बेबस और लाचार सिस्टम को आईना दिखा रहे कानपुर के ये मददगार, जिंदगी बचाने का है जुनून

मददगार संभाल रहे टूटती उम्मीदें और उखड़ती सांसे।

कानपुर में कोरोना संक्रमित मरीजों की मदद के लिए कोई टीम बनाकर तो कोई परिवार के साथ जिंदगी बचाने के लिए निकल पड़ा है । जरूरतमंदों को ऑक्सीजन सिलिंडर और सुविधाएं मुहैया कराकर मदद कर रहे हैं ।

Abhishek AgnihotriThu, 06 May 2021 09:55 AM (IST)

कानपुर, जेएनएन। 'जिंदों की बस्ती में आज मातम का शोर है, ऐ मेरे शहर तुझे ये क्या हो गया... एक शायर की यह पंक्तियां शहर के मौजूदा हालात पर सटीक बैठती हैं। अपनों की ङ्क्षजदगी बचाने के लिए लोग खुद ही जद्दोजहद कर रहे हैं क्योंकि सिस्टम बेबस और लाचार ही नहीं महामारी के सामने घुटने टेकता दिख रहा है। ऐसे में इस बेबस सिस्टम को शहर के कई मददगार आईना दिखा रहे हैं। किसी ने टीम बनाकर तो कोई अपनों के साथ मिलकर मदद का सिलसिला आगे बढ़ा रहा है। सब तो नहीं पर कुछ की टूटती उम्मीदें और उखड़ती सांसों को ये मददगार किस तरह संभाल रहे हैं, इसे बयां करती ये रिपोर्ट...।

200 तक पहुंच गया 10 लोगों से शुरू हुआ कारवां

'मैं अकेला ही चला था जानिबे मंजिल मगर लोग साथ आते गए और कारवां बनता गयाÓ मशहूर शायर मजरूह सुल्तानपुरी की यह पंक्तियां अमित नागरथ पर सटीक बैठती हैं। कोविड संक्रमण की महामारी से परेशान लोगों की मदद के लिए उन्होंने दस लोगों का वाट्सएप ग्रुप बनाया था, जिसमें अब 200 से ज्यादा वालेंटियर्स (मददगार) जुड़ चुके हैं। मदद का सिलसिला अब दूसरे शहरों तक भी पहुंच चुका है। कोविड संक्रमण से परेशान लोगों की मदद के लिए 20 अप्रैल को उन्होंने हितेश जायसवाल, चैतन्य गुप्ता, रीता ङ्क्षसह, यश अग्रवाल, राजीव गुप्ता, चांदनी निगम, राजीव कपूर, दीप गर्ग, अनूप द्विवेदी को जोड़कर एक वाट्सएप ग्रुप बनाया। इसमें उन्होंने वेरीफिकेशन, डेटा कलेक्शन और रिस्पांस टीम बनाई। वाट्सएप ग्रुप पर किसी भी जरूरतमंद का संदेश आने पर वेरीफिकेशन टीम के सदस्य पूरी जांच पड़ताल करते हैं। इसके बाद डेटा टीम एक्सल सीट में उनका पूरा रिकार्ड दर्ज करती है। यहां से रिस्पांस टीम का काम शुरू होता है हर जरूरतमंद तक मदद पहुंचाने का। मदद के इस क्रम में अमित खुद कोविड संक्रमित हो गए और अस्पताल में भर्ती हैं।

अब तक की गई मदद : अबतक 23 मरीजों को बेड दिलवाए, 900 जरूरतमंदों को ऑक्सीजन की मदद दी, 21 मरीजों को प्लाज्मा दिलवाया, 40 लोगों के नमूने घर से लेकर जांच करवायी और 25 लोगों को फ्लोमीटर दिलवाए हैं।

डॉक्टर्स ऑन कॉल : मौजूदा समय में जहां डॉक्टर्स भी नहीं मिल रहे हैं, अमित और उनकी कोर टीम ने डॉक्टर्स ऑन कॉल सेवा शुरू की। मोबाइल नंबर 7439979984 पर किसी भी मरीज को लक्षण के आधार पर दवाएं और अन्य जानकारी मुहैया कराने के लिए डॉक्टर मौजूद रहते हैं।

प्लाज्मा दानदाताओं का ग्रुप : अमित ने प्लाज्मा दानदाताओं का एक अलग ग्रुप बनाया, जिसमें 41 दानदाता सदस्य हैं जो 21 लोगों को प्लाज्मा दान कर उनकी ङ्क्षजदगी बचा चुके हैं। टीम के वालेंटियर्स जरूरतमंदों को खाना भी पहुंचाते हैं।

संबंध खंगाले और जुडऩे लगी मदद की चेन

मदद का जुनून हो तो रास्ते बन ही जाते हैं। शहर के तीन भाइयों का यह जुनून भी लोगों की सांसें बचा रहा है। कोरोना संक्रमण के दौरान परेशान लोगों के लिए उन्होंने अपने व्यापारिक संबंधों का फायदा उठाया और अब ऑक्सीजन के लिए छटपटाते लोगों की मदद कर रहे हैं। मदद के दौरान एक भाई कोविड संक्रमित भी हो गए। वह आइसोलेशन में हैं। हालांकि अन्य दोनों भाई मदद के इस सिलसिले को आगे बढ़ा रहे हैं।

व्यापारी मित्रों की मदद से जुटाए पचास सिलिंडर : छावनी निवासी अमित दुबे के पिता अरुण दुबे ने वर्ष 1996 में सुमेरपुर में ऑक्सीजन फैक्ट्री लगाई थी, जिसे 2005 में बंद कर दिया। इसके बाद अमित ने वर्ष 2007 में पनकी के साइट नंबर दो में ऑक्सीजन उत्पादन की नई फैक्ट्री लगाई। बड़े-बड़े लिक्विड गैस प्लांट लगने से ऑक्सीजन के व्यापार में घाटा होने लगा तो उन्होंने वर्ष 2016 में फैक्ट्री को बंद कर मशीनें बेच दीं। अब जब कोविड संक्रमण से परेशान लोगों को ऑक्सीजन की जरूरत हो रही है। इसके बिना लोगों की सांसें थमने लगीं तो अमित ने अपने पूर्व व्यापारिक मित्रों को फोन किया। उनकी मदद से 50 ऑक्सीजन सिलिंडर जुटाए। अपने भाई अभिलाष और आयुष के साथ मिलकर लोगों की मदद करना शुरू कर दिया।

आयुष खुद हो गए संक्रमित : ऑक्सीजन भरवाने और उन्हें संक्रमितों तक पहुंचाने के इस काम में आयुष संक्रमित हो गए। बावजूद इसके अमित व अभिलाष ने मदद का सिलसिला बंद नहीं किया। अमित बताते हैं कि ऑक्सीजन का व्यापार लंबे समय तक करने से कई परिचित हैं। उनकी मदद से ऑक्सीजन सिलिंडर मिल गए और अब उन्हीं लोगों की मदद से खाली सिलिंडर भरवाते भी हैं। अब तक 120 से ज्यादा लोगों की मदद वह कर चुके हैं। इसके लिए अमित अपने उन दोस्तों का भी शुक्रिया अदा करते हैं जो इस काम में उनकी मदद कर रहे हैं।

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