घटे कुम्हड़े के दाम, किसान हो रहा परेशान

संवाद सूत्र महेबा कुम्हड़े की कीमत घटने से इस बार किसानों को मायूसी ही हाथ लग रही है

JagranPublish:Thu, 02 Dec 2021 11:44 PM (IST) Updated:Thu, 02 Dec 2021 11:44 PM (IST)
घटे कुम्हड़े के दाम, किसान हो रहा परेशान
घटे कुम्हड़े के दाम, किसान हो रहा परेशान

संवाद सूत्र, महेबा : कुम्हड़े की कीमत घटने से इस बार किसानों को मायूसी ही हाथ लग रही है। किसानों की कुम्हड़े खेतों में डंप है। जानकारों की माने तो एक हजार रुपये प्रति क्विंटल बिकने वाला कुम्हड़ा इस वर्ष 300 रुपये प्रति क्विंटल में ही बिक रहा है। इससे किसानों को लागत निकालना भी मुश्किल हो रहा है।

बारिश के कारण खरीफ की फसल इस वर्ष अधिकांशत: यमुना नदी एवं नून नदी में आई बाढ़ के कारण नष्ट हो गई थी। तिल की फसल जो बची हुई थी वह खेतों में जलभराव के कारण बर्बाद हो गई थी। महेबा, बैरई, हरर्रायपुर, दमरास, पिथऊपुर, खल्ला, अभैदेपुर, नूरपुर, टिकावली, मुसमरिया, धामिनी आदि गांवों में किसानों ने घाटे की भरपाई के लिए कुम्हड़े की फसल तैयार की थी। बारिश की वजह से एक तो पैदावार में गिरावट हुई दूसरी ओर इस वर्ष एक क्विटल कुम्हड़े की कीमत 300 रुपये प्रति क्विटल चल रही है। जबकि पिछले वर्ष इसकी कीमत 1000 रुपये प्रति क्विटल थी जिससे किसानों को खासा मुनाफा हुआ था। पिथऊपुर के किसान राजेश सिंह, लल्लू सिंह ने बताया कि एक बीघा फसल तैयार करने में लगभग 5 से 6 हजार रुपये का खर्च आ जाता है। अगर अच्छी पैदावार हो गई 25 या 30 क्विटल कुम्हेड़ा पैदा होता है। इस वर्ष पैदावार घटने के साथ उनके दाम भी घट गए। कीमत बढ़ने के इंतजार में किसानों ने अपने खेतों एवं खलिहान में कुम्हड़े के फल डंप करा दिए हैं। खर्च की गई लागत न निकलने से किसानों पर कर्ज का बोझ बढ़ गया है जिससे किसान बुरी तरह से मायूस हैं। बाहर पेठा न जाने से घटे दाम

कुम्हड़े का व्यापार करने वाले अभय देवपुर निवासी कल्लू सिंह ने बताया कि आगरा एवं बड़े शहरों से पेठा तैयार होकर दूसरे देशों तक जाता था। कोरोना की वजह से विदेशों में सप्लाई न होने की वजह से कुम्हड़े के दाम घटे हैं जिससे व्यापारी तथा किसान दोनों को नुकसान हो रहा है।

बड़ी उम्मीदों से 5 बीघा में कुम्हड़े की फसल बोई थी। एक तो पैदावार कम हुई दूसरा दाम घटने से लागत भी नहीं निकल रही है।

ब्रजकिशोर बारिश से तिल की फसल नष्ट हो जाने पर कुम्हड़े की फसल पैदा की थी जिससे कि खरीफ की फसल में हुए घाटे की भरपाई हो जाएगी लेकिन लागत भी जाती रही।

रामबाबू सिंह