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कागजों से न निकला काम, दम तोड़ रहीं उम्मीदें

हरदोई: शहरों में बेरोजगार होकर गांव पहुंचे प्रवासी श्रमिकों को उम्मीद तो बहुत थीं। सरकार ने उन्हें काम दिलाने का वादा भी किया, लेकिन काम कागजों से ही नहीं निकल पाया और श्रमिकों की उम्मीदें जमींदोज हो गईं। सिस्टम की मनमानी की हकीकत समझाने के लिए सवायजपुर तहसील क्षेत्र का गदरिया गांव ही काफी है। गांव निवासी प्रदीप कुमार गाजियाबाद में काम करता था। 26 मार्च को वह गांव आया। परिवार में 10 लोग हैं, लेकिन किसी के पास कोई काम नहीं है। दो-चार हजार रुपये जो भी कमाकर लाए थे, उसी से काम चला रहे। कमलेश साहिबाबाद में एक चाय कंपनी में काम करता था। वह भी 26 मार्च को गांव आया। परिवार में सात लोग हैं, लेकिन गांव में कोई काम नहीं मिला। अंगद, नोएडा में सिलाई का काम करता था। परिवार में 12 लोग हैं। मार्च में गांव आया था। दो बीघा खेत है, लेकिन उसमें भी कुछ नहीं हुआ। रामदेव, जयपुर में काम करता था। 18 मार्च को परिवार के आठ सदस्यों के साथ गांव आया था। एक बीघा खेत है, लेकिन उसमें कोई फसल नहीं हुई। पूरे परिवार के सामने पेट पालने तक की समस्या है। गदरिया गांव के यह परिवार महज समझाने के लिए हैं। अधिकांश गांवों में ऐसा ही है। कागजों में खूब काम दिख रहा है, लेकिन श्रमिकों की उम्मीदें दम तोड़ रही हैं। प्रधान बोले

गदरिया के प्रधान सर्वेश कुशवाहा का कहना है कि गांव में 250 लोग गैर प्रांतों से आए थे। जिसमें से 50 लोगों को काम दिया जा चुका है। बहुत से ऐसे लोग हैं जोकि मनरेगा में काम करना ही नहीं चाहते हैं, तो उन्हें कैसे काम दिया जाए। 27 एचआरडी09

सिर छिपाने को न छत, जीविका को नहीं है काम

सुरसा विकास खंड के पचकोहरा निवासी नागेंद्र सिंह पत्नी व बच्चों के साथ लखनऊ के ट्रांसपोर्ट नगर में रहकर किराए पर रिक्सा चलाता था, लेकिन काम छिन जाने से 15 दिन पहले गांव आया तो देखा कि उसकी कच्ची कोठरी गिर चुकी थी। गांव में न राशन कार्ड बना, न कोई अन्य इंतजाम। बस किसी तरह पेट पाल रहा है। गांवों में भी काम नहीं मिला तो पति पत्नी मिट्टी खोदकर अपनी कोठरी को ही सही करने में लगे हैं। कहते हैं कि न सिर छिपाने को छत, न जीविका चलाने को काम है। 27 एचआरडी 23

जन्म भूमि पर खोज रहा आधार

पचकोहरा निवासी प्रेम दिल्ली में पिछले कई वर्षों से काम करता था। रिठाला में रहते हुए वहीं का उसने आधार कार्ड बनवा लिया, लेकिन जब वहां काम खत्म हो गया तो गांव लौटा। अब गांव में उसके पास कोई दस्तावेज ही नहीं है। न राशन कार्ड है न ही आधार कार्ड। जिससे न काम मिल पा रहा और राशन। प्रेम परेशान है। कहते हैं कि अब गांव में कैसे रहेगा। यह प्रेम ही नहीं बहुत से मजदूरों के सामने ऐसी ही परेशानी आ रही हैं।

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