खेती में दिखा बड़ा मौका तो छोड़ दी फिल्मी दुनिया, लाखों कमाने लगे तो कई किसान भी चल पड़े आशीष की राह

हापुड़ के आशीष कहते हैैं मुझे खेती में अच्छा टेक मिल गया इसलिए मैंने फिल्मी दुनिया छोड़ दी। खेती में हाथ आजमाकर फिल्म नगरी के बराबर ही पैसा कमाने वाले और हरीभरी जैविक खेती के बीच संतुष्ट जीवन जी रहे हैैं आशीष।

Mangal YadavMon, 29 Nov 2021 06:01 PM (IST)
बालीवुड से लौट किसानों को दे रहे ब्रांडिंग और आत्मनिर्भरता का मंत्र

हापुड [मनोज त्यागी]। चकाचौंध से भरी फिल्मी दुनिया में किस्मत आजमाने छोटे शहरों से हजारों की संख्या में युवा मुंबई पहुंचते हैैं, कुछ सफल होते हैैं, कुछ नहीं। वहां से लौटने का फैसला कर पाना किसी के लिए भी कठिन होता है, फिर अगर व्यक्ति जमा हुआ तो और भी मुश्किल। ऐसे में कोई मायानगरी से खेतों की तरफ लौट आए तो कहानी फिल्मी सी ही लगती है। वह भी, कोरोना महामारी में शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने का संदेश देने के उद्देश्य से लौटे तो और भी मुश्किल होता है यकीन करना लेकिन यह सच है।

हापुड़ के आशीष कहते हैैं 'मुझे खेती में अच्छा टेक मिल गया इसलिए मैंने फिल्मी दुनिया छोड़ दी'। खेती में हाथ आजमाकर फिल्म नगरी के बराबर ही पैसा कमाने वाले और हरीभरी जैविक खेती के बीच संतुष्ट जीवन जी रहे हैैं आशीष। कृष-3, दम मारो दम, 1.40 की लास्ट लोकल और कान फिल्म फेस्टिवल के लिए सौ साल सिनेमा के जैसी तमाम फिल्मों में कभी निर्देशन तो कभी प्रोडक्शन टीम में काम करने वाले आशीष कोरोना की पहली लहर की शुरुआत में ही मुंबई से हापुड़ आ गए थे। कहते हैं कि कोरोना की पहली और दूसरी लहर के दौरान वही व्यक्ति बीमारी से उबर पाया जिसकी प्रतिरोधक क्षमता अच्छी थी।

जाहिर है कि प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने को अच्छा खान-पान जरूरी है। फसलों पर लगातार रसायनों के इस्तेमाल से खान-पान भी लगातार इम्युनिटी को कमजोर कर रहा है। बस अब जैविक खेती से अपनी और दूसरों की प्रतिरोधक क्षमता मजबूत करने और छोटे किसानों को आत्मनिर्भर बनाने और उन्हें ब्रांडिंग के लिए प्रोत्साहित करने के लिए काम कर रहा हूं।

कंगनी, रागी, अलसी, सर्क और गंधा

वर्ष 2020 में काला गेहूं, काला धान की खेती से शुरुआत की थी। इससे तीन से चार लाख रुपये एकड़ की आमदनी हुई। बाद में खेत के चारों ओर तीन मीटर चौड़ी मेड़ तैयार की जिसमें अरंडी, हल्दी, सतावरी, बर्मा ड्रीक, लेमन ग्रास लगाई। इससे आमदनी के साथ फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों और पशुओं से भी बचाव हुआ। खेत में आशीष ने कंगनी, रागी, अलसी, सर्क, गंधा भी उगाया। शुरुआत में पैदावार कम हुई, लेकिन दो फसलों के बाद अच्छी पैदावार होने लगी।

आमदनी भी चार से पांच लाख रुपये प्रति एकड़ होने लगी। जबकि इससे पहले खेती से दो लाख रुपये प्रति एकड़ की आमदनी मुश्किल से होती थी। बकौल आशीष आज खेती से फिल्म नगरी से कम पैसा नहीं कमाते। अब अगला लक्ष्य किसानों को जैविक खेती से आर्थिक रूप से सुदृढ़ करना, तकनीकी जानकारी देना, ब्रांड कैसे तैयार करें, बाजार में कैसे बेचें और छोटे किसानों को अपनी फसल बेचने के लिए एक मंच देना है।

पिता ने की थी जैविक खेती की शुरुआत

वर्ष 2018 में जैविक खेती की शुरुआत उनके पिता प्रदीप सुंदर नारायण सिंह कर दी थी। कोरोना के दौरान जब आशीष मुंबई से लौटे तो उन्होंने जैविक खेती को आगे बढ़ाया और सर्टिफाइड आर्गेनिक का प्रमाणपत्र भी लिया। आशीष मानते हैं कि धरती हमें बहुत कुछ देना चाहाती है, पर हम अपने स्वार्थ में धरती में जहर डालकर उसका स्वास्थ्य बिगाड़ रहे हैं। धरती इस समय बीमार है। धरती स्वस्थ होगी तभी हम स्वस्थ हो पाएंगे। धरती में कीटनाशक डालकर हमने भूजल और किसान के मित्र कीटों को खत्म कर दिया है। धरती से जो उगता है वह धरती के लिए उपयोगी होता है। इस बात को हमें समझना होगा।

मल्टीलेयर से अच्छी जैविक खेती

जैविक खेती में फसल को नुकसान पहुंचने वाले कीटों को रोकने के लिए मल्टीलेयर फार्मिंग जरूरी होती है। इसके लिए सबसे पहले अरंडी के पौधे को खेत में लगाना चाहिए। इसे कोई पशु या कीट नहीं खाता है। इसके बाद बर्मा ड्रीक या सहजन के पेड़ लगाए जाने चाहिए। ये दोनों ही पौधे खेतों को स्वस्थ रखने के लिए बहुत अच्छे होते हैं। इसके बाद लेमन ग्रास और फिर हल्दी लगाने से खेत में कीड़ों से नुकसान नहीं पहुंच पाता है। इस प्रक्रिया केबाद यदि हम कोई भी फसल उगाएंगे तो वह स्वस्थ और पौष्टिकता से भरपूर होगी। खेतों में खाद के रूप में गाय का गोबर और उसके मूत्र का ही प्रयोग करने से फसल बहुत अच्छी होती है। फसल पर यदि कीटों का हमला होता है तो उसके लिए बायो फर्टिलाइजर का उपयोग करना चाहिए। बायो फर्टिलाइजर किसान अपने यहां तैयार कर सकते हैं। बायो फर्टिलाइजर बीमार पौधों को स्वस्थ करने के साथ पौष्टिकता भी देता है।

किसानों को बदलना होगा अपना सोच

आशीष का कहना है कि अभी तक किसान परंपरागत तरीके से फसलें उगा रहे हैं। अब फसल उगाने के साथ ही उसमें अतिरिक्त काम करने की जरूरत है। यदि गेहूं उगा रहे हैं तो उसका आटा बनाकर बेचें, सरसों उगा रहे हैं तो उसका तेल निकालकर बेचें। तब उनकी फसलों के अच्छे दाम मिलेंगे। इसके लिए अपना ब्रांड तैयार करना होगा।

हापुड़ आर्गेनिक फार्म के संचालक आशीष त्यागी ने कहा कि उन्हें कला का बहुत शौक है। खेती सबसे बड़ी कला है। उसमें बहुत रचनात्मकता है। आने वाला समय जैविक खेती का है क्योंकि प्रतिरोधक क्षमता को जितना मजबूत जैविक खानपान करते हैं, उतना कोई नहीं कर पाता। इसलिए मैंने हापुड़ आर्गेनिक फार्म के नाम से अपना ब्रांड बनाया और लोगों को स्वस्थ रखने का संकल्प लिया।

गांव पूठा के रहने वाले बिजेंद्र कुमार का कहना का कि उनके पास करीब पांच बीघा जमीन है। मैं यहीं इनके पास रहकर जैविक खेती सीख रहा हूं। इसके बाद अपने स्तर पर जैविक खेती की शुरुआत करूंगा। गांव असौड़ा के राकेश कुमार का कहना है कि जैविक खेती के बारे में अच्छी जानकारी मिली तो अब मेरा भी खेती करने का तरीका बदल गया। उम्मीद है पहले के मुकाबले फसल के अच्छे दाम मिलेंगे।

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