इटावा में कालिकादेवी मंदिर और सैयद बाबा की मजार में दिखती हिंदू-मुस्लिम समरसता, जानिए पूजा-इबादत पूरी कहानी

मंदिर का सेवक हमेशा से दलित को बनाए जाने की व्यवस्था की गई

पुजारी विनोद कुमार बताते हैं कि उनकी पांचवीं पीढ़ी मंदिर की सेवा कर रही है। मंदिर के मुख्य प्रबंधक रवि शंकर शुक्ला ने बताया कि दलित समाज को सम्मान देने के लिए मंदिर का सेवक हमेशा से दलित को बनाए जाने की व्यवस्था की गई है।

Akash DwivediSat, 17 Apr 2021 09:27 PM (IST)

इटावा (मनोज तिवारी)। पूजा और इबादत का अद्भुत संगम देखना हो लखना के कालिकादेवी मंदिर और सैयदबाबा की मजार चले आइए। एक ही परिसर में हिंदू-मुस्लिम (हम) अपने रीति-रिवाज के मुताबिक ईश्वर और खुदा के सामने मन्नत और दुआ मांगते हैैं। यहां दलित पुजारी की परंपरा समरसता की धारा को और अविरल कर रही है। मान्यता तो ये भी है कि मां कालिका देवी अपने भक्त की पुकार तभी सुनती हैं, जब सैयद बाबा की मजार की भी इबादत की जाए, वहीं सैयद बाबा की मजार पर जाए बिना किसी भक्त की मन्नत पूरी नहीं होती है। देवी को प्रसाद चढ़ता है। वहीं, मजार पर चादर, कौडिय़ां एवं बताशा चढ़ाया जाता है। यहां सिर्फ उत्तर प्रदेश ही नहीं बल्कि आसपास के कई राज्यों के लोग दर्शन और मत्था टेकने आते हैैं। दलित वर्ग से आने वाले पुजारी विनोद कुमार बताते हैं कि उनकी पांचवीं पीढ़ी मंदिर की सेवा कर रही है। मंदिर के मुख्य प्रबंधक रवि शंकर शुक्ला ने बताया कि दलित समाज को सम्मान देने के लिए मंदिर का सेवक हमेशा से दलित को बनाए जाने की व्यवस्था की गई है।

राजा पर बरसा था मां का वात्सल्य : कालिका मैया के प्रादुर्भाव की कहानी लखना इस्टेट के राजा जसवंत राव से जुड़ी है। वह बीहड़ में यमुना नदी पार कंधेसी घार में स्थापित आदिशक्ति कालिका के उपासक थे। वह रोज देवी पूजन के लिए गांव जाते थे। एक दिन वह देवी पूजन के लिए जा रहे थे, लेकिन यमुना नदी में तेज प्रवाह के कारण नदी को पार करके देवी दर्शन को नहीं पहुंच सके। इससे वह काफी व्यथित हुए।

अन्न जल का परित्याग करके मां के दर्शन की विरह वेदना में जलने लगे। तब कालिका का वात्सल्य अपने भक्त के प्रति फूट पड़ा। रात में जसवंत राव को स्वप्न में दर्शन देकर कहा कि तुम निराश न हो मैं स्वयं तुम्हारे राज प्रसाद में विराजमान होऊंगी। मुझे लखना वाली कालिका मैया के नाम से जाना जाएगा। राजा देवी के इस स्वप्न के साकार होने का इंतजार करने लगे। उनके कारिंदों ने राज प्रसाद स्थित बेरी शाह के बाग में देवी के प्रकट होने की जानकारी दी। जसवंत राव वहां पहुंचे तो देखा पीपल का वृक्ष जल रहा था और चहुंओर घंटा बालियों की ध्वनि गूंज रही थी। जब आग की ज्वाला शांत हुई तो उसमें स्वयं मां शक्ति की नौ प्रतिमाएं प्रकट हुईं। राजा ने वैदिक मंत्रों के साथ देवी प्रतिमाओं की स्थापना कराई और राजस्थानी शैली में भव्य कलात्मक मंदिर का निर्माण कराया। बताते हैं कि राजा ने मंदिर के ठीक बगल में एक मजार की भी स्थापना कराई थी।  

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