बसपा के लिए उत्तर प्रदेश में ही मुफीद रहा अन्य दलों से गठबंधन, बाहरी राज्यों में नहीं रहा भाग्यशाली

पंजाब में शिरोमणी अकाली दल से गठबंधन करके बीएसपी ने उत्तर प्रदेश से बाहर पांव जमाने की कोशिश की है। बीएसपी के लिए बाहरी राज्यों में गठबंधन भले ही सुखद नहीं रहा लेकिन उत्तर प्रदेश में सत्ता के शिखर तक पहुंचने में गठजोड़ की राजनीति बेहद मुफीद रही है।

Umesh TiwariSun, 13 Jun 2021 08:00 AM (IST)
अन्य दलों से गठबंधन बसपा के लिए उत्तर प्रदेश में ही सफल रहा है।

लखनऊ [राज्य ब्यूरो]। पंजाब में शिरोमणी अकाली दल से गठबंधन करके बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) ने एक बार फिर उत्तर प्रदेश से बाहर राजनीतिक पांव जमाने की कोशिश की है। बीएसपी के लिए बाहरी राज्यों में गठबंधन भले ही सुखद नहीं रहा, लेकिन उत्तर प्रदेश में सत्ता के शिखर तक पहुंचने में गठजोड़ की राजनीति बेहद मुफीद रही है। वर्ष 1993 में समाजवादी पार्टी से मिलकर चुनाव लड़ने का फायदा बसपा को मिला और मायावती पहली बार मुख्यमंत्री की कुर्सी पर आसीन हुईं। वर्ष 1996 में कांग्रेस से मिल कर विधानसभा चुनाव लड़ा तो बसपा अपना वोट प्रतिशत बढ़ाने में कामयाब रही। वर्ष 2019 में बसपा ने समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल से मिलकर चुनाव लड़ा तो लोकसभा में प्रतिनिधित्व बढ़ाया। हालांकि यह अलग बात है कि बसपा का गठबंधन किसी दल से लंबा नहीं चल सका।

बसपा की गठबंधन की राजनीति पर थोड़ा विस्तार से नजर डालें तो 1984 में गठन के बाद बहुजन समाज पार्टी ने वर्ष 1991 का विधानसभा चुनाव अकेले लड़ा था। इसमें 10.26 प्रतिशत वोट हासिल कर पार्टी ने 12 विधायक जिताने में कामयाबी पायी थी। करीब दो वर्ष बाद समाजवादी पार्टी से गठबंधन कर चुनाव लड़ा तो न केवल राममंदिर लहर को रोकने का श्रेय मिला, बल्कि प्रदेश में मुख्यमंत्री की कुर्सी पर पहली कोई दलित महिला बैठने में सफल रही। हालांकि सत्ता की भूख हावी होने के कारण सपा से गठबंधन दरक गया। बसपा ने सपा से दामन छुड़ा कर भाजपा के सहारे मायावती को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बनाए रखा।

वर्ष 1996 में बसपा का गठबंधन कांग्रेस से था। यह गठबंधन सपा बसपा गठबंधन की तरह चमत्कारी नहीं रहा, लेकिन बहुजन समाज पार्टी ने पांच वर्ष में अपने वोटों में इजाफा किया। 1991 में 10.26 प्रतिशत वोट पाकर 12 विधानसभा सीटों पर सिमटी बसपा ने 1996 में 27.73 मत प्रतिशत के साथ 67 सीटों पर कब्जा जमा लिया। गठबंधन की सीढ़ियों के सहारे आगे बढ़ती बसपा उत्तर प्रदेश में वर्ष 2007 में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने में कामयाब हो गयी।

पुन: गठबंधन बना संजीवनी : बसपा के लिए 2019 में समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल से गठबंधन करना संजीवनी सिद्ध हुआ। बसपा प्रमुख मायावती भले ही गठबंधन का लाभ न मिल पाने की बात करें, लेकिन लोकसभा में शून्य से सांसदों की संख्या बढ़कर दस होने का श्रेय गठबंधन को ही जाता है। गत लोकसभा चुनाव में गठबंधन का कोई लाभ सपा व रालोद को नहीं मिल सका, क्योंकि समाजवादी पार्टी केवल पांच सांसद जिता सकी और रालोद के अजित सिंह व उनके पुत्र जयंत चौधरी अपने गढ़ को भी नहीं बचा सके।

यूपी के बाहर बसपा का गठबंधन दांव बेकार : अब तक दूसरे राज्यों में बसपा को अन्य दलों का साथ भाग्यशाली नहीं रहा। दूसरे राज्यों में बसपा द्वारा किए गए गठबंधनों पर नजर डालें तो ऐसा ही दिखता है। बिहार में उपेंद्र कुशवाहा, ओवैसी, ओमप्रकाश राजभर के साथ मिलकर बसपा ने छह दलों का ग्रैंड डेमोक्रेटिक सेक्युलर फ्रंट बनाया। इसमें बसपा को 80 सीटों पर अपना उम्मीदवार उतारने का मौका मिला, परंतु नतीजे निराशाजनक रहें। छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी जनता कांग्रेस के साथ लड़े चुनाव में भी बेहतर परिणाम नहीं मिल सके। मध्य प्रदेश में दलित वोटों की अच्छी खासी संख्या जरूर है, परंतु वहां बसपा की दाल नहीं गल पाती है। राजस्थान में बसपा ने कांग्रेस को समर्थन देकर सरकार बनाने में मदद की, परंतु बदले में धोखा मिला। कांग्रेस ने बसपा के सभी छह विधायकों को अपनी पार्टी की सदस्यता दिला तगड़ा झटका दिया। हरियाणा में भी इंडियन नेशनल लोकदल का साथ लेकर प्रदेश की सियासत में छाने के इरादे भी बसपा कारगर नहीं हो सकी।

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