UP Panchayat Chunav Result 2021: पंचायतों में भाजपा की बढ़ी ताकत, सीटें घटीं पर सपा का रुतबा बरकरार

पंचायती सियासत की महारथी मानी जाने वाली समाजवादी पार्टी का एकाधिकार कमजोर पड़ता दिख रहा है।

UP Panchayat Chunav Result 2021 जिला पंचायत बोर्डों पर काबिज होने के लिए भाजपा के सामने चुनौती कड़ी है। पंचायती सियासत की महारथी मानी जाने वाली सपा का एकाधिकार कमजोर पड़ता दिख रहा है लेकिन बड़ी ताकत वह अब भी बनी हुई है।

Umesh TiwariThu, 06 May 2021 08:28 AM (IST)

लखनऊ [अवनीश त्यागी]। वैसे तो पंचायत चुनावों में स्थानीय कारक ही प्रभावी होते हैं और परिणाम में स्थानीय प्रभुत्व की ही बड़ी भूमिका होती है, लेकिन यदि राजनीतिक दलों के दावों को आधार बनाएं तो भारतीय जनता पार्टी अपनी ताकत बढ़ाने में कामयाब रही है। हालांकि जिला पंचायत बोर्डों पर काबिज होने के लिए उसके सामने चुनौती भी कड़ी है। पंचायती सियासत की महारथी मानी जाने वाली समाजवादी पार्टी का एकाधिकार कमजोर पड़ता दिख रहा है, लेकिन बड़ी ताकत वह अब भी बनी हुई है। निर्दलीयों के अलावा छोटी पार्टियों को गेमचेंजर माना जा रहा है। वहीं बसपा के रुख पर भी निगाहें लगी हैं।

उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव में दो प्रमुख दल बनकर उभरे भाजपा व सपा नेताओं के दावों पर गौर करना भी जरूरी है। वर्ष 2015 में 62 जिला पंचायत बोर्डों पर काबिज होने वाली समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष नरेश उत्तम पटेल बताते हैं कि पिछले चुनावों में करीब 1500 सदस्य विजयी हुए थे, इस बार लगभग एक हजार जीते हैं, जिसमें सहयोगी राष्ट्रीय लोकदल भी शामिल है। रालोद के पदाधिकारी 60 सीटों पर जीत के दावे करते हैं।

दूसरी ओर वर्ष 2015 में लगभग 350 सदस्यों और मात्र पांच जिला पंचायत बोर्डों में सिमटी भाजपा इस बार 981 सदस्य जीतने को लेकर उत्साहित है। प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्रदेव सिंह का कहना है कि पंचायत चुनाव के इतिहास में ऐसी जीत कभी हासिल नहीं हुई, वो भी कोरोना महामारी जैसी विषम परिस्थितियों में। उनका दावा है कि हमने सपा-बसपा की तरह चुनाव में सत्ता का कोई दुरुपयोग नहीं किया। जिला पंचायत अध्यक्ष पदों के लिए भाजपा का साथ देने के लिए बड़ी संख्या में निर्दल और छोटे दल लगातार संपर्क में हैं।

बसपा के हालात अधिक नहीं बदले : पंचायत चुनाव में बहुजन समाज पार्टी की स्थिति कमोबेश वर्ष 2015 जैसी रही है। बसपा का दावा 400 से ज्यादा सदस्य जीतने का है परंतु एक दो जिलों को छोड़कर उनकी संख्या कही भी मुख्य लड़ाई में आने लायक नहीं है। आगामी विधानसभा चुनाव में सत्ता वापसी का जतन कर रही बसपा के लिए समाजवादी चक्रव्यूह तोड़ना पहली परीक्षा है। सपा बढ़ेगी तो बसपा का मुख्य मुकाबले में बने रहना आसान नहीं होगा।

विपक्ष को बगावत का खतरा भी कम नहीं : जिला पंचायत व क्षेत्र पंचायत अध्यक्षों का चुनाव सदस्यों द्वारा किया जाता है। सो इसमें सत्ताधारी दल का पलड़ा ही भारी रहता आया है। सत्ता बदलने के साथ ही अविश्वास प्रस्तावों के जरिये तख्ता पलटने की परंपरा भी रही है। वर्ष 2010 में बसपा व वर्ष 2015-16 में समाजवादी पार्टी सत्ता के सहारे ही जिला पंचायत बोर्डों पर कब्जा करने में सफल रही थी। जाहिर है भाजपा भी जोड़तोड़ से जीत के समीकरण बनाने में पीछे नहीं रहेगी। ऐसे में विपक्षी दलों को अपने विजयी सदस्यों को संभालने रखना आसान नहीं होगा। पंचायत चुनाव में पार्टी सिंबल प्रयोग न होने के कारण व्हिप जैसे हथियार भी नहीं अपनाए जा सकते। बागियों के दलबदल से सदस्यता जानेे का खतरा पंचायतों में नहीं है।

अध्यक्षी के चुनाव में दिखेगी असली ताकत : चूंकि पंचायत चुनावों में कोई दल सिंबल के साथ अपने अधिकृत प्रत्याशियों की सूची नहीं जारी करता, सिर्फ समर्थन की घोषणा करता है इसलिए राजनीतिक दलों के दावों पर ही उनकी ताकत का अनुमान लगाया जा सकता है। इन दलों की असली ताकत जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में होगी, जहां जोड़तोड़, स्थानीय प्रभाव और राजनीतिक वर्चस्व की जंग खुलकर सामने आएगी। किस दल के कितने अध्यक्ष चुने जाते हैं, इसी के आधार पर उनकी ताकत का मूल्यांकन होगा।

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