2019 की नीति पर यूपी में फिर रण सजा सकते हैं अम‍ित शाह, जान‍िए इस बार क्‍या हैं चुनौत‍ियां

यूं तो मिशन-2022 की कमान अनुभवी हाथों में ही है लेकिन रणनीति को धार देने के लिए वही अमित शाह आ रहे हैं जो बतौर राष्ट्रीय अध्यक्ष 2019 में सपा-बसपा गठबंधन वाले चुनौतीपूर्ण चुनाव में विरोधी खेमे को चारों खाने चित कर चुके हैं।

Anurag GuptaThu, 28 Oct 2021 06:15 AM (IST)
सपा-बसपा के गठबंधन वाले चुनाव को सबसे चुनौतीपूर्ण मानती है भाजपा।

लखनऊ, राज्य ब्यूरो। जातीय प्रभाव वाले विभिन्न दलों के नेताओं को अपने पाले में लेकर सपा मुखिया अखिलेश यादव अपनी फौज मजबूत कर रहे हैं तो भाजपा अपने किले को अभेद्य बनाने में जुट गई है। यूं तो मिशन-2022 की कमान अनुभवी हाथों में ही है, लेकिन रणनीति को धार देने के लिए वही अमित शाह आ रहे हैं, जो बतौर राष्ट्रीय अध्यक्ष 2019 में सपा-बसपा गठबंधन वाले चुनौतीपूर्ण चुनाव में विरोधी खेमे को चारों खाने चित कर चुके हैं। इस बार विधानसभा चुनाव का रण वह उसी नीति पर सजा सकते हैं। केंद्रीय गृह मंत्री बनने के बाद अमित शाह लखनऊ तो आ चुके हैं, लेकिन पार्टी मुख्यालय में संगठन की बैठक लेने वह पहली बार आ रहे हैं। जिस तरह से उनकी बैठकों का कार्यक्रम प्रस्तावित है, इससे समझा जा सकता है कि वह चुनावी रणनीति को ही समझने और तराशने के लिए आ रहे हैं।

अव्वल तो वह संगठन में भी 'अंत्योदय' के सिद्धांत पर भरोसा करते हैं। यही वजह है कि प्रदेश प्रभारी के रूप में 2014 में जब लोकसभा चुनाव की जिम्मेदारी संभाली, तब सबसे पहले बूथ अध्यक्षों के सम्मेलन को संबोधित कर बूथ स्तर के संगठन को प्रोत्साहित किया। इस बार भी वह लखनऊ आ रहे हैं तो सबसे पहले डिफेंस एक्सपो मैदान में अवध क्षेत्र के शक्ति केंद्र (सेक्टर) प्रभारी और संयोजकों के सम्मेलन को संबोधित करते हुए सदस्यता अभियान शुरू करेंगे। इसके बाद पार्टी मुख्यालय में संगठन की बैठकें लेंगे। वह प्रदेश प्रभारी राधा मोहन सि‍ंह, चुनाव प्रभारी धर्मेंद्र प्रधान, चुनाव प्रबंधन प्रभारी अनुराग ठाकुर, सभी सह-प्रभारियों और कोर कमेटी के साथ बैठक करेंगे। गौर करने वाली बात यह है कि उन्होंने लोकसभा चुनाव 2019 के सभी लोकसभा संयोजक और प्रभारियों को भी बुलाया है।

पार्टी पदाधिकारी मानते हैं कि यह कार्यकर्ता 2019 के लोकसभा चुनाव में पार्टी की रणनीति को जमीनी स्तर पर उतारने में सफल रहे। यही वजह है कि जब सपा-बसपा ने गठबंधन कर मजबूत जातीय गठजोड़ बनाने का प्रयास किया, तब उसे भी भाजपा ने अपना दल (एस) के साथ बेअसर कर 80 में से 64 सीटें जीत ली थीं। अब सपा और बसपा बेशक अलग हैं, लेकिन बसपा के कई नेता सपा में शामिल हो चुके हैं। इधर, पूर्वांचल की कई सीटों पर प्रभाव वाले राजभर समाज के नेता और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर ने भी अखिलेश के साथ गठबंधन कर लिया है। जातीय गठजोड़ की इन चुनौतियों से निपटने के लिए भाजपा के रणनीतिकार शाह 2017 और 2019 के चुनावी फार्मूले को फिर से आजमा सकते हैं। साथ ही जातियों के सामाजिक सम्मेलनों के जरिए भाजपा भी अपने समीकरण साधने में लगी है।

समान हैं चुनावी चुनौतियां : यह सवाल हो सकता है कि भाजपा को 2019 से ज्यादा सीटें 2014 के लोकसभा चुनाव में मिली थीं। 2017 के विधानसभा चुनाव में भी प्रचंड बहुमत के साथ 403 में से 304 सीटें जीतीं। फिर सफलता का पैमाना 2019 क्यों? पार्टी पदाधिकारियों का तर्क है कि 2014 और 2017 में भाजपा के सामने सत्ता के प्रति नाराजगी वाली चुनौती नहीं थी। पार्टी नए चेहरे के रूप में सामने थी, जबकि 2019 के लोकसभा चुनाव में आशंका थी कि कुछ की नाराजगी केंद्र सरकार से रहेगी और इधर प्रदेश सरकार को भी दो वर्ष हो चुके थे। साथ ही सपा-बसपा का गठबंधन था। इस लिहाज से 2022 के विधानसभा चुनाव की चुनौतियां लगभग 2019 के लोकसभा चुनाव जैसी ही हैं।

पुराने कार्यकर्ता सक्रिय करने की जुगत : शाह की बैठक में प्रदेश के सभी पूर्व विधायक और पूर्व सांसद भी बुलाए गए हैं। इनमें तमाम पूर्व जनप्रतिनिधि अब संगठन के कार्यों में सक्रिय नहीं हैं, जबकि क्षेत्र में प्रभाव रखते हैं। गृह मंत्री इन सभी को आगामी चुनाव के लिए सक्रिय करना चाहते हैं।

हर बूथ पर सौ नए सदस्य बनाएंगे : स्वतंत्रदेव - भाजपा प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्रदेव सि‍ंह ने बताया कि गृह मंत्री अमित शाह प्रदेशभर के लिए सदस्यता अभियान का शुभारंभ करेंगे। लक्ष्य है कि हर बूथ पर नौ सदस्य बनाए जाएं। इसके अलावा संगठनात्मक बैठकों में वह चुनावी तैयारियों की समीक्षा कर मार्गदर्शन देंगे।

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