नहाय-खाय के साथ छठ व्रत शुरू, श्रद्धालुओं में उत्साह

जागरण संवाददाता हापुड़ भगवान सूर्यदेव की उपासना का महापर्व छठ व्रत शुरू हो गया है। सोम

JagranMon, 08 Nov 2021 09:18 PM (IST)
नहाय-खाय के साथ छठ व्रत शुरू, श्रद्धालुओं में उत्साह

जागरण संवाददाता, हापुड़ :

भगवान सूर्यदेव की उपासना का महापर्व छठ व्रत शुरू हो गया है। सोमवार को श्रद्धालुओं ने नहाय-खाय के साथ व्रत की शुरुआत की। इनमें कुछ महिलाओं का यह पहला व्रत है। जबकि, कुछ महिलाएं ऐसी हैं, जो पिछले कई सालों से लगातार छठ का व्रत रखती आ रही हैं। छठ व्रत रखने के लिए श्रद्धालुओं में काफी उत्साह देखने को मिला। कार्तिक शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को सुबह उठकर यानी सोमवार को मोदीनगर रोड स्थित चंद्रलोक कालोनी में रहने वाले परिवारों की महिलाओं ने भी गंगा में आस्था की डुबकी लगाई। इसके बाद घर पहुंचकर अपने लिए अलग से खाना बनाया। खाने में संपूर्ण शाकाहारी भोजन जिसमें अरवा चावल, चने की दाल तथा लौकी की सब्जी शामिल थी। इसमें तेल का प्रयोग न कर शुद्ध घी का प्रयोग किया गया। इसके बाद लोगों ने बाजार जाकर खरीदारी की। बाजार में लोग खरना की तैयारी में सब्जी और राशन की खरीदारी करते हुए नजर आए। वहीं, शाम को श्रद्धालुओं ने घरों में भक्ति गीतों, लोकगीतों और छठ मईया के गीत गाए। जिससे से वातावरण गुंजायमान हो गया। नगर में कुछ ही परिवार छठ पूजा करते हैं, लेकिन आस्था और संस्कृति से जुड़े इस पर्व को उन परिवारों में उत्साह देखने को मिल रहा है।

---- आज होगा खरना -

खरना के साथ सूर्य षष्ठी व्रत का मंगलवार (आज) दूसरा चरण शुरू हो जाएगा। व्रती महिलाएं आंशिक उपवास रखेंगी। यानी दिन में व्रत रहने के बाद शाम को स्वच्छता से धुले स्थान पर चूल्हे को स्थापित कर अक्षत, धूप, दीप व सिदूर से उसकी पूजा करेंगी। इसके बाद प्रसाद के लिए रखे हुए आटे से फुल्के तथा साठी की खीर बनाएंगी। इसे रसियांव-रोटी भी कहा जाता है। बाद में चौके में ही खरना करेंगी। रोटियां बनाने के बाद बचे हुए आटे से एक छोटी सी रोटी बनाकर रखेंगी। जिसे ओठंगन कहते हैं, तीसरे दिन व्रत की समाप्ति पर इसी रोटी को खाकर व्रत खोलेंगी।

----- व्रत की तैयारियां चरम पर

खरना के पूर्व व्रती महिलाएं हथेली के आकार की बनी हुई तस्तरी में धूप देने के बाद थाली में परोसे हुए सामानों में से थोड़ा-थोड़ा लेकर डालती हैं। इसे अग्नि जिमाना कहते हैं। उसके बाद अग्रासन या गऊ ग्रास निकालकर ही महिलाएं भोजन करती हैं। व्रतियों के भोजन के बाद परिवार के सभी सदस्यों में प्रसाद स्वरूप बांटेंगी। इस प्रसाद का महत्व इतना होता है कि कालोनी के अन्य लोग भी खाने को आते हैं।

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