अयोध्या में त्रेतायुगीन विरासत के अनुरूप मंदिरों से निकली राम बारात, देर रात तक निभती रही विवाह की रस्म

रामनगरी आस्था के प्रवाह में नित्य डुबकी लगाती है किंतु बुधवार को यह रंग इतना प्रगाढ़ था कि रामनगरी के कण-कण से आस्था स्फुरित हो रही थी। लोग मंदिरों की ओर लीनता से बढ़े जा रहे थे। जहां तक प्रवेश स्वीकृत था वहां तक लोग वाहन से जा रहे थे।

Vikas MishraPublish:Wed, 08 Dec 2021 10:53 PM (IST) Updated:Thu, 09 Dec 2021 09:11 AM (IST)
अयोध्या में त्रेतायुगीन विरासत के अनुरूप मंदिरों से निकली राम बारात, देर रात तक निभती रही विवाह की रस्म
अयोध्या में त्रेतायुगीन विरासत के अनुरूप मंदिरों से निकली राम बारात, देर रात तक निभती रही विवाह की रस्म

अयोध्या, [रघुवरशरण]। रामनगरी आस्था के प्रवाह में नित्य डुबकी लगाती है, किंतु बुधवार को यह रंग इतना प्रगाढ़ था कि रामनगरी के कण-कण से आस्था स्फुरित हो रही थी। लोग मंदिरों की ओर पूरी लीनता से बढ़े जा रहे थे। जहां तक प्रवेश स्वीकृत था, वहां तक लोग वाहन से जा रहे थे और आगे की यात्रा वे निरुत्साहित हुए बिना पैदल ही कर रहे थे। इनमें कई ऐसे थे, जिनका पैदल चलना न के बराबर होता है, किंतु आस्था की डगर पर वे भी पूरे हौसले से आगे बढ़ रहे होते हैं। श्रद्धालुओं के इस प्रवाह में बूढ़े-बच्चे और महिलाएं भी शामिल होते हैं औैर वे भी पूरे हौसले से आस्था की डग भर रहे होते हैं। किसी की मंजिल कनकभवन है, किसी की दशरथमहल और किसी की मधुर उपासना परंपरा की शीर्ष पीठ रंगमहल।

...तो कोई आस्था के अनेकानेक केंद्रों को अपने भावों और अपनी भावनाओं में भर लेना चाहता है। यह परि²श्य अकेले रामनगरी के केंद्र रामजन्मभूमि के पूरक त्रेतायुगीन मंदिरों से जुड़ते मार्गों का नहीं होता, नगरी के अन्य हिस्सों में स्थित मंदिरों और उन मंदिरों से जुड़ते मार्गों का होता हैै। आस्था के इस प्रवाह का चरम रात गहराने के साथ परिलक्षित होता है, जब भव्य बारात विभिन्न मंदिरों से निकलकर नगरी के मुख्य मार्ग से गुजर रही होती है। मौका, प्रत्येक वर्ष अगहन शुक्ल पक्ष पंचमी की तिथि को मनाए जाने वाले सीता-राम विवाहोत्सव का होता है। इस बार रामजन्मभूमि पर भव्य-दिव्य मंदिर निर्माण की प्रक्रिया आगे बढऩे के साथ आस्था का यह रंग कुछ अधिक चमक के साथ प्रस्तुत हुआ। हालांकि, दिन ढलने के साथ बुधवार का सूर्य अस्त हो चुका था, पर आस्था का सूर्य पूरी भव्यता से रामनगरी के क्षितिज पर रोशन हुआ।

राम विवाहोत्सव की रौनक नगरी में सप्ताह भर पूर्व से ही व्याप्त है। अवध एवं मिथिला की संस्कृति के अनुरूप कहीं विवाह की रस्म संपादित हो रही है, तो कहीं राम विवाह पर केंद्रित लीला की प्रस्तुति एवं प्रवचन की रसधार प्रवाहित हो रही है। बुधवार को ऐन विवाहोत्सव के दिन उत्सव का शिखर परिलक्षित हुआ। यूं तो नगरी के शताधिक मंदिर विवाहोत्सव की सरगर्मी के साक्षी हैं, पर कुछ मंदिरों के उत्सव भव्यता के पर्याय हैं। रामभक्तों की शीर्ष पीठ कनकभवन, इसी से कुछ फासले पर स्थित दशरथमहल बड़ास्थान, रंगमहल, मणिरामदास जी की छावनी, रामवल्लभाकुंज, जानकीमहल, अमावा राम मंदिर, लक्ष्मणकिला, हनुमानबाग, रामहर्षणकुंज, विअहुतीभवन, सियारामकिला, रसमोदकुंज आदि इसी कोटि के मंदिर हैं। इन मंदिरों में बुधवार को न केवल विवाहोत्सव से जुड़ी रस्म का निष्पादन पूर्णता की ओर बढ़ा, बल्कि श्रद्धालुओं के सैलाब से अभिषिक्त होने के साथ उत्सव का वैशिष्ट््य भी परिभाषित हुआ।

दिन ढलने के कुछ ही देर बाद करीब दर्जन भर मंदिरों से राम बारात का प्रस्थान होते ही उत्सव का उल्लास आसमान छूता प्रतीत हुआ। मान्यता के अनुसार त्रेता में जहां राजा दशरथ का महल था, आचार्य पीठ दशरथमहल बड़ास्थान उसी स्थल पर स्थापित है और विरासत के अनुरूप इस स्थल से अयोध्या की प्रतिनिधि राम बारात निकली। राजसी वैभव के अनुरूप पूरे ठाट-बाट से। पालकी पर विराजे आराध्य विग्रह, बैंड की धुन, पताकाधारी श्रद्धालुओं की बड़ी पांत और हाथी-घोड़ों से सज्जित बरात त्रेतायुगीन वह परि²श्य उपस्थित कर रही थी, जब अयोध्या से जनकपुर के लिए बारात का प्रस्थान हुआ होगा। कनकभवन में सायं पट खुलने के साथ भगवान राम के विग्रह पर सज्जित मौर तथा सीता के विग्रह पर मौरी दर्शनार्थियों को उत्सव की भावधारा से भिगो रही थी।

उत्सव ही नहीं अनुष्ठान भीः सीता-राम विवाहोत्सव लोकरंजक उत्सव ही नहीं साधकों-संतों के लिए गहन-गंभीर अनुष्ठान भी है। यह सच्चाई आचार्य पीठ दशरथमहल में बयां हुई। बारात प्रस्थान से पूर्व पालकी तक आराध्य विग्रह वैदिक मंत्रोच्चार के साथ ले जाए गए। दशरथमहल पीठाधीश्वर बिंदुगाद्याचार्य देवेंद्रप्रसादाचार्य समर्पित अनुरागी की भांति पूरी त्वरा से आराध्य विग्रह को चंवर डुलाते हुए गर्भगृह से पालकी तक पहुंचे। यह तत्परता स्पष्ट करते हुए ङ्क्षबदुगाद्याचार्य ने बताया, सीता-राम विवाहोत्सव हमारे लिए मात्र अतीत की स्मृति ही नहीं है, बल्कि इस आयोजन से हम अखिल ब्रह्मांड के अधिष्ठाता राम और अधिष्ठात्री सीता के बीच समन्वय के सूत्र से अपने जीवन को सम्यक-सारगर्भित बनाते हैं।