यूपी में अपनी ही अनदेखी से होते 71 फीसद सड़क हादसे, जानिए बड़ी दुर्घटनाओं की बड़ी वजह...

वाहन चलाने समय नियमों का पालन करने और खासकर सीमित गति में वाहन चलाकर हादसों को टाला जा सकता है।

यूपी में हर साल औसतन 35 हजार दुर्घटनाएं होती हैं और करीब 22 हजार लोगों की असमय मौत। यह आंकड़ा अन्य किसी आपदा अथवा अस्वाभाविक मौतों से हमेशा आगे रहता है। हम थोड़ी सावधानी बरत कर अपनी और दूसरों की जान को खतरे में डालने से बच सकते हैं।

Publish Date:Fri, 27 Nov 2020 12:31 AM (IST) Author: Umesh Tiwari

लखनऊ [आलोक मिश्र]। लखनऊ-आगरा एक्सप्रेस-वे पर शनिवार सुबह अनियंत्रित कार सड़क किनारे खड़े ट्रक से जा टकराई और चालक की मौके पर ही जान चली गई। घटना में ओवरस्पीड से लेकर सड़क पर अनजाने खतरों और अव्यवस्था के सवाल भी खड़े हुए। ऐसे हादसों को लेकर कई बार आरोप-प्रत्यारोप भी सामने आते हैं, लेकिन दुर्घटनाओं के आंकड़ों व कारणों का विश्लेषण कुछ अलग ही तस्वीर पेश करता है। एक ऐसी सच्चाई भी, जो हम सबको कठघरे में खड़ा करती है। यानी वाहन दौड़ाने वाले हर उस शख्स को जो जल्दबाजी में या फिर जानबूझकर यातायात नियमों से आंख मूंद लेता है।

उत्तर प्रदेश में होने वाली दुर्घटनाओं में 71 फीसद हादसों की वजह इंसान की गलती के रूप में सामने आती है, जबकि 29 फीसद हादसों के लिए रोड इंजीनियरिंग से लेकर वाहन की फिटनेस व अन्य अव्यवस्थाएं हैं। यह हमें सावधान भी करता है। हम खुद थोड़ा संयम और सावधानी बरत कर अपनी, अपने परिवार व दूसरों की जान को खतरे में डालने से बचा सकते हैं।

हर साल औसतन 35 हजार दुर्घटनाएं : उत्तर प्रदेश में हर साल औसतन 35 हजार दुर्घटनाएं होती हैं और करीब 22 हजार लोगों की असमय मौत। हादसों में मौत का यह आंकड़ा अन्य किसी आपदा अथवा अस्वाभाविक मौतों से हमेशा आगे रहता है। अब जरा इसकी वजह को भी झांकिए। एडीजी यातायात अशोक कुमार सिंह बताते हैं कि सड़क हादसों के विश्लेषण में सामने आता है कि करीब 71 फीसद हादसे चालक की लापरवाही से होते हैं। इनमें सबसे अधिक 37 फीसद दुर्घटनाएं ओवरस्पीड के चलते होती हैं।

ये भी हैं हादसों की वजह : 12 फीसद मामलों में चालक मोबाइल पर बात कर रहा होता है और 11 फीसद हादसे उल्टी दिशा (रांग साइड) में गाड़ी चलाने से होते हैं। 10 फीसद हादसे नशे की हालत में गाड़ी चलाने के दौरान होते हैं, एक प्रतिशत हादसे रेड लाइट तोड़ने की वजह से भी होते हैं। शेष 29 फीसद हादसों में रोड इंजीनियरिंग में खामी, वाहन की फिटनेस न होना, सड़क किनारे किसी वाहन का खड़ा होना और उसमें इंडीकेटर अथवा रिफ्लेक्टर का न लगा होना, चालक का प्रशिक्षित न होना, सड़क पर आवारा पशुओं का घूमना, कूड़ा अथवा गंदगी का पड़ा होना, सड़क पर गड्ढा होने अथवा निर्माण कार्य के अधूरे पड़े होने व मार्ग प्रकाश न होने जैसी अव्यवस्थाओं से होते हैं।

सावधानी बरत बड़े हादसों को टाला जा सकता : एडीजी यातायात अशोक कुमार सिंह का कहना है कि वाहन चलाने के दौरान नियमों का पालन करने तथा खासकर सीमित गति में वाहन चलाकर बड़े हादसों को टाला जा सकता है। यातायात माह के दौरान लोगों को इसके प्रति लागातार जागरूक भी किया जाता है। थोड़ा समय बचाने के लिए सड़क पर की गई लापरवाही का खमियाजा लोगों को बड़ी कीमत चुकाकर भुगतना पड़ रहा है।

यूपी में 1110 ब्लैक स्पॉट : उत्तर प्रदेश में बढ़ती दुर्घटनाओं का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि यहां हादसों के लिहाज से 1110 ब्लैक स्पॉट हैं। हर वर्ष तीन साल की दुर्घटनाओं के आंकड़ों के आधार पर ऐसे स्थानों को चिन्हत किया जाता है, जहां 500 मीटर के दायरे में पांच या उससे अधिक सड़क हादसे हुए हों अथवा हादसों में 10 या उससे अधिक लोगों की जाने गईं हो। ऐसे स्थानों को ब्लैक स्पॉट घोषित किया जाता है। यातायात पुलिस इसकी रिपोर्ट सड़क सुरक्षा के नोडल विभाग परिवहन विभाग को भेजती है। जिसके बाद संबंधित एजेंसियों की मदद से सड़क में निर्माण व सुधार कार्य करवाए जाते हैं। वर्ष 2019 में प्रदेश में 1131 ब्लैक स्पाट चिन्हत किए गए थे। इस वर्ष 1110 ब्लैक स्पॉट चिन्हत किए गए हैं।

ओवरस्पीड सड़कों को कर रही खून से लथपथ : उत्तर प्रदेश में दिनोंदिन बदहाल होता यातायात हर साल औसतन 30 से 35 हजार परिवारों को गहरे जख्म देता है। हादसे में गंभीर रूप से घायल व्यक्तियों व उनके परिवार के लिए भी महंगा इलाज और हादसे के बाद की परेशानियां उन्हें जिंदगी की दौड़ में कई साल पीछे धकेल देती हैं। कुछ समय बचाने के लिए पहियों की बढ़ती रफ्तार सैकड़ों बेकसूरों के भरेपुरे परिवार की खुशियों पर ही पूर्णविराम लगा देती हैं। सूबे में ओवरस्पीड हादसों का सबसे बड़ा कारण है। सर्दियां शुरू होते ही हादसों का कहर भी बढऩे लगा है। बीते 10 दिनों में लखनऊ-आगरा एक्सप्रेसवे पर ही चार से अधिक बड़ी दुर्घटनाएं हो चुकी हैं। राजधानी लखनऊ में बीते कुछ सालों में यातायात प्रबंध बेहतर हुए हैं। यातायात नियमों का सख्ती का अनुपालन भी कराया जा रहा है, लेकिन हादये में हर साल 500 से अधिक लोगों की जानें जाने का सिलसिला फिर भी टूटता नजर नहीं आ रहा

हादसों में हर साल जाती हैं 22 हजार जिंदगियां : उत्तर प्रदेश की तस्वीर पर नजर दौड़ाएं तो आंकड़ों का सच दिल दहलाने वाला होता है। प्रदेश में हर साल करीब 38 से 40 हजार सड़क दुर्घटनाएं हो रही हैं। इनमें औसतन 22 हजार लोगों की जान जाती है और औसतन 28 हजार लोग गंभीर रूप से घायल होते हैं। बेतरतीब यातायात, नशे की हालत में ओवर स्पीड ड्राइविंग व सुरक्षा के पर्याप्त बंदोबस्त न होने की वजह से हर साल सड़कें खून से लाल हो रही हैं। इन हादसों में बिना हेलमेट के दोपहिया वाहन चलाने वालों के जान गंवाने की संख्या बड़ी है। कोरोना के चलते इस वर्ष लॉकडाउन के चलते कई माह तक सड़कें वीरान पड़ी रहीं। लोग घरों में कैद रहे। इसके बाद भी हादसों के आंकड़ों पर नजर दौड़ाई जाई तो कोई खास कमी नजर नहीं आती। एक जनवरी से 31 अक्टूबर 2020 के बीच प्रदेश में 26 हजार से अधिक दुर्घटनाएं हुईं और इनमें 15 हजार से अधिक लोगों की जानें चली गईं, जबकि नवंबर माह में हादसों में कई जानें जा चुकी हैं और दिसंबर का सफर बाकी है।

ओवरस्पीडिंग से होते हैं 65 फीसद हादसे : एडीजी यातायात अशोक कुमार सिंह ने बताया कि सड़क दुर्घटनाओं के कारणों के विश्लेषण में पाया गया है कि सूबे में सबसे अधिक दुर्घटनाएं ओवरस्पीड के चलते होती हैं। कुल हादसों में ओवरस्पीड के चलते 60 से 65 फीसद हादसे होते हैं। हाईवे पर छोटे वाहन ओवरस्पीड के चलते संतुलन खो देते हैं और बड़े हादसे होते हैं। इसके अलावा नशे में वाहन चलाने, ड्राइव करते समय मोबाइल पर बात करने व उल्टी दिशा में वाहन चलाने के कारण भी बड़ी संख्या में दुर्घटनाएं होती हैं।

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