आजादी से पहले स्थापित हुआ था एनएसआइ, दीक्षा समारोह मनाने की कर रहा तैयारी

आजादी से पूर्व बना राष्ट्रीय शर्करा संस्थान 85 वर्षों का गौरवशाली इतिहास समेटे है और यहां के पूर्व छात्रों के बनाए फार्मूलों पर आज भी मिलों में चीनी का उत्पादन हो रहा है। संस्थान 16 नवंबर को दीक्षा समारोह की तैयारी कर रहा है।

Abhishek AgnihotriMon, 15 Nov 2021 07:50 AM (IST)
एनएसआइ का 85 वर्षों का गौरवशाली इतिहास है।

कानपुर, जागरण संवाददाता। राष्ट्रीय शर्करा संस्थान (एनएसआइ) का 50वां दीक्षा समारोह मंगलवार को आयोजित होगा। भारत सरकार के वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल बतौर मुख्य अतिथि और केंद्रीय राज्यमंत्री साध्वी निरंजन ज्योति बतौर विशिष्ट अतिथि शामिल होंगी। इस दिन 450 छात्र-छात्राओं को डिप्लोमा व प्रमाणपत्र प्रदान किए जाएंगे। लेकिन बहुत कम लोगों को यह मालूम होगा कि संस्थान ने अपने 85 वर्षों में ऐसी प्रतिभाएं दीं, जो देश ही नहीं विदेशों में भी नाम रोशन कर रहे हैं। आज भी संस्थान के पूर्व छात्रों के फार्मूलों पर चीनी मिलों में उत्पादन का आंकलन होता है। कई छात्र तो कंपनियों के मालिक व डायरेक्टर बनकर रोजगार के अवसर भी मुहैया करा रहे हैं।

एनएसआइ के निदेशक डा. नरेंद्र मोहन ने बताया कि संस्थान की स्थापना वर्ष 1936 में अंग्रेजी हुकूमत के दौरान हुई थी। तब इस संस्थान का नाम इंपीरियल इंस्टीट््यूट आफ शुगर था। आजादी के बाद वर्ष 1957 में इसका नाम राष्ट्रीय शर्करा संस्थान रखा गया। उस दौरान एचबीटीआइ कैंपस में संस्थान का संचालन होता था। वर्ष 1963 में संस्थान के लिए कल्याणपुर स्टेशन के सामने जीटी रोड किनारे अलग से भूमि उपलब्ध कराई गई और नया कैंपस बनाया गया था। 85 वर्षों के गौरवशाली इतिहास के दौरान संस्थान में तमाम शोध हुए और गन्ना व चीनी उत्पादन के क्षेत्र में अग्रणी कार्य हुए।

जब संस्थान बना तो उस समय कानपुर व आसपास क्षेत्रों में भी गन्ने की व्यापक पैदावार होती थी। घाटमपुर में तो चीनी मिल भी थी। साथ ही खांडसारी व गुड़ की इकाइयां होती थीं, लेकिन बाद में ये सभी बंद हो गईं। संस्थान देश भर में गन्ने के उत्पादन, चीनी मिलों और खांडसारी व गुड़ इकाइयों में नवीन तकनीकी विकसित करने की दिशा में काम कर रहा है। संस्थान से जुड़ी देशभर में 500 से ज्यादा चीनी मिलें और 300 से ज्यादा डिस्टलरी कार्यरत हैं।

मिल की क्षमता आंकने के लिए बना मित्तल फार्मूला

संस्थान के पूर्व छात्र बीएल मित्तल ने शुगर टेक्नोलाजी में वर्षों पूर्व मित्तल फार्मूला बनाया था। इस फार्मूले की मदद से चीनी मिल की एफिशिएंसी को मापा जा सकता है। मित्तल फार्मूले से आज भी चीनी मिलों में उसकी क्षमता का आंकलन किया जाता है। इसी तरह संस्थान के पूर्व छात्र डा. गुंडू राव ने भी गन्ने की पेराई और चीनी उत्पादन के बीच फार्मूला बनाया था।

यह फार्मूला भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध है। डा. गुंडू राव वर्ष 1956 से वर्ष 1963 तक संस्थान के निदेशक भी रहे थे। यही नहीं, मुंबई स्थित श्री जी हैवी इंजीनियङ्क्षरग कंपनी के निदेशक जीडी अग्रवाल भी संस्थान के ही पूर्व छात्र हैं। आज वह तमाम देशों में मशीनरी की सप्लाई करते हैं। इसके अलावा पुणे के रहने वाले इंडियाना शुक्रोटेक के निदेशक प्रमोद बेलसारे भी संस्थान के पूर्व छात्र हैं। उन्होंने भी प्लांट एंड मशीनरी के क्षेत्र में देश का नाम रोशन किया।

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