गूंज रहीं गम की सदाएं, किया मातम

हरदोई : मुहर्रम आते ही बिलग्राम के इमामबाड़ों व घरों में अजाखाने सजने लगे। इसी तरह बिलग्राम का मशहूर बड़ा ताजिया जो बड़े इमामबाड़े से मुहर्रम की 10 तारीख को निकाला जाता है। जिसमें काफी संख्या में लोग बाहर से जियारत करने आते हैं। इसमें अंजुमने छुरी व कमा का मातम करती हुई करबला तक जाती हैं।

यहां के मुहर्रम में गंगा जमुनी तहजीब का एक बेहतरीन नजारा देखने को मिलता है। 10 मुहर्रम यौम-ए-आशूरा के रोज जो बड़ा ताजिया बरामद होता है उसे 32 कहार के नाम से भी जाना जाता है, जिसे ¨हदू समुदाय के लोग भी कंधा देने से पीछे नहीं रहते। ये ताजिया शताब्दियों का इतिहास अपने अंदर समेटे हुए है,

चांद दिखते ही शाम को इमामबाड़े में मजलिस हुई। उसके बाद बंगले वाली मस्जिद से ताजिया बरामद हुआ। जिसमें अंजुमन अजादारे हुसैन मातम करती हुई इमामबाड़े में आए। मुहर्रम की पहली तारीख को घरों व इमामबाड़ों में मजलिस का सिलसिला जारी रहा। पहली मजलिस इमामबाड़ा मेहंदी हैदर, इमामबाड़ा अहमद मियां, इमामबाड़ा डॉ. फरजंद अली मरहूम में हुई। जिसमें मौलाना सलमान ताबिश साहब ने खिताब फरमाया। उसके बाद बिलग्राम के ऐतिहासिक बड़े इमामबाड़े में हुई, जिसको मौलाना सलमान ताबिश ने खिताब फरमाया। उसके दरगाह हजरत अब्बास में मजलिस हुई। शाम को बदे मगरिब बड़े आलम का जुलूस निकाला गया। इमामबाड़ा मुस्तफा मियां में मजलिस हुई। उसके बाद मुहल्ला सैय्यदबाड़े में व रियासत हुसैन हाउस में मजलिस हुई। फीर जुलूसे ताजिया निकाला गया जो कासूपेट से उठकर मरहूम मोसिन मियां के घर पर पहुंचा। जिसमें तमाम अजादार मौजूद रहे। अतहर अब्बास रिजवी, खुस्तार बिलग्रामी, अफसर अली, रियासत हुसैन, मोंटू जीशान बिलग्रामी, सब्बे मियां तमाम अजादार मौजूद रहे।

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