आंदोलन का रुख हो सही.., छद्म नाम के लेख से दिया था एक संदेश, जानिए- कौन था वो क्रांतिकारी

क्रांतिकारियों की कलम इतना ही कहूंगा कि वह नौजवान जो दुनिया में कुछ काम करना चाहते हैं या जो लोग भगवान के हर बंदे की सेवा करने के लिए अपनी कीमती जिंदगियां वक्फ करना चाहते हैं वे सच्ची उन्नति के लिए आंदोलन करें।

Abhishek AgnihotriSun, 28 Nov 2021 11:43 AM (IST)
किरती में प्रकाशित हुआ था गदर पार्टी के संस्थापक सचिव का लेख।

सितंबर 1928 के ‘किरती’ में ‘एक निर्वासित’ एम.ए. के छद्म नाम से एक क्रांतिकारी लेख प्रकाशित हुआ था। वास्तव में इसे गदर पार्टी के संस्थापक सचिव लाला हरदयाल ने लिखा था...

दुनिया-भर में दर्शनशास्त्रों तथा भ्रातृत्व के उपदेश की सारी उलझनों और मुसीबतों के होते हुए भी एक बात बिल्कुल स्पष्ट रूप से सामने है। वह यह कि दुनिया इस समय अनेक वर्गों में बंटी हुई है। जो मनुष्य इस सच्चाई को नजरअंदाज करता है या जो ईश्वर के बंदों की सच्ची सेवा करना चाहता है वह उस ज्योतिषी के समान है जो कि कोशिश के सिद्धांत तथा सितारों की गर्दिश से अनजान है। खाली, बेवकूफ और निकम्मा है।

इस समय दुनिया में अलग-अलग पार्टियां मौजूद हैं, लेकिन सरसरी निगाह से देखने पर हम दो प्रकार के वर्गों को तो स्पष्ट तौर पर देखते हैं। दुनियाभर में इस वर्ग विभाजन को जताने के लिए तमाम भाषा-बोलियों में अपने-अपने शब्द मौजूद हैं। इनमें एक तो वह जो शारीरिक श्रम करके कुछ अर्जित करता है, जिन्हें मेहनतकश वर्ग में शामिल किया गया है और दूसरा, वह जो मेहनत नहीं करता, यानी खुशहाल वर्ग जो, मेहनत का उपभोग करता है। प्रत्येक मेहनतकश व्यक्ति की यह इच्छा रहती है कि उसका पुत्र उन्नति करे और खुशहाल वर्ग में शामिल हो जाए। जो लोग अनाज, मेवे, सब्जी पैदा नहीं करते, बल्कि इन चीजों का इस्तेमाल करते और खाते हैं, वास्तव में वही बेचारे किसान की मेहनत का लाभ उठाते हैं। लेकिन, जब हम देखते हैं कि खेती करने वाले उस मेहनतकश किसान को इन मुफ्तखोर लोगों की तरह अच्छी खुराक तक नहीं मिलती, तो दिल में ख्याल आता है कि इस व्यवस्था में जरूर कहीं न कहीं धोखा है। यह मसला ‘सर्व दर्शन संग्रह’ आदि शास्त्रों की 16 प्रकार की फिलासफी पढ़ने से हल नहीं हो सकता।

मनुष्य के विचार आमतौर पर उसके तजुर्बे पर निर्भर हुआ करते हैं और अमीर लोगों को गरीबों की हालत का कुछ भी तजुर्बा नहीं। इनका दायरा अपने ही तक सीमित सरगर्मियों में बहुत तंग होता है। मैं यह लेख केवल इसलिए लिख रहा हूं कि किसान और मजदूर ही हमारे प्यार के हकदार हैं। अंग्रेजी अदब से परिचित लोग कार्लाइल के प्रसिद्ध उसूल को कई बार पढ़ चुके होंगे कि ‘मैं केवल दो ही आदमियों की इज्जत और उनसे मुहब्बत करता हूं, किसी तीसरे की नहीं।’ इसमें मैं एक कदम और आगे बढ़ता हूं और कहता हूं कि मैं केवल एक आदमी को ही प्यार और इज्जत की निगाह से देखता हूं, किसी दूसरे को नहीं और वह है गरीब मजदूर (किरती), जो दुनिया की दौलत पैदा करता है।

पिछले 30 साल से जो (आंदोलनात्मक) लहरें हिंदुस्तान में उठ रही हैं, उनको निम्नलिखित तीन हिस्सों में बांटा जा सकता है- 1. राजनैतिक, 2. शैक्षिक, 3. धार्मिक। असल मेंं ऐसी (आंदोलनकारी) लहरें तो मध्यम दर्जे के लोगों के दिमाग से ही निकल सकती थीं, क्योंकि वह अपने बच्चों के लिए अच्छी से अच्छी आसामी चाहते हैं। वकीलों की आंखें सदा जज की पदवी को तरसती हैं। क्योंकि यह मध्यम वर्ग के लोगों की मांगें हैं, इसलिए उन्होंने मध्यम वर्ग के लोगों को ही मुल्क और कौम समझना आरंभ कर दिया है।

कांग्रेसवाले अक्सर चीखा करते हैं कि पंजाब कौंसिल और असेंबली में हिंदुस्तानियों की गिनती बढ़नी चाहिए। इससे भी आम हिंदुस्तानियों को क्या लाभ हो सकता है? क्या चुने गए लोग सेवाओं का इनाम नहीं लेते? क्या सदस्यता के लिए चुने जाना सख्त मुसीबत की जिंदगी ही गुजारना है? ऐसे सवाल पूछे जाने चाहिए और जवाब भी मिलने चाहिए।

कौंसिल के असली फायदों का सवाल एक तरफ छोड़कर भी अगर देखें तो नजर आएगा कि यह ख्याल केवल उस जमात के दिमाग में पैदा हो सकता है जिसे इससे कोई लाभ पहुंचने की आशा हो। कौंसिल के लिए कुछेक और वकील एवं साहूकार चुने जाने से करोड़ों मेहनतकश लोगों की जमात में क्या फर्क पड़ सकता है? क्या इन लोगों के टैक्स कम कर दिए जाएंगे? कुछ हिंदुस्तानियों के कौंसिल में चले जाने के साथ तो हम उपरोक्त बातों में कोई जमा-घटा नहीं देखते। हां, कुछेक तालीमवाले लोग इससे रुपया जरूर कमा सकेंगे और उनकी कुछ इज्जत भी बढ़ेगी और वह रोब के साथ इधर-उधर फिर सकेंगे।

अभी भी कुछ सयाने सज्जन समझते हैं कि यह उन्नति की राह नहीं है, लेकिन वह बेचारे यह नहीं समझते कि ये लहरें कहां उठती हैं और किस तरह बढ़ती हैं, लेकिन सारा ताना-बाना समझ में आ सकता है, यदि वे इतना ही समझ लें कि यह सब कुछ मध्यम दर्जे के लोगों का ही निचोड़ है और किसानों और मजदूरों को इससे कोई लाभ नहीं।

इस तरह हम देखते हैं कि इन लहरों की कामयाबी से मध्यम दर्जे के लोगों को ही लाभ पहुंचता है। उन्होंने कभी बेगार, प्लेग आदि मर्जों के विरुद्ध बंदोबस्त करने की कोशिश नहीं की। न कभी लगान, नमक-टैक्स, आबियाना कम करवाने या लोगों की शिक्षा का ठीक प्रबंध किया है, हालांकि यही जरूरी सवाल हैं जिनके हल हो जाने से जनता को लाभ हो सकता है। बेचारे मजदूर या किसान को सिविल सर्विस या पंजाब कौंसिल से क्या लाभ है? वह रोटी, आरोग्यता और आजादी चाहता है, लेकिन इस तरफ तो कांग्रेस ने कभी ध्यान ही नहीं दिया। हां, कई सारे जरूरी प्रस्ताव पास कर दिए। सरकार अच्छी तरह समझती है कि इन मध्यम दर्जे के लोगों की वर्ग रुचि क्या है। वह अच्छी तरह जानती है कि यह कुछ मामूली सुधार चाहते हैं जिसके साथ इनकी जमात को लाभ होने की आशा हो। इनको इससे कोई वास्ता नहीं कि गांवों में रहने वाले पर किस तरह की गुजरती है इसी कारण सरकार इन लोगों को कौंसिल और सिविल सर्विसेज आदि में कुछ पद देकर जनता के आंदोलन रोकने के यत्न करती है। इस तरह बड़े-बड़े नेकदिल सच्चे सेवकों की मेहनतें भी मध्यम दर्जे के लोगों के लिए सोना साबित होती हैं, जबकि मजदूरों और किसानों को थोड़ा भी लाभ नहीं पहुंचता।

इस बात को अच्छी तरह समझने के लिए कहूंगा कि खेत-मजदूरों के हकों पर ध्यान दिया जाए। ऐसा करने पर मालूम पड़ जाएगा कि सारे राजनैतिक दल जमींदारों की ओर से जमींदारों के हक के लिए तो जरूर आंदोलन करते हैं, लेकिन खेत-मजदूरों के हकों के लिए आवाज उठाने की कभी हिम्मत नहीं करते, हालांकि हमारे देश में बहुसंख्यक खेत-मजदूर जमींदारों के जुल्मों, टैक्सों और लगान के नीचे पीसे जा रहे हैं।

वह आंदोलन जो अपने कार्यक्रम में इस बात को सबसे पहले सामने नहीं रखते और इसके लिए आंदोलन नहीं करते, वह आम जनता के आंदोलन नहीं कहला सकते। इसलिए हम कांग्रेस को गुनाहगार नहीं ठहरा सकते, क्योंकि वह अपने सदस्यों के अलावा दूसरे लोगों की ओर अधिक ध्यान नहीं दे सकती। जूती न पहननेवाला ही अच्छी तरह समझ सकता है कि पैर में कील किस तरह चुभती है। यह बात किसान ही अच्छी तरह अनुभव कर सकता है कि लगान आदि से आए दिन दुखी होकर जिंदगी किस तरह गुजर रही है।

अंत में इतना ही कहूंगा कि वह नौजवान जो दुनिया में कुछ काम करना चाहते हैं या जो लोग भगवान के हर बंदे की सेवा करने के लिए अपनी कीमती जिंदगियां वक्फ करना चाहते हैं, वे हिंदुस्तानी मजदूरों और किसानों में मिलकर उनकी रुचि समझने की कोशिश करें और उनकी तकलीफें दूर करते हुए उनकी सच्ची उन्नति के लिए आंदोलन करें। मैंने सरसरी निगाह से वर्तमान समय की गतिविधियों के कुछेक प्रमाण देकर एक खास रुचि की ओर इशारा किया है। इसमें कुछेक नेकदिल लोगों को, जो कि इन लहरों में शामिल हैं, नाराज नहीं होना चाहिए। मैं उनकी हमदर्दी और सच्चाई को अनुभव करते हुए भी इस गलती की ओर उनका ध्यान दिलाना अपना फर्ज समझता हूं। -(पुस्तक ‘भगत सिंह और उनके साथियों के दस्तावेज’, राजकमल प्रकाशन से साभार)

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