कोरोना से जंग संग प्रदूषण में भी काम आ रहा ये हथियार, श्वास रोगियों के लिए बना वरदान

कोरोना वायरस से बचाव के लिए मास्क अब आदत में शुमार हो गया जिसका असर है कि फेफड़ों की स्थिति बेहतर हुई है। दीपावली के बाद और सर्दियों के मौसम में प्रदूषण बढ़ा लेकिन इस बार सांस के मरीज उतने नहीं बढ़े हैं।

Abhishek AgnihotriWed, 24 Nov 2021 09:46 AM (IST)
आदत में शुमार हुए मास्क से बेहतर हुए फेफड़े।

कानपुर, जागरण संवाददाता। कोरोना वायरस का संक्रमण फैलने के बाद मास्क की अनिवार्यता ने फेफड़ों को संजीवनी प्रदान की है। मास्क के हथियार से कोरोना महामारी को मात देने में कामयाब हुए हैं। वहीं, सर्दियों में बढऩे वाले प्रदूषण के स्तर से होने वाली सांस की बीमारियां को पछाडऩे में सफल रहे हैं। दीपावली के साथ बढऩे वाला प्रदूषण ठंड में सांस के रोगियों को हर साल बेहाल करता था, जिससे 20 फीसद तक सांस के मरीज बढ़ जाते थे। इस बार ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। जीएसवीएम मेडिकल कालेज के रेस्पिरेट्री मेडिसिन विभाग की ओपीडी भी सामान्य दिनों की तरह की चल रही हैं।

एलएलआर (हैलट) के मुरारी लाल चेस्ट अस्पताल में फेफड़े एवं सांस से जुड़ी गंभीर बीमारियों का इलाज होता है। यहां शहर ही नहीं आसपास के 10-12 जिलों से सांस एवं फेफड़े से जुड़ी बीमारियों के मरीज इलाज के लिए आते हैं। अस्पताल में ओपीडी, इमरजेंसी एवं इनडोर की सुविधा है। रेस्पिरेट्री मेडिसिन विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डा. अवधेश कुमार का कहना है कि जनवरी 2020 से कोरोना महामारी कहर बरपा रही है। कोरोना वायरस के संक्रमण से बचाव के लिए मास्क जरूरी था, जो धीरे-धीरे आदत में शुमार हो गया। मास्क लगाने का असर है कि फेफड़ों की स्थिति पहले से बेहतर हुई है। दीपावली के बाद और सर्दियों के मौसम में प्रदूषण बढऩे से सांस की बीमारियों से पीडि़तों की परेशानी बढ़ जाती थी। इस बार मरीज बढ़े नहीं हैं, बल्कि कमी आई है। प्रदूषण की वजह से सांस संबंधी समस्याएं लेकर मरीज भी नहीं आ रहे हैं।

बारिश से साफ हुआ मौसम : विशेषज्ञों का मनाना है कि दीपावली के बाद प्रदूषण बढ़ा था, जिससे धुंध भी बढ़ गई थी। इस बीच, दो दिन हल्की बारिश से पार्टिकुलेट मैटर (पीएम) और धूलकण नीचे बैठ गए। मौसम साफ होने से धूप भी अच्छी खिल रही है।

कारगर प्लानिंग बनानी जरूरी : प्रो. सुधीर चौधरी का कहना है कि प्रदूषण नियंत्रण के लिए कारगर प्लाङ्क्षनग बनानी जरूरी है। हर साल प्रदूषण बढ़ता है। गोष्ठी एवं विचार मंथन होता है। धरातल पर कुछ नहीं होता है। वायुमंडल इंजीनियर, टाउन प्लानर कोई ठोस काम नहीं करते हैं। इसके लिए नगर आयुक्त को चाहिए की प्रदूषण से निपटने के लिए कोई कार्ययोजना बनाएं, ताकि हर साल होने वाली परेशानी से निजात मिल सके।

-एक-दो दिन प्रदूषण का स्तर बढऩे से क्रानिक आब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (सीओपीडी) नहीं होती है। वर्षों प्रदूषण के क्षेत्र में रहने, हैवी पार्टिकुलेट मैटर एवं हानिकारक गैसों के बीच रहने से फेफड़े खराब होते हैं, जिससे धीरे-धीरे सीओपीडी की बीमारी होने लगती है। रही बात फेफड़े काले पडऩे की तो सिर्फ बच्चों के फेफड़े गुलाबी होते हैं। बच्चों को छोड़कर प्रत्येक व्यक्ति के फेफड़े काले होते हैं। प्रदूषण व ठंड बढऩे पर सिर्फ अस्थमा का अटैक पड़ता है, सीओपीडी के मरीजों को कोई दिक्कत नहीं होती है। फिर भी सीओपीडी के मरीजों को एहतियात बरतना जरूरी है। -प्रो. सुधीर चौधरी, पूर्व वरिष्ठ प्रोफेसर, रेस्पिरेट्री मेडिसिन विभाग, जीएसवीएम मेडिकल कालेज।

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