वे लिख रहे हैं। 

श्योराज सिंह बेचैन ने कहा कि दलितों को जीवन कम मिल रहा है, कोई देखता भी नहीं है। उसे नकारा जाता है, उसे कहा जाता है कि वो जातियों में बंट रहा है। एक दलित लेखक हज़ारो लोगों को दर्शाता है। दलितों के बारे में किसी ने नहीं कही, केवल राजनीती में ही दलित की बात कही जाती है। भविष्य इस बात पर निर्भर है कि दलितों की शिक्षा कैसी होती है, दारु के अलावा कुछ नहीं मिलता है। कोई पढ़ाई पर ध्यान नहीं दिया जाता है, साहित्य में भी बदलाव आयेगा। एहसास बढ़ रहा है कि हमें भिनागे बढ़ना है।

कौन हैं श्योराज सिंह बेचैन ?

प्रख्यात साहित्यकार हैं। छात्र जीवन से बाल सभा के अध्यक्ष रहे। ग्रेजुएशन के दौरान आल इंडिया स्टूडेंट फेडरेशन के जिलाध्यक्ष का पद संभाला। साथ ही पत्र-पत्रिकाओं में कविता लेखन करते रहे। धीरे-धीरे कवर स्टोरी और आलोचना के फील्ड में उतरे। दलित विमर्श और दलित साहित्य पर काफी कुछ लिख चुके हैं।

कौन हैं पंकज सुबीर ?

स्वतंत्र पत्रकार एवं कंप्यूटर हार्डवेयर, नेटवर्किंग तथा ग्राफिक्स के प्रशिक्षक हैं। रसायन शास्त्र में स्नातकोत्तर के बाद पत्रकारिता से लगाव होने के नाते प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया से जुड़े रहे। सौ से अधिक साहित्यिक रचनाएं कीं। प्रगतिशील लेखक संघ की ओर से पुरस्कार और पं. जनार्दन शर्मा स्मृति कविता समेत कई सम्मान प्राप्त कर चुके हैं।

 

दूसरा सत्र :  धर्म की भाषा

वक्‍ता - रिजवान अहमद, मौलाना खालिद रशीद फरंगी महली

मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना

दूसरे सत्र केे धर्म की भाषा में सवाल उठा कि क्या धर्म की कोई भाषा हो सकती है, या धर्म की कोई भाषा होनी चाहिए? बनारस हिंदू विश्वविधालय में डॉ फीरोज खान को लेकर विवाद हुआ था, जिसके बाद ये सवाल उठा?इसपर मौलाना खालिद रशीद फरंगी महली ने कहा कि मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना, मजहब की भाषा प्यार होना चाहिए। सारे मज़हब की कैसे इज्‍जत करें। अगर फिरोज संस्‍कृत पढ़ाते तो एकता का पैगाम मिलता। भाषा को कभी मजहब से नहीं जोड़ना चाहिए। विनय पाठक का कहना है कि पंथ और धर्म अलग-अलग हैं, हिंदू शब्द किसी उप निषाद में नहीं है। बल्कि हिंद में रहने वालों को कहा जाता है। बीएचयू का विवाद कर्मकांड का विवाद था। जिनसे उस कर्मकांड को जिया, नहीं तो वो पढ़ सकते है की नहीं। संस्कृत का काम, पंथ, भाषा और धर्म अलग-अलग है।

वहीं, रिजवान अहमद ने कहा कि धर्म की भाषा होती है, पानी का मजहब नहीं है, लेकिन गंगा जल का मजहब है। अरबी एक भाषा है, लेकिन जब अजान होतीं है तो उसका मजहब होता है। शास्त्रों के ज्ञान के लिए बीएचयू की स्थापना मदन मोहन मालविय ने की थी। इसी तरह हम नदवा में किसी अरबी के विद्वान को नौकरी नहीं देंगे। बीएचयू मे मज़हब का रिलेशन था। मौलाना खालिद रशीद फरंगी महली ने कहा कि गैर मुस्लिम कई मुस्लिम विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं। सेक्युलरिज्‍म को नॉनसेंस कहना संविधान के खिलाफ है।

जानें कौन हैं मौलाना खालिद रशीद फरंगी महली ?

मौलाना खालिद रशीद फरंगी महली मुस्लिम धर्मगुरु एवं ईदगाह के ईमाम हैं। इस्लामिक सेंटर ऑफ इंडिया एवं दारुल उलूम फरंगी महल के चेयरमैन के पद पर हैं। साथ ही पर्सनल लॉ बोर्ड में सदस्य हैं।

तीसरा सत्र - साहित्य का स्वर्ण युग

वक्‍ता - राजेंद्र राव, शैलेंद्र सागर, रत्नेश्वर, अमरीक सिंह दीप

तीसरे सत्र में वक्ता रत्नेशर ने कहा कि आज नई सदी में स्वर्ण युग का दरवाजा खुल गया है। आज लेखकों को पैसे भी मिलने लगे हैं। वहीं, अमरीक सिंह दीप ने कहा कि मैं फैक्टरी में वर्कर था। मैं साहित्य पढ़ा, इसके बाद लिखना सीखा। इसलिए मेरे लिए यही स्वर्ण युग है। इस पर राजेंद्र राव ने कहा कि आज के लेखकों के पास ढेर सारे प्लेटफार्म हैं। साथ ही नये लेखकों के पास उसे पाठकों तक पहुंचाने का भी माध्यम है। लेकिन आज के लेखक साहित्य के मानकों पर खरा नहीं उतरता। साहित्य के मानकों को बेस्ट सेलर तय नहीं करता है। 

कौन हैं अमरीक सिंह दीप ?

वरिष्ठ कथाकार हैं। किस्सगोई के उस्ताद माने जाते हैं। सौ से अधिक कहानियां विभिन्न श्रेष्ठ साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। कहा जाएगा सिद्धार्थ, कालाहांडी, चांदनी हूं मैं, बर्फ का दानव, शाने पंजाब व ऋतुनागर प्रमुख कृतियां हैं।

कौन हैं राजेंद्र राव?

वह वरिष्ठ कथाकार हैं। साहित्य जगत में बुलंदियों को स्पर्श किया और हिंदीजनों के मनों में अमिट छाप छोड़ी। कथा विधा के जीवंत प्रतिमान हैं। अभियांत्रिकी जैसे नीरस विषयों पर भी एक से बढ़कर एक कथाएं लिखकर हिंदी साहित्य को समृद्ध किया। बदलते समय में पारंपरिक समाज की पारिस्थितिकी को अत्यंत बारीकी से अपनी कथाओं में उल्लिखित किया है।

चौथा सत्र - साहित्य का उपन्यासकाल

वक्‍ता - हृषीकेश सुलभ, भगवानदास मोरवाल, सत्यानंद निरुपम

कहानी लिखने के लिये अनुशासन चाहिए

उपन्यास की परंपरा में आ रहे बदलाव और साहित्‍य में बायोपिक के शामिल होने के बारे में सत्यानंद निरुपम ने कहा कि लोगों के पास समय कम हो गया है। अब मझले उपन्यास का समय आ गया है। बात किताब की मोटाई में नहीं, उसमें लिखी बात की होती है। हिंदी पाठक बड़े उपन्यास भी पढ़ना चाहता है, हर तरह के लोग है। वहीं, हृषीकेश ने कहा कि कहानी लिखने की एक कला है, लिखने के लिये अनुशासन चाहिए। भगवानदास मोरवाल ने कहा कि हर व्यक्ति के जीवन में एक या दो उपन्यास जरूर होता है। यह केवल स्मृति और भाव का विषय होता है। जरूरी नहीं कि आपकी प्रिय रचना पाठकों को भी पसंद आए। उपन्यास लेखक के धर्य और अनुशासन की मांग करता है, लेखक के सामने चुनौती यही होती है कि पुराने अनुभव का अतिक्रमण करे। इसी बीच बड़े उपन्यासकार और नए उपन्यासकार के अंतर को स्‍पष्‍ट करते हुए सत्यानंद निरुपम ने कहा कि कभी-कभी पुराने लेखक भी लचीले होते हैं, कभी-कभी नए लेखक भी कठोर होते हैं। वर्तमान में स्मरण, कहानी, कविता का दौर है। अभी उपन्यास सही रूप से खाद-पानी नहीं प्राप्त कर रहा है। बीस सालों के बाद यह फिर से अपने असल वजूद में लौटेगा। 

बेहद आत्मबोधित होती है आत्मकथा

हृषीकेश सुलभ कहते हैं कि हिंदी में लेखक संपादक नहीं रखते थे, हिंदी में पेशेवर नाम की कोई चीज़ नहीं थी। अब नया दौर आया है, कि प्रकाशक सोचने लगे हैं। उपन्यास में काम ना कर संस्करण बनाने पर भगवानदास मोरवाल ने कहा कि जब लेखक लिखने बैठता है तो कई चीज छूट जाती हैं। आत्मकथा, बेहद आत्म बोधित होती है। इस दौरान भगवानदास ने बताया कि उनका पसंद का उपन्यास आधा गांव, मैला आंचल है। 20 साल बाद उपन्यास की स्थिति बताते हुए भगवानदास ने कहा कि आने वाले 20 वर्षो मे उपन्यास का अच्‍छा समय आयेगा।  

कौन है सत्यानंद निरुपम ?

दिल्ली विश्वविद्यालय से एमफिल का लघु शोध कार्य पूरा करने के बाद एनसीईआरटी में बतौर जूनियर प्रोजेक्ट फेलो काम किया। 1996 में राष्ट्रीय बाल विज्ञान कांग्रेस, हैदराबाद में गोरखपुर के बाल श्रमिकों की स्थिति पर तैयार किये अनुभव पत्र के लिए सम्मान मिल चुका है।

कौन है हृषीकेश सुलभ ?

हिंदी के समकालीन शीर्ष लेखकों मे हैं। कहानी, नाटक और रंगमंच आलोचना की विधाओं के लिए जाने जाते हैं। कहानी संग्रह वसंत के हत्यारे के लिए इंदु शर्मा अंतरराष्ट्रीय कथा सम्मान मिला। बनारसी प्रसाद भोजपुरी सम्मान, अनिल कुमार मुखर्जी सम्मान, रामवृक्ष बेनीपुरी सम्मान भी मिला है।

कौन है भगवानदास मोरवाल ?

कहानी एवं उपन्यासकार हैं। काला पहाड़, बाबल तेरा देस में जैसे उपन्यास लिखने के लिए पहचाने जाते हैं। कहानी संग्रह, कविता संग्रह समेत कई पुस्तकें प्रकाशित कर चुके हैं। दिल्ली हिंदी अकादमी सम्मान, यूके कथा सम्मान के अलावा कई पुरस्कार मिले हैं।

पांचवां सत्र - संघ का भविष्य

वक्‍ता - सुनील आंबेकर 

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ में कुछ भी कॉम्प्लिकेटेड नहीं है 

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के भविष्य और उसके काम के बारे बताते हुए सुनील आंबेकर ने कहा कि ये मैदान में शुरु हुआ खुला संगठन है। इसमें कुछ भी छिपा नहीं है। समाज की कमियों को दूर करने के लिए संघ का निर्माण हुआ है, जो आज भी इसी उद्देश्य के साथ संगठन सतत जारी है। संघ में कुछ भी कॉम्प्लिकेटेड नहीं है। संघ सामान्य लोगों के लिये हैं, स्वदेश के लिये है। महत्मा गांधी कई बार संघ जाते थे। 

भारतीय संस्कृति अन्य से बिल्कुल अलग 

गांधी की तरफ संघ के झुकाव पर सुनील ने कहा कि महत्मा गांधी कई बार संघ जाते थे। संघ देश को सुरक्षित बनाना चाहता है। 2047 में भारत की स्‍थ‍िति पर सुनील बोले, हमारे देश में परिवार महत्वपूर्ण रहा है। आने वाले समय में सब ठीक तभी हो सकता है, जब हम प्यार का रिश्ता बनाए रखे। 21वीं सदी में भी हम एकल परिवार की बात करते हैं। संघ में लगातार महिलाओं की भागीदारी बढ़ रही है। समाज के हित में संघ सदैव तत्पर रहेगा। भारतीय संस्कृति अन्य से बिल्कुल अलग है। हम सभी परम्पराओं का स्वागत करते हैं। हम किसी को हिन्दू-मुस्लिम में नहीं बांटते हैं। बस हमें अपने पूर्वजों को जानना चाहिए। श्री राम हमारे पूर्वज हैं। 

संघ में महिलाओं की भूमिका पर सुनील ने कहा कि 1936 में संघ बना। संघ की शाखा मुहल्‍ले में लगती है, जब लोग मांग करेगे तब ऐसा हो सकता है। एबीवीपी में महिलाएं है, जो प्रचार-प्रसार में लगी हैं। महिलाओं की सुरक्षा के लिए कानून के साथ-साथ समाज की पहल जरूरी है। सरकार पर दबाव बनाना चाहिए। संघ ने सेल्फ डिफेंस कार्यक्रम में आठ लाख छात्राओं को ट्रेनिंग दिया गया और सतत जारी है। अन्य कई योजना भी बनाई जा रही है। शाखाओं का विस्तार पर बदलती प्रचारक की भूमिका पर सुनील ने कहा कि स्वयं सेवक और प्रचारक से संघ चलता है। मुझे ऐसी गलत चीज नजर नहीं दिखती है। 

कौन है सुनील आंबेकर ?

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के लंबे समय तक राष्ट्रीय संगठन मंत्री रहे। छात्र जीवन में ही विद्यार्थी परिषद से जुड़ गए और देशभर में संगठन का कार्य करते रहे। राष्ट्रीय संस्थानों के छात्रों के लिए प्रेरणादायी मंच सोचो भारत के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के काम करने के तौर तरीकों को लेकर एक किताब द आरएसएस रोडमैप्स 21 सेंचुरी लिखी है।

छठा सत्र - हजलगोई की खत्म होती रवायत

वक्‍ता - नैयर जलालपुरी, असमत मलीहाबादी 

प्रोफेसर एवं मशहूर शायर नैय्यर जलालपुर ने कहा कि हजलगोई केवल शायरी नहीं होती। कविता का हास्य रूप हजलगोई कहलाती है। गूगल में आपको इसका अलग-अलग भाव मिलेगा। शायर कभी अपने सोच से समझौता नहीं करता। वो सब कुछ बेच सकता है, लेकिन कलम नहीं बेच सकता। वहीं, असमत मलीहाबादी कहते हैं कि 'खेलते-खेलते दिवाली में, हो गए बंद कोतवाली में।'

सातवां सत्र : मुंबई से आया मेरा दोस्त

वक्ता : पवन मल्होत्रा

सातवें सत्र मुंबई से आया मेरा दोस्त में अभिनेता और लेखक पवन मल्होत्रा ने अपने शुरुआती कैरियर से जुड़े संस्‍मरणों को साझा किया। उन्‍होंने कहा, सफलता को कोई फिक्स सांचा नहीं होता है। जो भी मेरे झोली में काम आया, करता गया। मेरे लिए सभी फिल्में आर्ट फिल्में होती हैं..अब सिनेमा में बदलाव आ गया है। पुरानी फिल्मों का कोई जवाब नहीं है। आज भी आप अपने बच्चों को मदर इंडिया दिखा सकते हैं। पवन ने बताया कि मैंने कभी कुछ प्लान नहीं किया। सब कुछ होता चला गया। आज भी जब लोग सलीम लंगड़े पे मत रो या बाघ बहादुर फिल्म का जिक्र करते हैं तो अच्छा लगता है। दो तरह के एक्टर होते हैं। एक वे जो प्यार पाते हैं, एक वे जो इज्जत। यह अभिनेता पर निर्भर है कि वह किस तरह का अभिनेता बनना चाहता है। टिकटॉक वगैरह पर अगर कोई समय बिता रहा है या वीडियो बना रहा है तो बनाने दीजिए। पता नहीं कहां से कब कौन सी राह निकल आए। मेरा शौक ही मेरी रोजीरोटी बन गया। इससे अच्छी बात और क्या होगी। हर तरह की कहानियों पर फिल्म बननी चाहिए। आज बन भी रही हैं।

कौन हैं पवन मल्होत्रा ?

पवन मल्होत्रा हिंदी फिल्मों एवं टीवी के प्रसिद्ध अभिनेता हैं। दूरदर्शन के धारावाहिक नुक्कड़ से प्रसिद्ध हुए। भाग मिल्खा भाग, ब्लैक फ्राइडे, डॉन, बाघ बहादुर जैसी फिल्मों में अभिनय कर चुके हैं। यतीन्द्र संगीत और साहित्य के अध्येता हैं। लता सुरगाथा कृति के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिल चुका है। साहित्य जगत में उल्लेखनीय योगदान के लिए रजा पुरस्कार, भारत भूषण अग्रवाल स्मृति आदि पुरस्कार भी प्राप्त हैं।

This website uses cookie or similar technologies, to enhance your browsing experience and provide personalised recommendations. By continuing to use our website, you agree to our Privacy Policy and Cookie Policy.