शूरवीरों की धमनियों में राष्ट्रधर्म और हृदय में भारतमाता, करते थे अखंड भारत की सिंहगर्जना

बाघा जतिन की बहादुरी से लेकर भगत सिंह के बम के दर्शन तक खुदीराम बोस के बलिदान से लेकर नेताजी सुभाषचंद्र बोस के ‘तुम मुझे खून दो’ के हुंकार तक के कई महानायकों के तार अखंड भारत की सिंहगर्जना करने वाले संगठन से जुड़ते हैं।

Abhishek AgnihotriSun, 24 Oct 2021 06:45 AM (IST)
आजादी के महानायकों की गाथा बता रहा आलेख।

कानपुर, [मनीष त्रिपाठी]। आततायी अंग्रेजों के रक्त से भारतमाता के मस्तक का तिलक करने वाले शूरवीरों का क्रांति संगठन था अनुशीलन समिति। यह बंगाल की भूमि पर फूटा वह विप्लवी बीज था, जिसकी जड़ें कालांतर में संपूर्ण भारत में फैल गईं। बाघा जतिन की बहादुरी से लेकर भगत सिंह के बम के दर्शन तक, खुदीराम बोस के बलिदान से लेकर नेताजी सुभाषचंद्र बोस के ‘तुम मुझे खून दो’ के हुंकार तक, प्रचंड राष्ट्रवाद के कई महानायकों के तार जुड़ते हैं अखंड भारत की सिंहगर्जना करने वाले इस संगठन से।

‘एक बार बिदाय दे मां, घूरे आसी! हंसी हंसी पोरबो फांसी देखबे भारतबासी!’ -खुदीराम बोस (एक बार मुझे विदा दो मां, मैं जल्दी लौटूंगा! पूरे भारत के लोग मुझे देखेंगे और मैं हंसते-हंसते फांसी पर झूल जाऊंगा!) 11 अगस्त, 1908 को मात्र 18 साल की उम्र में फांसी का फंदा चूमने वाले खुदीराम बोस भारत की स्वाधीनता के लिए अपने प्राणों का बलिदान करने वाले महान क्रांतिनायक थे और थे अनुशीलन समिति के अनुगामी। 15 साल की उम्र में अंग्रेज सरकार के बंग-भंग के निर्णय के विरुद्ध पर्चे बांटने के आरोप में जिस जिला सेशन जज डग्लस किंग्सफोर्ड ने उन्हें पहली बार जेल भेजा था, अनुशीलन समिति के निर्णय के अनुसार उसका वध करने के लिए खुदीराम बोस अपने साथी प्रफुल्ल कुमार चाकी के साथ अप्रैल 1908 में मुजफ्फरपुर, बिहार पहुंचे। 30 अप्रैल की रात उन्होंने किंग्सफोर्ड की बग्घी पर बम फेंका मगर उस बग्घी में किंग्सफोर्ड की जगह बैठे लोकल बैरिस्टर प्रिंगल केनेडी की पत्नी और बेटी मारे गए। 1 मई, 1908 को प्रफुल्ल कुमार एक बंगाली दारोगा की निशानदेही पर गिरफ्तार कर लिए गए। उन्होंने खुद को गोली मार ली मगर उनकी पहचान पुख्ता करने के लिए अंग्रेजों ने नृशंसतापूर्वक उनका सिर काटकर कलकत्ता (अब कोलकाता) भेज दिया। कुछ समय बाद खुदीराम को भी गिरफ्तार कर लिया गया। पुलिस हिरासत में भी वंदे मातरम का जयघोष करने वाले खुदीराम बोस की निडरता का आलम यह था कि उन्होंने फांसी की सजा सुनने के बाद मजिस्ट्रेट की आंखों में आंखें डालकर कहा, ‘अगर वक्त हो तो मैं तुम्हें भी बम बनाने का तरीका सिखा सकता हूं।’ फांसी के बाद उनकी यह कविता बंगाली युवकों के लिए क्रांतिगीत बन गई और अंग्रेज सरकार के लिए नासूर। अनुशीलन समिति अब चिंगारी से जंगल की आग बन चुकी थी।

विवेकानंद के वैचारिक अनुगामी व्यक्ति मर जाते हैं परंतु विचार अमर रहते हैं और जब यह विमर्श का रूप ले लें तो इनकी सामथ्र्य इतिहास की धारा और देश का भविष्य दोनों ही बदल सकते हैं। गुलामी के विरुद्ध स्वाधीनता, दास भाव के विरुद्ध राष्ट्र गौरव तथा ‘बांटों और राज करो’ की नीति के विरुद्ध अखंड भारत का प्रचंड विचार देने वाला ऐसा ही अग्निधर्मा क्रांति संगठन था अनुशीलन समिति। स्वामी विवेकानंद द्वारा किए गए आह्वान, ‘मैं एक ऐसी युवा पीढ़ी को देखना चाहता हूं जिनकी मांसपेशियां लोहे जैसी मजबूत हों और जिनका स्नायुतंत्र इस्पात जैसा हो।’ को अंगीकार करते हुए 24 मार्च, 1902 की तारीख को तत्कालीन उत्तरी कलकत्ता में अनुशीलन समिति का औपचारिक गठन किया गया था। इसके संस्थापक पुलिन बिहारी दास, अध्यक्ष सतीश चंद्र बोस और प्रमुख संगठक बैरिस्टर प्रमथनाथ मित्रा ने होली के दिन स्थापित इस संस्था में व्यायाम और चरित्र निर्माण के लिए गीता को आधार बनाया तथा स्वामी विवेकानंद को प्रेरणा। यह बंगाल की भूमि पर फूटा वह बीज था, जिसकी जड़ें कालांतर में संपूर्ण भारत में फैल गईं और जगह-जगह अंकुरित होने लगे क्रांति के बिरवे।

भारतमाता के स्वातंत्र्य साधक यह वह वक्त था जब कलकत्ता अंग्रेज-शासित भारत की राजधानी थी और इसका मुख्यालय था यहां स्थित राइटर्स बिल्डिंग। पेशावर से लेकर तत्कालीन बर्मा तक फैले ब्रिटिश साम्राज्य पर उसकी राजधानी में ही चोट करने, सशस्त्र विद्रोह द्वारा अंग्रेजी हुकूमत को उखाड़ फेंकने के लिए अनुशीलन समिति से संबद्ध जतिंद्रनाथ बंधोपाध्याय और अरविंद घोष (श्री अरविंद) ने बंगाल में विप्लवी आंदोलन की नींव रखी। बंग-भंग के ब्रिटिश प्रस्ताव ने बंगाल में वह संयोग बनाया कि घर-घर में बलिदानी युवक तैयार होने लगे। यह जानकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं कि ‘बहरे कानों को सुनाने के लिए बम के धमाके की जरूरत होती है’ का दर्शन देने वाले भगत सिंह के सेंट्रल एसेंबली बमकांड (वर्ष 1929) से 27 साल पूर्व अनुशीलन समिति अपने ढाका प्रकोष्ठ में बम और आग्नेयास्त्र बनाने का कारखाना लगा चुकी थी। मानिकतला बमकांड/अलीपुर बमकांड से प्रकाश में आए बारींद्र कुमार घोष और उल्हासकर दत्ता (जिन्हें कालापानी की सजा हुई) से लेकर फांसी पर चढ़ने वाले खुदीराम बोस, कन्हाईलाल दत्ता और सत्येन बोस तक बंगाल में यत्र-तत्र-सर्वत्र अनुशीलन समिति के सदस्य क्रांतियज्ञ में अपनी आहुति दे रहे थे।

वर्ष 1906 में पुणे से कलकत्ता आए लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की प्रेरणा से शिवाजी उत्सव की भांति ही अनुशीलन समिति ने सार्वजनिक दुर्गा पूजा का प्रथम प्रवर्तन किया। दशभुजाओं वाली उस सशस्त्र देवी (भारतमाता) की पूजा के लिए महाराष्ट्र से चितपावन ब्राह्मण आमंत्रित किए जाते थे, वही चितपावन ब्राह्मण जिनके कुल से संबंधित विनायक दामोदर सावरकर राष्ट्रवाद के सर्वाधिक प्रखर प्रवक्ताओं में अग्रगण्य माने जाते हैं। क्रांति का राष्ट्रघोष बना वंदे मातरम ज्ञात भारतीय इतिहास में इस सर्वाधिक प्रचंड क्रांतिकारी संगठन की पटकथा अगर बंगाल में लिखी गई थी तो कैसा आश्चर्य? यह बंगाल ही था जहां वर्ष 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम से भी लगभग 100 साल पहले प्लासी का युद्ध लड़ा गया था। अंग्रेजों के विरुद्ध डंके की चोट पर लड़े गए इस युद्ध में अगर भितरघात न होता तो आततायियों को इस देश में पैर रखने की जमीन और देशवासियों को ‘गद्दार का नाम मीर जाफर’ जैसा मुहावरा न मिला होता। 2 जुलाई, 1757 की तारीख को एक गद्दार सेनापति की धोखाधड़ी की कीमत नवाब सिराजुद्दौला को अपनी जान और ‘बंगमाता’ को अपनी स्वतंत्रता देकर चुकानी पड़ी थी।

वही बंगमाता, जो कालांतर में बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास ‘आनंद मठ’ तथा इसके गीत ‘वंदे मातरम’ द्वारा ‘भारत माता’ के रूप में प्राण प्रतिष्ठित और पूज्य हुईं। अखंड भारत का यह विमर्श बंगाल तक ही सीमित नहीं रहा। भारतमाता की वह भव्य छवि संपूर्ण राष्ट्र को अपने विस्तार और वात्सल्य की छांव में ले रही थी। दरअसल, बंगाल बुद्धिजीवियों का गढ़ तो था ही, शिक्षा का बड़ा केंद्र भी था। उन दिनों देश के कोने-कोने से लोग उच्च शिक्षा के लिए बंगाल आते थे और ऐसा ही संयोग बना जब नागपुर से एक युवा छात्र का डाक्टरी की पढ़ाई के लिए कोलकाता आगमन हुआ। यह थे डा. केशव बलिराम हेडगेवार, जो सहज ही अनुशीलन समिति के संपर्क में आए, इससे प्रभावित हुए और सदस्य बने। वर्ष 1910 से 1916 तक कलकत्ता मेडिकल कालेज के छात्र रहे डा. हेडगेवार पर प्रसिद्ध पुस्तक ‘डा. हेडगेवार चरित’ के लेखक नारायण हरि पालकर ने स्पष्ट किया है, ‘अपनी पढ़ाई के दौरान डा. हेडगेवार का संबंध अनुशीलन समिति के संस्थापक पुलिन बिहारी दास से हुआ।’

लाहौर से लंदन तक सिंहगर्जना अनुशीलन समिति की स्मृति करते हुए जतिंद्रनाथ मुखोपाध्याय (जिनकी वीरता आज भी जनमानस में बाघा अथवा बग्घा जतिन के रूप में जीवंत है) बिजली की चमक की तरह कौंध जाते हैं। उनसे जुड़े आदमखोर बाघ को निहत्थे ही मार डालने के किस्से को आप भले ही किंवदंती मान लें मगर उनके उस शेर को कैसे भुला देंगे जिसकी गरज लाहौर से लंदन तक गूंजती थी। यह थे जतिंद्रनाथ मुखोपाध्याय के परम शिष्य रास बिहारी बोस, जिन्होंने वर्ष 1912 में दिल्ली में लार्ड हार्डिंग पर बम फिंकवा दिया। इसके तत्काल बाद वे वेष बदलकर लाहौर पहुंचे और गदर पार्टी का नेतृत्व संभाला। वे वर्ष 1915 में वर्ष 1857 का इतिहास दोहराना चाहते थे, 21 फरवरी को पेशावर कैंट से लेकर सिंगापुर तक सशस्त्र क्रांति की तैयारी थी मगर भारत के भाग्य के साथ एक बार फिर विश्वासघात हुआ। इस विश्वासघात से विप्लव आंदोलन तितर-बितर हो गया। उनके साथियों में कई को फांसी हुई, कई को कालापानी।

सचिंद्रनाथ सान्याल की सलाह पर सालभर के भीतर रास बिहारी बोस जापान चले गए और वर्ष 1942 में गठित की आजाद हिंद फौज, जिसका नेतृत्व उन्होंने नेताजी सुभाष चंद्र बोस को सौंप दिया। अखंड भारत के स्वप्नदृष्टा बंगाल के पुन: एकीकरण, बीसवीं सदी के दूसरे दशक में गांधी और गांधीवाद के उदय तथा उसी दशक में भारत की कम्युनिस्ट पार्टी के अस्तित्व में आने से बंगाल में अनुशीलन समिति विस्मृत होने लगी। अंग्रेजों ने सोची-समझी रणनीति के तहत जेलों में बंद क्रांतिकारियों तक प्रचुर मात्रा में कम्युनिस्ट साहित्य उपलब्ध करवाया ताकि प्रचंड राष्ट्रवाद की अग्नि को मंद किया जा सके। बंगाल में मिली आंशिक सफलता के बाद अंग्रेजों ने वामपंथ का यह विषैला प्रयोग देशभर की जेलों में प्रारंभ कर दिया मगर अनुशीलन समिति का प्रचंड राष्ट्रवाद और अखंड भारत का स्वप्न अब एक नया रूप ले रहा था। गंगासागर में बीज गल गया था, मगर इसके बिरवे अरब सागर के किनारे फूटने लगे थे।

दशभुजा देवी पुन: जागृत हो रही थीं। कोई था, जिसने सुनिश्चित किया कि अनुशीलन समिति के वैचारिक अमृत से भारतमाता का शाश्वत अभिषेक बाधित न हो! यह थे डा. केशव बलिराम हेडगेवार! विचार को मिला विराट स्वरूप वर्ष 1925 में विजयादशमी के दिन जब डा. हेडगेवार ने नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (जिसका नामकरण 17 अप्रैल, 1926 को हुआ) का बीज डाला, तब उनके मस्तिष्क में अनुशीलन समिति की विचारधारा को विराट स्वरूप देने की भावना थी। ‘संघ-बीज से वृक्ष’ पुस्तक के लेखक देवेंद्र स्वरूप ने लिखा, ‘डा. हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लिए जिस कार्य पद्धति को अपनाया, उसका मूल भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन के भीतर ही खोजना होगा। वैचारिक धरातल पर अनुशीलन समिति का राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा से बहुत अधिक साम्य है। संघ की प्रतिज्ञा की कल्पना भी अनुशीलन समिति से ही ग्रहण की दिखती है।’ अनुशीलन समिति की तत्कालीन व्यवस्था में व्यायाम, पथ संचलन और दंड संचालन का प्राबल्य था।

देश की आजादी और अनुशासनबद्ध युवकों के देशव्यापी संघटन को संकल्पित डा. हेडगेवार ने अनुशीलन समिति की विचारभूमि पर ही नागपुर के अखाड़ों व व्यायामशालाओं को अपनी प्रयोगशाला बनाया। इसी प्रकार व्यायाम, पथ संचलन तथा दंड संचालन संघ की दैनंदिन गतिविधियों में समाहित किए गए। पुष्पित-पल्लवित राष्ट्रीय विचारधारा यह अद्भुत संयोग है कि जिस अनुशीलन समिति की विचारधारा को डा. हेडगेवार ने नई जमीन दी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के रूप में पुष्पित-पल्लवित किया, उसी के प्रतिनिधि त्रैलोक्य नाथ चक्रवर्ती वर्ष 1939 में नागपुर में डा. हेडगेवार से मिलने आए और उन्हें सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में सशस्त्र क्रांति का प्रस्ताव दिया।

दरअसल, विचारधारा के स्तर पर डा. हेडगेवार अनुशीलन समिति के साथ ही लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के प्रखर राष्ट्रवाद के समर्थक थे और सुभाष चंद्र बोस के मन में भी इन दोनों की प्रतिष्ठा गुरु संगठन तथा गुरु के रूप में थी। समान विचारधारा अंतत: सार्थक विमर्श का रूप लेती ही है। ‘राष्ट्र की नवचेतना: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ पुस्तक के मुताबिक, वर्ष 1928 में कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन में डा. हेडगेवार और सुभाष चंद्र बोस की मुलाकात में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के निर्माण का उद्देश्य समझने के बाद नेताजी ने कहा था, ‘केवल ऐसे बुनियादी कार्य के द्वारा ही राष्ट्र का पुनर्रुद्धार संभव है। इसके बारे में अब मुझे पूरा विश्वास हो गया है।’

विभाजन पर लग सकता था विराम

20 जून, 1940 को सुभाष चंद्र बोस अपने गुरु संगठन के साथी डा. हेडगेवार की मदद मांगने नागपुर आए थे, परंतु डा. हेडगेवार मृत्युशय्या पर थे। दोनों की भेंट संभव न हो सकी और अगले ही दिन 21 जून, 1940 को डा. हेडगेवार का देहांत हो गया। तनिक कल्पना करें, यदि काल की यह कराल छाया न पड़ी होती तो भारत की स्वाधीनता के लिए सशस्त्र क्रांति में एक तरफ आजाद हिंद फौज विदेश से बिगुल फूंक रही होती तो वहीं भारतभूमि पर उसके स्वागत के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने स्वभाव के अनुसार ही हर पथ को निष्कंटक करने में कोई कोर-कसर न छोड़ी होती। ऐसा हुआ होता तो विभाजन का दु:स्वप्न अखंड भारत की संकल्पना को न तोड़ता और राष्ट्रवाद की गौरवगाथा पर वामपंथ पोषित पंगु समाजवाद का ग्रहण न लगता!

बंगभूमि के क्रांतितंत्र से हिल गई ब्रिटिश हळ्कूमत नवंबर 1902 में स्थापित अनुशीलन समिति के पूर्व और पश्चिम बंगाल में दो प्रमुख प्रकोष्ठ थे। पहला, ढाका अनुशीलन समिति (ढाका, आधुनिक बांग्लादेश में केंद्रित) और दूसरा, कलकत्ता समिति। सशस्त्र क्रांति के लिए जर्मनी से अस्त्र-शस्त्र से भरा जहाज मंगवाने वाले बाघा जतिन ने कलकत्ता में केंद्रीय संगठन और बंगाल, बिहार, उड़ीसा तथा उत्तर प्रदेश में इसकी शाखाओं के बीच संबंधों को सशक्त किया। वर्ष 1911 तक रास बिहारी बोस (भारत में सबसे खतरनाक क्रांतिकारी के रूप में वर्णित) ने अनुशीलन समिति की पैठ उत्तर भारत में बहुत मजबूत कर दी।

पुलिस के दमन, गिरफ्तारी और क्रांतिकारियों की नृशंस हत्याओं ने वर्ष 1916 के आस-पास अनुशीलन समिति पर काफी असर डाला मगर इसके द्वारा प्रतिपादित विप्लव का विचार पूरे भारत में व्याप्त हो गया। वर्ष 1923 में सचिंद्रनाथ सान्याल ने पूरी ताकत बटोरकर हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन की स्थापना की, जिसके प्रमुख सदस्य सरदार भगत सिंह, सुखदेव, शिवराम राजगळ्रु, चंद्रशेखर आजाद, अशफाकउल्ला खां, जतिंद्र नाथ दास ने ब्रिटिश हुकूमत की चूलें हिला दी। वहीं जापान जाकर बस गए रास बिहारी बोस ने अंतिम अभियान के रूप में आजाद हिंद फौज की स्थापना की और देश को महानायक के रूप में मिले नेताजी सुभाष चंद्र बोस!

सशस्त्र विद्रोह का दैदीप्य सूर्य

वर्ष 1930 में सूर्य सेन के नेतृत्व में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ चटगांव शस्त्रागार कांड ने अंग्रेजों को हिलाकर रख दिया था। आश्चर्य नहीं कि वीरता के प्रतीक सूर्य सेन ‘मास्टर दा’ की जड़ें भी अनुशीलन समिति से जुड़ी हुई थीं। जब वह इंटरमीडिएट के विद्यार्थी थे, तभी अपने राष्ट्रप्रेमी शिक्षक की प्रेरणा से अनुशीलन समिति के सदस्य बन गए थे। चटगांव से अंग्रेजी हुकूमत साफ करने के उद्देश्य से सूर्य सेन ने इंडियन रिपब्लिकन आर्मी तैयार की। वह सूर्य सेन ही थे, जिन्होंने पूरे देश की आजादी से पहले बंगाल के चटगांव प्रांत को अंग्रेजों के चंगुल से मुक्त करा लिया और भारत के ध्वज को फहराया था। 12 जनवरी, 1934 को उन्हें फांसी दे दी गई।

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