नारी सशक्तीकरण की सतत सेनानी, डा. रख्माबाई ने बाल विवाह के खिलाफ फूंका था बिगुल

बचपन में शादी हो जाने के कारण रख्माबाई ने बाल विवाह के खिलाफ बिगुल फूंका था व इसका आधार बनाया था शिक्षा को। विवाह के बाद उनका स्कूल जाना बंद कर दिया गया तो वह बेचैन हो उठीं और उन्होंने अपने विवाह को मानने से इंकार कर दिया था।

Sanjay PokhriyalSat, 16 Oct 2021 03:27 PM (IST)
रख्माबाई का मात्र 11 साल की उम्र में विवाह कर दिया गया था।

सुजाता शिवेन। स्वाधीनता के अमृत महोत्सव के अवसर पर उन महिलाओं का स्मरण करना आवश्यक है जिन्होंने अपने संघर्ष के बूते पर देश की महिलाओं के अंदर एक आत्मविश्वास पैदा किया। 1857 के स्वाधीनता संग्राम के बाद देश में कई महिलाओं ने अपने संघर्ष और अपनी जिजीविषा से उस वक्त समाज में व्याप्त रूढ़ियों को चुनौती दी और उनकी उन चुनौतियों ने पूरे देश में महिला अधिकारों के पक्ष में माहौल बनाया।

महाराष्ट्र की धरती पर ऐसी ही महिला रख्माबाई ने जन्म लिया था जिन्होंने बाल विवाह के खिलाफ बिगुल फूंका और उसका आधार बनाया अपनी शिक्षा को। वर्ष 1864 में जन्मी रख्माबाई का मात्र 11 साल की उम्र में विवाह कर दिया गया। विवाह के बाद उनका स्कूल जाना बंद कर दिया गया तो वह बेचैन हो उठीं। रख्माबाई ने अपने इस विवाह को मानने से इन्कार कर दिया और ससुराल जाने से भी मना कर दिया।

रख्माबाई के पति ने वैवाहिक अधिकार हासिल करने के लिए उन पर केस कर दिया, लेकिन रख्माबाई केस होने से घबराई नहीं, बल्कि उन्होंने इस केस को लड़ने का फैसला किया। केस का फैसला भी उनके पक्ष में आया। इस मामले में कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था, कानून के अनुसार, मैं वादी को राहत प्रदान करने के लिए और इस युवा महिला को पति के साथ उसके घर में रहने का आदेश देने के लिए बाध्य नहीं हूं। वादी के पक्ष में यह आदेश भी नहीं दिया जा सकता है कि वह बाल्यावस्था में हुए विवाह को कानूनी जामा पहनाकर अदालत से संबंध बनाने का हक हासिल कर सके, पर उनके पति हार नहीं मान रहे थे, क्योंकि उनकी नजर रख्माबाई को विरासत में मिली संपत्ति पर थी।

वह अपील में चले गए। फिर से सुनवाई हुई और अपीलीय अदालत ने निचली अदालत के फैसले को पलट दिया। कोर्ट ने उनको पति के साथ रहने या छह महीने जेल की सजा काटने का आदेश दिया। यहां रख्माबाई ने जेल जाने का निर्णय लिया। इस बीच उन्होंने अपीलीय अदालत के फैसले के खिलाफ महारानी विक्टोरिया के यहां अपील दायर कर दी।

महारानी विक्टोरिया ने उनकी अपील को स्वीकार कर लिया और थोड़े समय तक विचार करने के बाद रख्माबाई के बाल विवाह को रद कर दिया। रख्माबाई का ये केस बहुत लंबे समय तक चला था। उस दौरान इस बात पर भी बहस हुई थी कि एक महिला अपने पति से शारीरिक संबंध बनाने की सहमति या असहमति दे सकती है या नहीं।

जब रख्माबाई के पति ने कोर्ट में केस किया तो उस वक्त इस केस की खूब चर्चा हुई थी। उस वक्त के समाचार पत्रों में हिंदू मान्यताओं और परंपराओं को आधार बनाकर रख्माबाई के पक्ष और विपक्ष में कई लेख प्रकाशित हुए थे। बाल गंगाधर तिलक ने भी इस बहस में हिस्सा लिया था। नैतिकता और कानून की बारीकियों को लेकर भी बहस हुई थी।

रख्माबाई के चरित्र पर भी तरह-तरह के लांछन लगाए गए, लेकिन वह अपने पथ से डिगी नहीं। रख्माबाई के इस विरोध ने पूरे देश की महिलाओं को जाग्रत करने का काम किया और अपने अधिकारों के लिए सजग भी किया। कई पुस्तकों में इस बात का उल्लेख मिलता है कि वर्ष 1891 में एज आफ कसेंट एक्ट (संबंध की सहमति की उम्र संबंधी कानून) बना और इसके अंतर्गत महिलाओं की सहमति देने की उम्र 10 से 12 वर्ष की गई। इसके पीछे भी रख्माबाई केस में आया फैसला था। उस वक्त की यह एक ऐतिहासिक घटना थी।

स्वाधीनता के अमृत महोत्सव के अवसर पर रख्माबाई को याद किया जाना चाहिए। सामाजिक अपमान और सार्वजनिक निंदा को ङोलकर भी उन्होंने जिस तरह से जीत हासिल की उसने उस वक्त देश की महिलाओं को हिम्मत दी और उनके अंदर कुरीतियों के खिलाफ उठ खड़े होने का जज्बा भरा था। रख्माबाई ने उस समय अपने साहस से देश की महिलाओं के सामने एक आदर्श प्रस्तुत किया कि अगर कोई महिला ठान ले तो तमाम विपरीत परिस्थितियों को भी अनुकूल बनाया जा सकता है और अपना अधिकार हासिल किया जा सकता है।

रख्माबाई को भारत की पहली महिला डाक्टर होने का भी गौरव प्राप्त है। रख्माबाई ने अपने केस के दौरान हिंदू लेडी के नाम से कई लेख लिखे जो समाचार पत्रों में प्रकाशित होकर चर्चित हुए। उन्होंने महिलाओं की शिक्षा पर भी जोर दिया था। उनका मानना था कि अगर महिलाएं शिक्षित होती हैं तो वे अपने अधिकारों को लेकर न केवल सजग होंगी, बल्कि उनको हासिल करने के लिए यत्न भी करेंगी। रख्माबाई ने महिलाओं के अंदर जो स्वाभिमान जगाया वो कालांतर में स्वाधीनता के आंदोलन में एक बड़ी शक्ति बनी।

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