अब हाथरस में इटालियन अमरूद की खेती

पूरी तरह से आर्गेनिक हो रही सॉफ्ट सीड्स वाले स्वादिष्ट अमरूद की खेती।

JagranThu, 09 Sep 2021 06:54 AM (IST)
अब हाथरस में इटालियन अमरूद की खेती

एआरएस आजाद, हाथरस : जनपद में पहचान बना चुके सासनी के अमरूद के बाद अब यहां की मिट्टी में विदेशी नस्ल के अमरूद भी पैदा हो रहे हैं। बागवानी से आय बढ़ाने के लिए किसानों ने जलवायु के विपरीत फलों की खेती के लिए जिले की मिट्टी को तैयार कर लिया है। उसमें इटालियन अमरूद छाने लगा है। प्रगतिशील किसान लाढ़पुर के योगेश चौधरी की पहल जिले के अन्य किसानों के लिए प्रेरणा बन गई है। फसल के अनुकूल जलवायु

मन में कुछ करने का जज्बा हो तो हर मुश्किल काम आसान हो जाता है। योगेश चौधरी ने विदेशी फलों की फसल से लाभ लेने ठानी तो उसे करके भी दिखाया। उन्होंने इटालियन अमरूद की खेती शुरू कर दी है। विशाखापट्टनम से मंगाया बीज

योगेश चौधरी ने इटालियन अमरूद के बारे में सारी जानकारी इंटरनेट के माध्यम से एकत्रित की। उसके बाद दोस्तों की मदद से उसको उगाने की प्रक्रिया की जानकारी ली। इसके लिए आंध्र प्रदेश के विशाखापट्टनम में प्रशिक्षण लिया। उन्नत किस्म का बीज इटली से विशाखापट्नम के एक प्रगतिशील किसान द्वारा मंगवाया। ऐसे तैयार की फसल

लाढ़पुर नहर के पास हाथरस जंक्शन रोड पर पिता की एक एकड़ जमीन में बागवानी की है। इसमें पांच फीट की दूरी पर 500 पौधे जुलाई 2020 में लगाए थे। इसमें फार्महाउस में तैयार किए गए जैविक खाद व कीटनाशकों का प्रयोग किया। इसकी सिचाई भी ड्रिप विधि से की जाती है। इसके लिए उन्होंने सोलर प्लांट लगा रखा है। साल में इसकी तीन बार फसल आती है। औषधीय गुणों से भरपूर

है सॉफ्ट सीड्स अमरूद

योगेश बताते हैं कि इस अमरूद का बीज बेहद सॉफ्ट होता है। इससे बीज रहित होने का आभास होता है। अंदर से लाल अमरूद तो देखा होगा। इसमें तैयार अमरूद दो तरह का है। एक बाहर से हरा व अंदर से लाल और दूसरी प्रजाति का अंदर व बाहर से लाल है। आयरन के साथ यह औषधीय गुणों से भरपूर है। सामान्य अमरूद के मुकाबले यह अधिक मीठा, बेहतर स्वाद और इम्युनिटी को बढ़ाने वाला है। इसके जूस में चीनी नहीं डालनी पड़ती है। यह पूरी तरह आर्गेनिक है।

दूसरे वर्ष से उत्पादन

इसकी फसल को तैयार करने में दो वर्ष का समय लगता है। पहले वर्ष में प्रति पेड़ पांच से दस किलोग्राम और दूसरे वर्ष में बीस से पच्चीस किलोग्राम उत्पादन शुरू हो जाता है। तीसरे वर्ष से तो खर्चा बहुत कम रहकर उत्पादन अच्छी आय देने वाला होता है। इसमें 500 पौधों की फसल में दस हजार रुपये की लागत आती है। पहले वर्ष में एक लाख और दूसरे वर्ष में दो लाख रुपये की आय होती है। सालभर में सौ लोगों

को मिलता है रोजगार

अमरूद की फसल में सिचाई, निराई, तुड़ाई, पैकिग व अन्य कार्य के लिए मजदूरों की जरूरत पड़ती है। यह अमरूद आगरा, दिल्ली, मथुरा, जयपुर की मंडियों में आसानी से बिक जाता है। फ्रूट कंपनियों के भी आर्डर आने लगे हैं। ट्रांसपोर्ट सहित माल ले जाने के लिए सालभर में 100 मजदूरों को इस बागवानी से रोजगार मिलता है। किसानों के लिए आय बढ़ाने का यह बेहतर माध्यम है। इनका कहना है

बागवानी की फसल किसानों की आय बढ़ाने के लिए बहुत ही उपयुक्त है। विदेशी फलों को अनुकूल जलवायु मिले तो उन्हें यहां भी उगाने की संभावनाएं है। प्रगतिशील किसान पहाड़ी इलाकों में उगने वाली फसलों को अपने यहां तैयार कर रहे हैं। उनमें प्रगतिशील किसान योगेश अन्य किसानों के लिए प्रेरणादायक हैं।

-डा. रामपलट, अध्यक्ष केवीके हाथरस

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