चीवर दान कार्यक्रम से बौद्ध भिक्षुओं में उत्साह

कुशीनगर आर रहे प्रधानमंत्री यहां के बौद्ध भिक्षुओं को चीवर दान करेंगे यह परंपरा वर्षावास के समापन पर निभाई जा रही है बौद्ध धर्म में वर्षा वास का है विशेष महत्व।

JagranTue, 19 Oct 2021 01:07 AM (IST)
चीवर दान कार्यक्रम से बौद्ध भिक्षुओं में उत्साह

कुशीनगर : वर्षावास के समापन के दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चीवर दान कार्यक्रम से कुशीनगर के बौद्ध भिक्षुओं में उत्साह है। 20 अक्टूबर को अश्विनी पूर्णिमा तिथि है। इस तिथि पर बौद्ध भिक्षुओं के वर्षावास का समापन होगा।

प्रधानमंत्री 20 बौद्ध भिक्षुओं को चीवर दान करेंगे। भिक्षुओं के नाम का चयन जिला प्रशासन कर रहा है। बौद्ध कांक्लेव के मंच पर चीवर दान के बाद प्रधानमंत्री भिक्षुओं को संबोधित भी करेंगे।

बुद्ध ने सारनाथ में किया था पहला वर्षावास

भंते समिथा ने कहा कि बुद्ध ने अपना पहला वर्षावास ईसा पूर्व 527 में सारनाथ के ऋषीपतन में किया था। इस स्थान पर उन्होंने अपना 45 वां वर्षावास भी किया। इसके अलावा उन्होंने श्रावस्ती, जेतवन, वैशाली, राजगृह में वर्षावास किया। वर्षावास का थाईलैंड, म्यांमार, श्रीलंका कंबोडिया के बौद्ध भी पालन करते है।

बौद्ध भिक्षु भंते अशोक ने बताया कि बौद्ध जगत में वर्षावास का विशेष महत्व है। इसका प्रारंभ बुद्धत्व की प्राप्ति के बाद भगवान बुद्ध ने किया था। वर्षावास के तीन माह में भिक्षु एवं श्रामणेर संघ विहार में रहकर बौद्ध धम्म की बारीकियों का अध्ययन मनन करते हैं। आषाढ़ पूर्णिमा के दिन वर्षावास शुरू होता है और यह आश्विनी पूर्णिमा को समाप्त होता है। इस दिन देश के प्रधानमंत्री का भिक्षुओं के बीच रहना गौरव की बात है।

बुद्ध ने अपने काल में दिया था उपदेश

भंते महेंद्र ने बताया कि बुद्ध ने अपने समय काल में सभी भिक्षुओं को आदेश दिया कि वह धम्म का प्रचार प्रसार करें। सभी बौद्ध भिक्षु इस काम में लग गए। लेकिन यह कार्य करते हुए उन्हें कई संकटों का सामना करना पड़ता था। खास कर बरसात के मौसम में नदियों में बाढ़ के कारण बौद्ध भिक्षु बह जाते थे। उनके चलने से खेत की फसलों को नुकसान पहुंचता था। भिक्षुओं ने तथागत को यह बात बताई। बुद्ध ने आदेश दिया की आषाढ़ पूर्णिमा से आश्विनी पूर्णिमा तक सभी बौद्ध भिक्षु एक स्थान पर रहें।

धम्म का करें प्रचार-प्रसार

भंते अस्सजी महाथेरो ने बताया कि वर्षावास में एक स्थान पर रहने की परंपरा है। भिक्षु गांवों में भीक्षाटन हेतु न जाए और एक स्थान पर रह कर धम्म का पठन-पाठन व प्रचार-प्रसार करें, ऐसा बुद्ध ने कहा था। आवश्यकता पड़ने पर भिक्षु अपने गुरु से अधिकतम एक सप्ताह का अवकाश लेकर विहार से बाहर जा सकता है। वर्षावास की यह परंपरा बुद्ध के काल से ही चल रही है।

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