गंगा कछार में खेती करने वाले किसान सरकारी सुविधाओं से वंचित

गंगा कछार में खेती करने वाले किसान सरकारी सुविधाओं से वंचित

मूरतगंज गंगा नदी के पास कछार में दर्जनों गांव के किसान तरबूज खीरा व ककड़ी की खेती क

JagranWed, 03 Mar 2021 11:11 PM (IST)

मूरतगंज : गंगा नदी के पास कछार में दर्जनों गांव के किसान तरबूज, खीरा व ककड़ी की खेती करते हैं। पानी कम होने के बाद भी किसानों ने बोआई शुरू कर दी है। कई ऐसे परिवार जिनके पास भूमि नहीं है। वह किसान कछार क्षेत्र में फसल तैयार कर परिवार का पालन-पोषण करते है।

दोआबा की आबादी इन दिनों लगभग 19 हजार है। यहां के 70 फीसद लोग कृषि कार्य पर निर्भर हैं, जिनके पास भूमि नहीं है। उनमें कुछ लोग बंटाई पर खेती लेकर फसल उगाते हैं। कुछ गंगा के कछारी क्षेत्र में फसल उगाते हैं। जिन गांव के किसान कछार क्षेत्र में फसल व सब्जी की खेती करते हैं। उनमें ग्राम पंचायत संदीपन, ककराबाद, कोखराज, सैलाबी, बरीपुर, सकाढ़ा, पल्हाना, मुजहिदपुर, बदनपुर, पट्टी नरवर, बसेढ़ी, शोभना, मोहनापुर आदि गांव शामिल हैं। किसान रामसुचित, शिवकुमार, मनोहर लाल आदि का कहना है कि उनके पास भूमि नहीं है। सालों से कछार क्षेत्र में तरबूज व सब्जी की खेती करते है, लेकिन कछार क्षेत्र की भूमि उनके नाम नहीं हैं। उनकी वजह कृषि व उद्यान विभाग की ओर से संचालित योजनाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा है। इस संबंध में कई बार अधिकारियों से शिकायत भी की गई, लेकिन अधिकारी सुनने को तैयार नहीं है।

वर्ष में एक बार तरबूज की खेती होती है। जनपद के अलावा दूसरे शहर में भी तरबूज की बिक्री की जाती है। इससे अच्छी आमदनी होती है। उसे से परिवार का खर्च चलता है।

सुरेंद्र कुमार पिछले एक दशक से कछार की भूमि पर खेती कर रहे हैं, लेकिन भूमि को पट्टे पर आवंटित नहीं किया गया है। इसकी वजह से किसानों के हित के लिए संचालित की योजनाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा है।

भंवर सिंह गंगा कछार में तरबूज के अलावा खीरा-ककड़ी की भी खेती करते हैं। कभी-कभी तरबूज का दाम कम होता है, लेकिन खीरा-ककड़ी से अच्छी आमदनी हो जाती है।

अजय प्रताप सिंह तरबूज की खेती को हम अपना पुश्तैनी खेती मानकर करते है। इसके अलावा आमदनी का कोई रास्ता नहीं हैं। पूरे परिवार सहित खेती करते हैं। इसी से परिवार का परिवार को पालन-पोषण होता है।

दीपक

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गंगा कछार क्षेत्र में खेती करने वाले किसानों को भी बीज में अनुदान दिया जाए। इसमें लिए निदेशक व शासन को पत्र भेजकर पिछले वर्ष मांग की गई थी, लेकिन भूमि उनके नाम दर्ज न होने से अनुमति नहीं मिली।

सुरेंद्र राम भाष्कर, जिला उद्यान अधिकारी

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