ई-सिगरेट और ई-हुक्का के सेवन से हो सकता है पापकार्न लंग्स का खतरा, जानिए इसके घातक परिणाम

सिगरेट छुड़ाने के नाम पर मार्केट में आई ई-सिगरेट का युवा वर्ग में दुष्प्रभाव पर जीएसवीएम के रेस्पेरेटरी विभाग के पूर्व प्रोफेसर ने अध्ययन किया है।अध्ययन के आधार पर इंडियन चेस्ट सोसाइटी ने केंद्र सरकार से इसे प्रतिबंध करने की सिफारिश की है।

Abhishek AgnihotriFri, 26 Nov 2021 10:11 AM (IST)
एक शोध में यह निकल कर सामने आया है। प्रतीकात्मक फोटो।

कानपुर, ऋषि दीक्षित। सिगरेट की लत छुड़ाने के नाम पर बाजार में लाई गई ई-सिगरेट और ई-हुक्का से युवाओं और महिलाओं की सेहत को कितना खतरा है, जीएसवीएम मेडिकल कालेज के रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग के पूर्व प्रोफेसर ने अध्ययन कर इसका पता लगाया। ई-सिगरेट व ई-हुक्का में जानलेवा केमिकल उपयोग होता है जो पापकार्न लंग्स (दुष्प्रभाव से लंग्स भुट्टे की तरह हो जाता है) एवं लंग्स कैंसर का कारण बनता है। रिसर्च के आधार पर इंडियन चेस्ट सोसाइटी ने ई-सिगरेट एवं ई-हुक्का पर बैन की सिफारिश की थी। केंद्र सरकार की पहल पर राज्य सरकारों ने प्रतिबंध भी लगा दिया, इसके बावजूद चोरी छिपे बिक्री और सेवन हो रहा है।

देश भर में ई-सिगरेट और ई-हुक्का के बढ़ते प्रचलन के बाद उसके दुष्प्रभाव के मामले चेस्ट विशेषज्ञों के पास पहुंचने लगे। इस मसले को इंडियन चेस्ट सोसाइटी के मंच पर उठाया गया। मेडिकल कालेज के पूर्व प्रोफेसर डा. सुधीर चौधरी, जो इंडियन चेस्ट सोसाइटी के पूर्व अध्यक्ष भी रहे हैं, उन्होंने अध्ययन किया। प्रो. चौधरी ने देश भर के विशेषज्ञों से मरीजों के आंकड़े जुटाए। उनका कहना है कि सिगरेट की लत छुड़ाने के लिए ई-सिगरेट बाजार में आई थी। निर्माताओं का दावा था कि यह हानिकारक नहीं है। उनका कहना है कि इसमें इस्तेमाल किया गया केमिकल सिगरेट की तरह नुकसानदेह हैं। महानगरों में हुक्का बार का भी चलन है, जिसमें फ्लेवर्ड ई-लिक्विड होता है जबकि ई-सिगरेट में केमिकल भाप के रूप में होता है। दोनों में डाई एसिटाइल केमिकल (जो बटर जैसा होता है और पापकार्न में भी मिलाते हैं, अब प्रतिबंधित) होता है। इसके अधिक सेवन से फेफड़े में पापकार्न जैसा उभार आ जाता है, जिसे पापकान लंग्स कहते हैं। इस स्थिति को ब्रांक्योलाइटिस आब्लिट्रेंन कहते हैं। इसमें फेफड़ों की छोटी-छोटी श्वांस नलिकाएं सिकुड़ जाती हैं, जो इंटरस्टीशियल लंग्स डिजीज (आइएलडी) में बदल जाती हैं।

ऐसे आई ई-सिगरेट: वर्ष 2003 में चीन में ई-सिगरेट का आविष्कार हुआ, जो बैटरी से चलने वाला निकोटिन डिलीवरी यंत्र है। इसमें द्रव्य पदार्थ, जिसे वेपर कहते हैं, को क्वाइल के जरिए गर्म करने के बाद मुंह से खींचा जाता है। इसे यह सोच कर बनाया गया था कि बिना टार यानी कार्बन के फेफड़े तक कम मात्रा में निकोटिन जाएगा। हालांकि व्यावसायिक फायदे के लिए ऐसे तरीके अपनाए गए, जिससे अधिक मात्रा में निकोटिन फेफड़े में जाने लगा।

सिगरेट के खतरे

7000 से अधिक केमिकल पाए जाते हैं। 70 केमिकल से कैंसर, सीओपीडी, हृदय रोग एवं लकवा का खतरा। 02 विकल्प बाजार में आए, निकोटिन च्यूइंगम एवं ई-सिगरेट। 01 फीसद सिगरेट पीने वालों की ही छूटी लद। 70 फीसद तक बढ़ गया दुरुपयोग।

खतरनाक केमिकल: कार्बन मोनोआक्साइड, कैडमियम (बैटरी में पाया जाता), आर्सेनिक, अमोनिया, रे-डान (खतरनाक न्यूक्लियर गैस), मिथेन, टार (चारकोल), निकोटिन, एसिटोन, फार्मलडिहाइड।

ई-सिगरेट की क्वाइल में हानिकारक मेटल: ई-सिगरेट के वेपर को गर्म करने के लिए क्वाइल का इस्तेमाल की जाती है। इस क्वाइल में निकोटिन, फार्मालडिहाइड, फेनाले, टिन, निकिल, कापर, लेड, क्रोमियम, आर्सेनिक एवं डाई एसेटाइल मेटल हैं।  

ई-सिगरेट का नुकसान

शुक्राणुओं में कमी गर्भपात का खतरा गर्भस्थ शिशु को नुकसान रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होना

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